उलटी दिशा में दौड़
21-Jul-2020 12:00 AM 2908

 

लगता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 41 कोल ब्लॉक को निजी निवेश के लिए खोलने का ऐलान कर भारत को क्लीन एनर्जी से उल्टी दिशा में दौड़ा दिया है। जो देश इंटरनेशनल सोलर अलायंस का अगुआ हो और जिस देश का प्रधानमंत्री भारतीय संस्कृति में पर्यावरण रक्षा के तत्वों को दुनिया के तमाम मंचों पर विश्लेषित करता हो, वहां भारी प्रदूषण फैलाने वाले कोयले से बिजली उत्पादन की क्षमता को बढ़ावा देने का उसका फैसला चौंकाता है। भारत में कोयला खनन में निजी कंपनियों को उतारने का फैसला ऐसे वक्त में लिया जा रहा है, जब विकसित और विकासशील दोनों तरह के देशों में क्लीन एनर्जी में भारी निवेश किया जा रहा है।

5 साल पहले पेरिस के जलवायु सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांक्वा ओलांद और यूएन के पूर्व सेक्रेटरी जनरल बान की मून की अगुवाई में इंटरनेशनल सोलर एलांयस का ऐलान किया गया था। दुनियाभर के 122 देश अब इसके सदस्य हैं और इसके जरिए 2030 तक सोलर एनर्जी के लिए 1000 अरब डॉलर खर्च किए जाएंगे। खुद भारत ने 2022 तक इसमें अपनी स्थापित क्षमता 100 गीगावाट तक ले जाने की ठानी है। हाल में प्रधानमंत्री ने सोलर अलायंस को दुनिया के लिए एक गिफ्ट बताया था। माना जाता है कि इस अलांयस के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को इंटरनेशनल डिप्लोमेसी में एक केंद्रीय भूमिका में भी रखने की कोशिश की है। लेकिन पिछले दिनों देश की कोयला खदानों को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोलने के ऐलान के बाद क्लीन एनर्जी, खासकर सौर ऊर्जा पर भारत की प्रतिबद्धता को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं।

2010 में भारत दुनिया की सबसे तेज रफ्तार वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक था। माना जा रहा था कि भारत का तेज आर्थिक विकास इसकी ऊर्जा जरूरतों को काफी बढ़ा देगा और कोयला और पेट्रोल जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत पर्यावरण संरक्षण की बढ़ती जरूरत के साथ मेल नहीं खाएंगे। इसलिए क्लीन एनर्जी को बढ़ावा मिलना चाहिए। इसमें सौर ऊर्जा की अहम भूमिका होगी क्योंकि भारत के बड़े हिस्से में धूप भरपूर रहती है। 2010 में भारत में सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता सिर्फ 10 गीगावाट की थी लेकिन 2019 में यह बढ़कर 30 गीगावाट तक पहुंच गई। इन 10 वर्षों में भारत में सोलर इलेक्ट्रिसिटी सबसे सस्ती एनर्जी हो गई। 2015 में सोलर एलायंस के ऐलान के बाद तो देश के सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता में जबर्दस्त इजाफा हुआ। सिर्फ तीन साल में ही यानी 2016 से 2019 के बीच सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता पांच गुना बढ़ गई। लेकिन इस गति को ब्रेक लग गई। अब पिछले दो-तीन साल से देश सौर ऊर्जा के विकास में बेहद धीमा चल रहा है। लिहाजा यह सवाल लाजिमी है कि आखिर इस धीमेपन की वजह क्या है?

दरअसल, सोलर एनर्जी के क्षेत्र में तेज दौड़ने के लिए बनाई गई नीतियां ही अब इसके लिए स्पीड ब्रेकर बन गई हैं। ऊर्जा पर बनी संसद की स्थायी समिति ने हाल ही में ही क्लीन एनर्जी का टारगेट पूरा न कर पाने के कारण नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की खिंचाई की है। इसमें सोलर ऊर्जा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की कोशिश में पिछड़ने का साफ तौर पर जिक्र है। देश में पिछले दो-तीन साल में सोलर एनर्जी पैदा करने की क्षमता में काफी कमी आई है। 2017-18 में यह क्षमता 9.4 गीगावाट की थी। 2018-19 में यह घटकर 6.5 गीगावाट पर आ गई और 2019-20 में तो यह गिरकर और नीचे यानी 2.9 गीगावाट पर पहुंच गई। 2022 तक भारत को 100 गीगावाट के अपने लक्ष्य को हासिल करना है लेकिन अब तक कुल 31 गीगावाट की स्थापित क्षमता ही हासिल हो सकी है। अहम सवाल यह है कि क्या दो साल में हम 69 गीगावाट की स्थापित क्षमता हासिल कर लेंगे? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि शुरुआत में अच्छी रफ्तार पकड़ने के बावजूद सोलर एनर्जी में अपनी स्थापित क्षमता बढ़ाने में हम किन वजहों से चूक रहे हैं? इसकी तीन-चार मोटी वजह है, जिन्हें समझना जरूरी है।

सरकार ने सोलर एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए नेशनल इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003 और नेशनल टैरिफ पॉलिसी 2006 के तहत री-न्यूबल परचेज एग्रीमेंट की व्यवस्था की है। इसके तहत राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों और बिजली की बड़ी उपभोक्ता कंपनियों के लिए अपनी खपत की 17 फीसदी बिजली सोलर एनर्जी के तौर पर खरीदना जरूरी कर दिया गया। लेकिन नियामक एजेंसियां इस नियम को सख्ती से लागू नहीं कर पाईं। दूसरे, सोलर एनर्जी खरीदने वाली राज्य की बिजली वितरण कंपनियां, सोलर पावर सप्लायर्स के पैसे देने में देरी करने लगीं। पिछले साल जुलाई तक राज्य बिजली वितरण कंपनियों पर सोलर पावर सप्लायर्स कंपनियों का 9736 करोड़ रुपए बकाया था। जिन राज्यों ने सोलर एनर्जी खरीदने में सबसे ज्यादा दिलचस्पी दिखाई थी, वही सबसे बड़े बकायेदार बनकर उभरे। सोलर पावर सप्लायर कंपनियों का राज्यों पर जितना बकाया है, उसमें आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक की 75 फीसदी हिस्सेदारी है।

आम उपभोक्ताओं को लुभाने की कोशिश भी नाकाम

भारत ने घर की छतों पर सोलर पैनल लगाकर 2022 तक 40 हजार मेगावाट की क्षमता जोड़ने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पाने के लिए शुरू में सरकार ने सारे रूफ-टॉप सोलर प्रोजेक्ट पर 30 फीसदी तक सब्सिडी देनी शुरू की। लेकिन जल्दी ही यह सब्सिडी सिर्फ गैर लाभकारी संस्थानों और सरकारी भवनों की छतों पर लगने वाले सोलर पैनलों तक सीमित कर दी गई। इसके अलावा बाहर से आने वाले फोटो वोल्टिक मॉड्यूल पर सेफगार्ड ड्यूटी लगाने से भी ये महंगे हो गए। सरकार जिन उपभोक्ताओं को सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी, वे अब इस एनर्जी से दूर होने लगे। इस तरह आम उपभोक्ताओं के बीच सोलर एनर्जी को लोकप्रिय बनाने की सरकार की योजना भी धराशायी हो गई। अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार फिर कोयला खनन के दोहन की नीति पर उतर आई है। यानी क्लीन ऊर्जा की दिशा में भारत की महत्वाकांक्षा सीधे पलटी खाती दिख रही है।

 - धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया

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