उपचुनाव...दांव पर 'राज'
03-Nov-2020 12:00 AM 3742

 

मप्र में 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव कोई छोटा-मोटा उपचुनाव नहीं है बल्कि यह लिखेगा विधानसभा में सरकार की तकदीर। यह है सत्ता की असली लड़ाई। 230 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बचाए रखने के लिए भाजपा को चाहिए 9 सीट जबकि सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस को जीतनी होंगी सभी 28 सीटें। यही नहीं इस उपचुनाव में शिवराज सिंह चौहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर है।

मप्र में 28 सीटों पर हो रहे बहुप्रतीक्षित उपचुनाव को महाउपचुनाव माना जा रहा है। वह इसलिए कि इस उपचुनाव में दांव पर राज (सरकार) है। यानी अगर कांग्रेस सभी सीटें जीतती है तो भाजपा को सत्ता छोड़नी होगी और भाजपा 9 से अधिक सीटें जीतती है तो उसकी सरकार बरकरार रहेगी। शह-मात के इस खेल में 1 वर्तमान तथा 2 पूर्व मुख्यमंत्रियों का राजनीतिक भविष्य भी दांव पर है। वैसे तो उपचुनाव में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच है, लेकिन करीब एक दर्जन सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले के हालात बने हुए हैं। जहां बसपा कई सीटों पर भाजपा और कांग्रेस की जीत का गणित बिगाड़ेगी, वहीं कई सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी हार-जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। ऐसे में सरकार बनाने के लिए 116 के जादुई आंकड़े को पाने के लिए भाजपा और कांग्रेस के नेता इस उपचुनाव में वह सभी हथकंडे अपना रहे हैं, जो शायद ही पूर्व में कभी अपनाए गए थे।

मप्र की 28 विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव के लिए मतदान 3 नवंबर को और मतगणना बिहार के साथ ही 10 नवंबर को की जाएगी। यानी इस दिन तय हो जाएगा कि मप्र में शिवराज की सत्ता रहेगी या कांग्रेस के कमलनाथ वापसी करेंगे? इन 28 सीटों में 25 पर उपचुनाव होने की वजह कांग्रेस विधायकों का इस्तीफा देकर भाजपा ज्वाइन करना है, जबकि तीन सीटें विधायकों के निधन के बाद रिक्त हुई हैं। 25 में 22 विधायक सिंधिया खेमे से हैं, जिनके आने से शिवराज सरकार के गठन का रास्ता साफ हुआ था। हालांकि कांग्रेस इन विधायकों को गद्दार बताती है और इसी मुद्दे पर वह चुनावी मैदान में है। कांग्रेस अधिकतर सीटें जीतकर कमलनाथ की वापसी का दावा कर रही है, जमीनी हकीकत बिलकुल अलग है। वहीं भाजपा भी सभी सीटें जीतने का दम भर रही है।

चरम पर उपचुनाव का घमासान

मप्र में 28 विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव का घमासान चरम पर पहुंच गया है। भाजपा, कांग्रेस, बसपा, सपा के प्रत्याशियों सहित कुल 355 प्रत्याशी मैदान में हैं। 3 नवंबर को 63 लाख 51 हजार 867 मतदाता 19 जिलों के 28 विधानसभा सीटों पर मतदान कर प्रत्याशियों का भाग्य लिखेंगे और 10 नवंबर को मतगणना के बाद जीत-हार की तस्वीर साफ हो जाएगी। उपचुनाव में किसकी जीत होगी और किसकी हार इस पर अभी तो कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक बात तो तय है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ का राजनीतिक भविष्य दांव पर है। अगर कांग्रेस सभी 28 सीटें जीतती है तो कमलनाथ फिर मुख्यमंत्री बनेंगे और प्रदेश की राजनीति में उनका दबदबा कायम होगा। अगर सिंधिया हारे तो उनका राजनीतिक कद सिमटकर रह जाएगा और शिवराज सिंह का दबदबा बना रहेगा।

गौरतलब है कि मप्र में हो रहा उपचुनाव दो नेताओं (कमलनाथ और सिंधिया) के अहम का परिणाम है। सिंधिया और उनके समर्थकों की बगावत के कारण ही ये उपचुनाव हो रहे हैं। देश के इतिहास में पहली बार किसी राज्य की 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं। इसलिए इसे मिनी विधानसभा चुनाव भी कहा जा रहा है। इस चुनाव में भले ही 355 प्रत्याशी मैदान में हैं, लेकिन भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का सबकुछ तो पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का मप्र में राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा है। जिन 28 सीटों पर उपचुनाव हो रहा है, 2018 में उनमें से 27 पर कांग्रेस के विधायक विजयी हुए थे। इसलिए ज्योतिरादित्य और कमलनाथ के बाद कांग्रेस में भी बैचेनी है। एक तरफ जहां भाजपा संगठित तौर पर सक्रिय नजर आ रही है, वहीं कांग्रेस में एकमात्र कमलनाथ सक्रिय हैं।

बसपा और वोटकटवा चुनौती

इस महाउपचुनाव में भाजपा और कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती बसपा प्रत्याशियों के साथ ही वोटकटवा उम्मीदवार भी हैं। सभी 28 सीटों पर बड़ी संख्या में दोनों पार्टियों से नाराज प्रत्याशी मैदान में हैं। इस कारण दोनों पार्टियों को इस बात का डर सता रहा है कि अगर समय रहते वोटकटवा उम्मीदवारों को मनाया नहीं गया तो जीत का गणित बिगड़ सकता है। दरअसल, कोरोना संक्रमण के कारण आशंका जताई जा रही है कि उपचुनाव में 40 से 45 प्रतिशत मतदान बमुश्किल हो पाएगा। ऐसे में वोटकटवा उम्मीदवार भाजपा और कांग्रेस के नेताओं की जीत का गणित बिगाड़ सकते हैं। 2018 में इन 28 सीटों पर वोटकटवा उम्मीदवारों को करीब 3,75,000 वोट मिले थे, अब उपचुनाव में यही वोट जीत-हार तय करेंगे। इसलिए भाजपा और कांग्रेस दोनों इस कोशिश में लगी हुई हैं कि मतदान से पहले किसी तरह वोटकटवा उम्मीदवारों को अपने समर्थन में चुनावी मैदान से हटा लिया जाएगा।

प्रदेश में अब तक के चुनाव में कांग्रेस और भाजपा में सीधा मुकाबला होता रहता है। लेकिन बसपा, सपा, निर्दलीय और अन्य पार्टियों के प्रत्याशी कांग्रेस-भाजपा की जीत के गणित को बिगाड़ते रहते हैं। अत: इस बार के उपचुनाव में दोनों पार्टियों की नजर वोटकटवा उम्मीदवारों पर है। गौरतलब है कि उपचुनाव शिवराज सरकार के स्थायित्व और कांग्रेस की नई उम्मीदों से जुड़ा है। यही वजह है कि एक-एक सीट पर जीत सुनिश्चित करने के लिए दोनों दल बिसात बिछा रहे हैं। सपा सहित निर्दलीय उम्मीदवारों को चुनाव मैदान से हटने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन दिए जा रहे हैं। सपा के साथ ही कुछ निर्दलीय प्रत्याशी मैदान छोड़ भी चुके हैं। उम्मीद की जा रही है कि अभी और मैदान छोड़ेंगे।

बसपा बिगाड़ेगी गणित

मप्र में बसपा भाजपा और कांग्रेस का खेल खराब करने की रणनीति पर काम कर रही है। उपचुनाव की 28 में से 27 सीटों पर बसपा ने प्रत्याशी उतारे हैं। इनमें से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल क्षेत्र की हैं, जहां पहले से ही बसपा का प्रभाव ज्यादा है। 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा को जिन दो सीटों पर जीत मिली थी, वे भी इसी क्षेत्र की हैं। इसके अलावा कई सीटों पर उसके उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे थे। बसपा के कारण अधिकांश सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबला हो रहा है। 2018 के विधानसभा चुनाव में ग्वालियर-चंबल संभाग की 15 सीटों पर बसपा को निर्णायक वोट मिले थे। दो सीटों पर उसके प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे, जबकि 13 सीटों पर बसपा प्रत्याशियों को 15 हजार से लेकर 40 हजार तक वोट मिले थे। ग्वालियर-चंबल की जिन सीटों पर उपचुनाव होने वाले हैं, उनमें से मेहगांव, जौरा, सुमावली, मुरैना, दिमनी, अंबाह, भांडेर, करैरा और अशोकनगर में पहले बसपा जीत दर्ज कर चुकी है। 2018 में मुरैना में भाजपा प्रत्याशी की हार में बसपा की मौजूदगी प्रमुख कारण था। इसके अलावा पोहरी, जौरा, अंबाह में बसपा के चलते भाजपा तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी। उसकी मौजूदगी से इनमें से अधिकांश सीटों पर उपचुनावों में भी मुकाबला त्रिकोणीय होता दिख रहा है।

नाथ बनाम शिव की लड़ाई

ये उपचुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया के कारण हो रहे हैं। इसलिए माना जा रहा था कि इस चुनावी मैदान में सिंधिया के इर्द-गिर्द पूरा माहौल रहेगा। लेकिन सिंधिया को पीछे कर भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान को अपना चेहरा बना दिया है। इस कारण उपचुनाव को कमलनाथ बनाम शिवराज की लड़ाई बना दिया गया है। कट्टर कांग्रेसी समर्थक भी इस बात से सहमत होंगे कि कमलनाथ जननेता नहीं हैं। वह बड़े आयोजक हैं, न कि आकर्षक चेहरा। रोड शो और रैलियों के दौरान उनकी बेचैनी स्पष्ट दिखाई पड़ती है। वह अपने 15 महीने के कार्यकाल में शायद ही वल्लभ भवन से बाहर निकले होंगे। वहीं शिवराज सिंह चौहान जिन्हें लोग मामा कहते हैं, वे कोरोना में भी लोगों के बीच पहुंचते रहे। जब कांग्रेस 2018 के विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, तो उसने स्थानीय स्तर पर सीमित अभियान चलाया था, न कि पूरी भाजपा से सीधे मुकाबला किया। उन्होंने शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कोई तंज नहीं किया, बल्कि हर सीट पर स्थानीय विधायक के खिलाफ लोगों की नाराजगी का लाभ लिया।

कांग्रेस में भरोसे की कमी

उपचुनाव के मैदान में कांग्रेस में भरोसे की कमी नजर आ रही है। इसकी वजह यह है कि कमलनाथ ने पूरे उपचुनाव को अपने आसपास समेट लिया है। 2018 में कांग्रेस ने एक संयुक्त नेतृत्व की छतरी के नीचे लड़ाई लड़ी। कमलनाथ (महाकौशल), दिग्विजय सिंह (पूरे मप्र में प्रभाव रखने वाले सांसद), ज्योतिरादित्य सिंधिया (ग्वालियर-चंबल), अजय सिंह (विंध्य), अरुण यादव (मालवा) ने अपने-अपने क्षेत्र में जाकर मेहनत कर जीत में भूमिका निभाई थी। हालांकि अब इनमें से अधिकांश नेता सियासी परिदृश्य से गायब हैं। दिग्विजय-कमलनाथ की खुशमिजाजी गायब है, वे बेहद खींचे हुए नजर आते हैं। कमलनाथ सरकार के पतन के पीछे दिग्विजय सिंह के तौर-तरीके माने जाते रहे हैं। अब आरोप लग रहे हैं कि उपचुनावों में उम्मीदवारों के नाम कमलनाथ ही तय कर रहे हैं, जो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी हैं। कहा जाता है कि वे इसके लिए शीर्ष नेतृत्व से सलाह भी नहीं ले रहे हैं। देखने में आ रहा है कि राज्य के शीर्ष दो नेताओं कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के बीच विश्वास की कमी आई है।

100 प्रतिशत जीत जरूरी

230 सदस्यीय सदन में इस समय 202 विधायक हैं। भाजपा के 107, कांग्रेस के 87 और अन्य (बसपा, सपा व निर्दलीय) के 7 विधायक हैं। सदन पूरा होने पर बहुमत का आंकड़ा 116 है। इस जादुई आंकड़े को हासिल करने के लिए कांग्रेस को सभी 28 सीटें जीतनी होंगी, यानी 100 प्रतिशत जीत, जिसकी संभावना बेहद मुश्किल है। कह सकते हैं कि ऐसा होना चमत्कार माना जाएगा। दूसरी ओर भाजपा को सिर्फ 9 सीटें चाहिए। जिसका मतलब है कि 33 प्रतिशत जीत। कह सकते हैं हर तीन में से एक सीट जीतनी होगी।

उपचुनाव की 28 में से 16 सीटें ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से हैं, जिसे सिंधिया परिवार का गढ़ माना जाता है। इन सीटों के लिए कांग्रेस के पास मजबूत प्रत्याशी नहीं हैं। 2018 के चुनाव में यहां जिन सीटों पर भाजपा हार गई थी, उन प्रत्याशियों को कांग्रेस लुभाने में नाकाम रही है। जिन सीटों पर पार्टी ने प्रत्याशी घोषित भी किए हैं, उन्हें लेकर कार्यकर्ताओं में खास उत्साह नहीं दिख रहा, क्योंकि अधिकतर दूसरे दलों से आए हैं। हालांकि ऐसी ही स्थितियों से भाजपा भी जूझ रही है। मजबूत प्रत्याशी न दे पाने को कमलनाथ की सांगठनिक कमजोरी के रूप में देखा जा रहा है। इस कारण कांग्रेस पिछड़ी नजर आ रही है।

फायदे में भाजपा और शिवराज

कमलनाथ सरकार के केवल 15 महीने में गिरने के बाद सत्ता में आए शिवराज सिंह चौहान की मुख्यमंत्री की कुर्सी बची रहेगी या फिर चली जाएगी, इसका फैसला 10 नवंबर को हो जाएगा। लेकिन एक बात तो तय है कि इस उपचुनाव में भाजपा फायदे में रहेगी। क्योंकि 28 सीटों में से केवल एक सीट पर भाजपा विधायक मनोहर ऊंटवाल के निधन के कारण उपचुनाव हो रहा है। अगर भाजपा एक सीट हार भी जाए तो क्या फर्क पड़ता है। लेकिन यदि 28 सीट में 9 सीट भी भाजपा जीत जाती है, तो उसकी सरकार सत्ता में बनी रहेगी। इस स्थिति में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी कुर्सी पर बने रहेंगे। इतना ही नहीं शिवराज को अपने मंत्रिमंडल में खाली हुई जगह को नए नेताओं से भरने का अवसर मिलेगा। ऐसा हुआ तो यह कमलनाथ के लिए दूसरा झटका होगा।

आंकड़ों के आधार पर तो शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी के लिए कोई खतरा नहीं दिख रहा है। उसकी वजह यह है कि 230 सीटों वाली मप्र विधानसभा में भाजपा के पास 107 विधायक हैं। ऐसे में उसे बहुमत के लिए 28 में से सिर्फ 9 सीटें जीतने की जरूरत है। लेकिन कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए सभी 28 सीटें जीतने की जरूरत पड़ेगी। दिसंबर 2018 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 114 सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन विधायकों के टूटने के बाद अब उसके 87 विधायक ही रह गए हैं। अगर दोनों दल उपचुनाव के परिणामों के बाद बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं छू पाते हैं, तो सत्ता की चाबी एक बार फिर बसपा के 2, सपा के 1 और 4 निर्दलीय विधायकों के पास चली जाएगी। फिलहाल कमलनाथ और शिवराज, दोनों यही दावा कर रहे हैं कि उपचुनावों के बाद उनकी पार्टी को बहुमत मिल जाएगा।

चुनावी मैदान में उतरे भाजपा और कांग्रेस के 56 प्रत्याशियों की हार-जीत का प्रभाव सबसे अधिक कमलनाथ और सिंधिया पर पड़ेगा। यानी उपचुनाव का नफा-नुकसान इन्हीं दोनों को उठाना होगा। इसलिए दोनों की राजनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर है क्योंकि दोनों को ही इन चुनावों में एक-दूसरे पर बीस सिद्ध करना है और देखने वाली बात यही होगी कि दोनों में से अंतत: उन्नीस कौन साबित होता है। कमलनाथ को फिर से अपनी सरकार बनाना है तो सिंधिया को जनता की अदालत में सरकार गिराने के औचित्य और खासकर ग्वालियर-चंबल संभाग में अपना प्रभाव यथावत है यह साबित करना है। इन दोनों की प्रतिष्ठा की लड़ाई में यदि कुछ दांव पर है तो वह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार, क्योंकि नतीजों के बाद ही यह तय होगा कि भाजपा की सरकार बनी रहेगी या कमलनाथ फिर मुख्यमंत्री बनेंगे।

गौरतलब है कि 2018 में 15 साल का सत्ता का वनवास समाप्त होना कांग्रेस के त्रिकोण पर आश्रित था जिनमें कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह थे। इनमें से एक कोण अब भाजपा के पाले में है, तो सवाल यही है कि उस तीसरे कोण की भरपाई कांग्रेस में कोई एक व्यक्ति कर पाएगा या फिर कुछ नेताओं का मिला-जुला प्रयास फिर से कांग्रेस की सरकार बनने का मार्ग प्रशस्त करेगा। कुछ सर्वे रिपोर्ट से कमलनाथ गदगद हैं और उन्हें भरोसा हो चला है कि फिर से उनकी सरकार बनेगी, इसलिए अब वे एक्शन मोड में आकर आत्मविश्वास से लबरेज होकर फ्रंट फुट पर खेल रहे हैं और स्वयं सारे सूत्र अपने हाथ में विधानसभा चुनाव की तरह रखे हुए हैं। उधर, ग्वालियर के महाराज खुद कहते हैं कि यह उपचुनाव उनका है। वह अपने कार्यकर्ताओं को भी यही संदेश दे रहे हैं। इतना ही नहीं इस उपचुनाव में डबरा की जनसभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया के मंच से दिखाई दिए आक्रोश ने भी इसी का संकेत दिया है।

कसौटी पर कांग्रेस के ही नेता

इस बार हो रहे उपचुनाव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि चुनावी कसौटी पर कांग्रेस के ही अधिकांश नेता चढ़े है। बस अंतर इतना है कि कुछ पूर्व हैं जो अब भाजपाई बन चुके हैं और कुछ वर्तमान हैं। दरअसल, उपचुनाव में भाजपा  और कांग्रेस की ओर से जो 56 प्रत्याशी मैदान में हैं उनमें से 45 कांग्रेसी पृष्ठभूमि के हैं। इनमें से 25 पूर्व कांग्रेसी हैं जो भाजपा की तरफ से चुनाव लड़ रहे हैं, वहीं 20 कांग्रेस की ओर से मैदान में हैं। यानी भाजपा ने जहां 25 तो कांग्रेस ने 9 दलबदलू नेताओं को टिकट दिया है। ऐसे में दलबदलू नेताओं के साथ आए उनके कार्यकर्ता भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ कितना घुलमिल गए हैं, यह एक बड़ा सवाल है। इसी तरह भाजपा के कई दलबदलू नेता भी कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़ रहे हैं। ऐसे में उन नेताओं के समर्थक भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ गए हैं। कांग्रेस में भी भाजपा की तरह ही स्थिति है। ऐसे में दोनों पार्टियों का जोर कार्यकर्ताओं पर फोकस है। दोनों ही पार्टियां भाजपा और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश कर रही है।

सिंधिया की सल्तनत में सेंध

कमलनाथ और कांग्रेस की सबसे बड़ी रणनीति यह है कि किसी भी तरह सिंधिया की सल्तनत में सेंध लगाया जाए। इसके लिए पार्टी ने ग्वालियर-चंबल अंचल पर अपना मुख्य फोकस कर रखा है। गौरतलब है कि गुना और ग्वालियर ये दोनों ही सिंधिया परिवार के परंपरागत संसदीय क्षेत्र रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया पहले ग्वालियर सीट से सांसद चुने गए थे। बाद में भाजपा नेता जयभान सिंह पवैया के मजबूती से उभरने के कारण उन्हें ग्वालियर छोड़ना पड़ा। फिर वे गुना आ गए। माधवराव सिंधिया के निधन के बाद जबसे ज्योतिरादित्य ने सियासत में कदम रखा है, तब से गुना संसदीय सीट को राजनीतिक विरासत माना। अब कांग्रेस का गेमप्लान इसी सीट के कोर एरिया में सिंधिया की सल्तनत में सेंध लगाकर ध्वस्त करने का है। गुना की जंग में सिंधिया सल्तनत और दिग्विजय रियासत बड़ा फैक्टर है। गुना की चार में से तीन सीटें अभी सिंधिया समर्थकों से बाहर हैं। इनमें एक सीट पर दिग्विजय के पुत्र जयवर्धन सिंह और एक पर छोटे भाई लक्ष्मण सिंह काबिज हैं। एक सीट पर भाजपा विधायक गोपीलाल जाटव हैं। बमोरी सीट पर सिंधिया समर्थक मंत्री महेंद्र सिंह सिसौदिया चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस का गेमप्लान है कि किसी तरह उपचुनाव में सिसौदिया को हराया जाए। सिसौदिया यदि हार जाते हैं तो पार्टी स्तर पर भाजपा और कांग्रेस की दो-दो सीटें हो जाएंगी। लेकिन, सिसौदिया की हार सिंधिया के लिए गुना में गेमओवर जैसी होगी। यहां दिग्विजय के पुत्र जयवर्धन सिंह जुटे हुए हैं। हर बूथ तक उनकी पहुंच है। एक बड़ा फैक्टर पूर्व मंत्री कन्हैयालाल अग्रवाल को कांग्रेस प्रत्याशी बनाना है। सिसौदिया पिछली बार 27 हजार वोट से जीते थे, जबकि अग्रवाल निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 28 हजार से ज्यादा वोट ले गए थे। तब, भाजपा ने अग्रवाल को टिकट नहीं दिया था। वे निर्दलीय उतरे थे। इस बार कांग्रेस ने उन्हें टिकट देकर मैदान में मुकाबला कांटे का कर दिया है।

संकल्प-पत्र बनाम वचन-पत्र

मप्र में 28 सीटों पर हो रहे विधानसभा उपचुनाव के लिए भाजपा और कांग्रेस ने अपना घोषणा-पत्र जारी कर दिया है। भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र को संकल्प-पत्र का नाम दिया है, तो कांग्रेस ने वचन-पत्र। कांग्रेस के वचन-पत्र में 52 वादे किए गए हैं। जिनमें 100 रुपए में 100 यूनिट बिजली। किसानों का कर्जा माफ करने की घोषणा। कर्मचारी, आदिवासी, उद्योग, व्यापार, रोजगार, युवाओं, महिला, सामाजिक न्याय और सुरक्षा में किसानों के मुद्दे पर बड़े ऐलान। शुद्ध के लिए युद्ध अभियान चलाने का जिक्र। सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाने का ऐलान। महिला स्व सहायता समूहों को 5 लाख तक का लोन देने की घोषणा। कोरोना से मरने वालों को पेंशन। किसान बिल नहीं लागू करने का वचन। किसानों की उपज समर्थन मूल्य पर खरीदने का ऐलान। वहीं, भाजपा ने अपने संकल्प-पत्र में मुफ्त कोरोना वैक्सीन देने के वादे के अलावा स्थानीय मुद्दों के लिए संकल्प-पत्र में अलग से एक कॉलम। किसानों के लिए सरकार की योजनाओं का जिक्र। 0 प्रतिशत ब्याज पर फसल बीमा योजना फिर से शुरू करने का ऐलान। सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना के तहत लगभग 45,17,000 हितग्राहियों के खातों में 1,988 करोड़ रुपए की पेंशन राशि जमा कराई गई। गरीबों के लिए संबल योजना। प्रधानमंत्री मोदी ने दोबारा शुरू की गई किसान सम्मान निधि के तहत किसानों के खाते में आएंगे 10 हजार सालाना। राशन कार्ड वाले 37 लाख गरीब परिवारों को खाद्यान्न पर्ची के जरिए नियमित राशन। 6000 करोड़ की लागत से 310 किलोमीटर लंबे चंबल के बीहड़ में चंबल प्रोग्रेस-वे का निर्माण जैसे कई वादे किए हैं। किसके वादे में कितना दम है, यह तो 10 नवंबर को साफ होगा।

बंटाधार का स्थान लिया गद्दार ने

मप्र की राजनीति में पिछले दो दशक से भाजपा का चुनावी अभियान मिस्टर बंटाधार पर टिका रहता था। भाजपा बार-बार मिस्टर बंटाधार कहकर दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल को याद दिलाने की कोशिश करती थीं तब मप्र में बिजली और सड़क की बहुत बुरी स्थिति थी। इस उपचुनाव में पहली बार मिस्टर बंटाधार शब्द पूरी तरह गायब है। इसके स्थान पर कांग्रेस ने आक्रामक तरीके से गद्दार शब्द गढ़ लिया है। गद्दार कहकर वह कांग्रेस और उनके समर्थक प्रत्याशियों पर जमकर हमले कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा अभी तक इसकी कोई काट नहीं ढूंढ पाई है। ज्योतिरादित्य सिंधिया जरूर जवाब देते हैं कि गद्दार कांग्रेस है जिसने मप्र का विकास नहीं किया। लेकिन सिंधिया के जवाब का खास असर दिखाई नहीं दे रहा। पूरा चुनाव गद्दार शब्द पर और जातियों के गुणा-भाग पर टिक गया है। ग्वालियर-चंबल संभाग की सबसे महत्वाकांक्षी योजना चंबल एक्सप्रेस-वे का कोई खास लाभ भाजपा को मिलता दिखाई नहीं दे रहा। अब तो भाजपा नेताओं ने भी अपने भाषणों में इस पर बोलना लगभग बंद कर दिया है। इससे पहले कांग्रेस ने चौकीदार चोर है का अभियान चलाया था, जो लोकसभा चुनाव में काम नहीं कर सका था। कहा जा सकता है कि कांग्रेस गलतियों से सीख नहीं लेती।

6 सीटों पर भाजपा का सबसे अधिक फोकस

मप्र के उपचुनाव में जीत के लिए भाजपा पूरा दमखम लगा रही है। वहीं मंत्रियों, सांसदों और पूर्व मंत्रियों को भी हर एक सीट की जिम्मेदारी सौंपी गई है। जीत के लिए भाजपा का पूरा फोकस कम अंतर से जीतने वाली 6 सीटों पर है। जहां 2018 के चुनाव में 6 सीटें 10 हजार से भी कम वोटों से जीती थी, इन सीटों पर भाजपा प्रत्याशी वही है, जो 2018 में कांग्रेस से प्रत्याशी थे। 10 हजार से कम अंतर से जीतने वाली सीटों पर भाजपा जीत के लिए जोर लगा रही है। ताकि इन कमजोर सीटों पर अपनी ताकत मजबूत की जा सके। मुंगावली, सांवेर, अंबाह, पोहरी, अशोकनगर, सुवासरा सीटों पर भाजपा जीत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। इन 6 सीटों पर साल 2018 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी कम अतंर से जीते थे। अब इन 6 सीटों पर सभी कांग्रेस प्रत्याशी दल बदलकर भाजपा से मैदान में उतरे हैं। ऐसे में भाजपा इन कमजोर कड़ी मानी जाने वाली सीटों पर जीत के लिए पूरा जोर लगा रही है। इन 6 सीटों पर 4 प्रभारियों के साथ केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा भी अपनी नजर बनाए हुए हैं। मुख्यमंत्री भी रोजाना इन सीटों का फीडबैक ले रहे हैं। भाजपा ने कम अंतर वाली 6 सीटों पर जीत के लिए मजबूत प्लान तैयार किया है, जिसमें 19 मंत्रियों, 25 सांसदों और 95 विधायकों की टीम मैदान में मोर्चा संभाले हुए हैं।

विकास पर जातियां हावी

ग्वालियर-चंबल संभाग के इतिहास में पहली बार यहां एक साथ 16 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं। प्रचार के अंतिम दौर में विकास का मुद्दा पूरी तरह गायब है। दोनों दलों ने चुनाव को पूरी तरह जातिवादी बना दिया है। जौरा में चुनाव ब्राह्मण और ठाकुर के बीच केंद्रित हो गया है। सुमावली सीट पर पूरा चुनाव गुर्जर बनाम अन्य जाति हो गया है। मुरैना सीट पर वैश्य समुदाय यहां जीत-हार का फैसला करेगा। दिमनी सीट पर तोमर वोट प्रभावी है। अंबाह में बड़ी जातियों का वोट निर्णायक रहेगा। मेहगांव में ब्राह्मण बनाम ठाकुर के बीच मुकाबला है। गोहद क्षेत्र में गद्दारी का मुद्दा भी असर दिखा रहा है। कांग्रेस ने गोहद को डॉ. गोविंद सिंह के भरोसे छोड़ा है। मुकाबला रोचक और कड़ा है। ग्वालियर में भाजपा प्रत्याशी प्रद्युम्न सिंह तोमर जातिगत समीकरण से थोड़े घबड़ाए हुए हैं। ग्वालियर पूर्व में बड़ी और छोटी जातियों में मतदाता बंटे हुए हैं। डबरा और भांडेर में भी मतदाता जातिगत आधार पर बंटे हुए हैं। करैरा में कांग्रेस पूरे क्षेत्र में इस सीट को सबसे अधिक सुरक्षित मान रही है। प्रागीलाल जाटव के प्रति मतदाताओं में सहानुभूति साफ दिखाई दे रही है। भाजपा के कमलेश जाटव को रेत का खेल बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है। भाजपा का कोई बड़ा नेता फिलहाल यहां सक्रिय नहीं है। पोहरी में कांग्रेस ने दलबदल करने के लिए कुख्यात हरिवल्लभ शुक्ला को टिकट देकर शायद गलती कर दी है। भाजपा के सुरेश धाकड़ कमजोर प्रत्याशी थे लेकिन हरिवल्लभ शुक्ला उन्हें टक्कर नहीं दे पा रहे हैं। पूरा चुनाव जाति पर आकर टिक गया है। बामौरी में कांग्रेस के कन्हैयालाल अग्रवाल पुराने भाजपाई और संघी रहे हैं। वे अपने पुराने संबंधों को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के महेंद्र सिसौदिया को बूथ मैनेजमेंट पर भरोसा है। लेकिन दोनों दलों में भितरघात का खतरा बना हुआ है। कांग्रेस की ओर से लक्ष्मण सिंह और जयवर्धन ने मोर्चा संभाल रखा है। अशोकनगर में भाजपा के जसपाल सिंह जज्जी अभी तक पुराने भाजपाईयों को मनाने में असफल रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। 15 महीने मंत्री रहने के दौरान जज्जी पर भाजपा नेताओं पर दमन करने के आरोप इस चुनाव में उन पर ही भारी पड़ रहे हैं। कांग्रेस की आशा दोहरे ने जैन युवक से शादी की है इसलिए उसे जैन वोटों का भारी भरोसा है। मुंगावली में भाजपा से बृजेन्द्र यादव की उम्मीदवारी के बाद से ही भाजपा का बड़ा तबका पार्टी से रूठा हुआ है। भोपाल के पूर्व महापौर आलोक शर्मा पिछले चार माह से यहां डेरा डाले हुए हैं। यादव को सिक्ख समुदाय से विवाद भी भारी पड़ रहा है। कांग्रेस ने लोधी समाज के साधारण व्यक्ति को टिकट देकर नया संदेश दिया है। कांग्रेस फिलहाल एकजुट है।

क्या मंत्रियों की हार का सिलसिला रुक पाएगा?

इस उपचुनाव में प्रदेश सरकार के मंत्रियों की किस्मत का भी फैसला होने वाला है। उपचुनाव में 14 मंत्री (तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत अब मंत्री नहीं हैं) चुनाव लड़ रहे हैं। ये हैं सुरखी से गोविंद सिंह राजपूत (जिन्हें हाल ही में मंत्री पद छोड़ना पड़ा), बदनावर से राजवर्धन सिंह, सुवासरा से हरदीप सिंह डंग, दिमनी से गिर्राज सिंह दंडोतिया, ग्वालियर से प्रद्युम्न सिंह तोमर, डबरा से इमरती देवी, बमोरी से महेंद्र सिंह सिसौदिया, अनूपपुर से बिसाहूलाल सिंह, सांची से प्रभुराम चौधरी, सांवेर से तुलसीराम सिलावट (जिन्हें हाल ही में मंत्री पद छोड़ना पड़ा), सुमावली से एदल सिंह कंसाना, मेहगांव से ओपीएस भदौरिया, मुंगावली से बृजेंद्र सिंह यादव और पोहरी से सुरेश धाकड़। भाजपा को मिली रिपोर्ट के अनुसार करीब आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों पर हार का खतरा मंडरा रहा है। इनमें गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी सिलावट, गिर्राज सिंह दंडोतिया, एदल सिंह कंसाना, महेंद्र सिंह सिसौदिया, ओपीएस भदौरिया, राजवर्धन सिंह दत्तीगांव, हरदीप सिंह डंग और बृजेंद्र सिंह यादव खतरे में हैं। इनमें से कौन जीतता है और कौन हारता है, यह तो 10 नवंबर को साफ होगा। उधर, कांग्रेस को उम्मीद है कि वर्ष 2018 की तरह उपचुनाव में भी मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ेगा। गौरतलब है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अपने 25 मंत्रियों पर भरोसा जताते हुए उन्हें चुनावी मैदान में उतारा था। मगर इनमें से 13 को हार का सामना करना पड़ा था। केवल 12 मंत्री ही चुनाव जीत सके थे। हारने वालों में भाजपा सरकार में वित्त मंत्री रहे जयंत मलैया, ओम प्रकाश धुर्वे, रुस्तम सिंह, अर्चना चिटनिस, उमाशंकर गुप्ता, अंतर सिंह आर्य, जयभान सिंह पवैया, नारायण सिंह कुशवाहा, दीपक जोशी, लाल सिंह आर्य, शरद जैन, ललिता यादव, बालकृष्ण पाटीदार के नाम शामिल हैं। वहीं वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा सरकार के 10 मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा था। इनमें अजय विश्नोई, लक्ष्मीकांत शर्मा, रामकृष्ण कुसमरिया, करण सिंह वर्मा, अनूप मिश्रा, जगन्नाथ सिंह, कन्हैयालाल अग्रवाल, हरिशंकर खटीक, बृजेंद्र प्रताप सिंह और दशरथ लोधी हार के चलते विधानसभा की दहलीज तक नहीं पहुंच सके थे।

- राजेंद्र आगाल

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