04-Feb-2020 12:00 AM
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दिल्ली विधानसभा चुनाव 8 फरवरी को यहां वोट डाले जाएंगे और 11 फरवरी को नतीजे आएंगे। इस बार भी दिल्ली विधानसभा के चुनाव त्रिकोणीय होने के आसार हैं। आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुकाबला होगा। 'लगे रहो केजरीवालÓ गाने पर आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और समर्थक झूम रहे हैं। लेकिन याद रखिए कि जिस फिल्म से यह बोल लिया गया है उसके किरदार मुन्नाभाई की तरह आपके प्रमाणपत्र भी जाली न हों। अब इस 'बाजीगरीÓ पर तो सवाल उठ ही सकते हैं कि बिजली, पानी और महिलाओं की मुफ्त यात्रा पर काम चुनावों के चंद महीने पहले क्यों पूरे पांच साल क्यों नहीं हुए। पहले जो काम केंद्र और उपराज्यपाल नहीं करने दे रहे थे वही अब आपकी इच्छाशक्ति से हो गए। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में मतदाताओं का गरम मिजाज देख दिल्ली में पक्ष और विपक्षी दल नरम पड़ चुके हैं। पूर्ण राज्य और अन्य केंद्रीय मुद्दों को छोड़ बिजली-पानी और शिक्षा पर बात हो रही है। एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक खेल को छोड़ अब दोस्ताना मैच सा दिख रहा है। केंद्र में सत्ताधारी भाजपा और हाशिए पर धकेली गई कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल और इन दोनों के खिलाफ विकल्प में उठी आम आदमी पार्टी की मौजूदा सरकार। दिल्ली विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजर है। 2014 के पहले से ही दिल्ली के मैदान नए सामाजिक और राजनीतिक कथ्य का निर्माण कर रहे हैं। जो दिल्ली कभी अण्णा आंदोलन, राष्ट्रीय गान, तिरंगा झंडा और भ्रष्टाचार विरोधी नारों के साथ पूरे देश में गूंज रही थी, आज वह पूरी दुनिया में शाहीन बाग के लिए जानी जा रही है। तिरंगा और राष्ट्रीय गान के साथ एक नई चीज जुड़ी है भारत का संविधान। पिछले साल पंद्रह दिसंबर से दिल्ली में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शन ने पूरा परिदृश्य ही बदल दिया है। कुछ महीनों पहले जहां तीनों दल एक-दूसरे पर आक्रामक थे, जनता की चीख गूंजते ही गरम दल से नरम दल में तब्दील हो गए हैं। दिल्ली के चुनाव में जब केंद्रीय मुद्दों के हावी होने की उम्मीद थी तो अब निकाय चुनाव जैसे बिजली-पानी और सड़क के मुद्दे ही हावी हैं। पिछले पांच सालों से चल रही आक्रामक राजनीतिक पारी अचानक दोस्ताना मैच में तब्दील दिख रही है। पूर्ण राज्य से लेकर मुफ्त बिजली और पानी तक। केंद्र के साथ रिश्ते बदलते ही दिल्ली के मैदान के खिलाडिय़ों का मुद्दा भी पूरी तरह बदल जाता है। पूर्ण राज्य एक ऐसा मुद्दा है जिसे तीनों दलों ने बहुत जोर-शोर से उठाया। इनमें से दो दलों को मौका भी मिला। इस वादे पर अमल करने का क्योंकि वे दोनों केंद्र की सत्ता में शक्तिशाली हुए। अब यह विडंबना ही है कि कांग्रेस ने पूर्ण राज्य का मुद्दा उठाया और केंद्र की सत्ता में आते ही इस पर बात करने से परहेज किया। भाजपा ने भी पूर्ण राज्य पर आंदोलनकारी रवैया अपनाया तो केंद्र में कमान मिलते ही इस पर आधे-अधूरे मन से बात करने लगी। अब रही बात आम आदमी पार्टी की जिसका केंद्र की सत्ता में अस्तित्व नहीं है। पिछली दो बार आम आदमी पार्टी ने पूर्ण राज्य के मुद्दे पर बहुत शोर मचाया। दिल्ली मेट्रो से लेकर ऑटो और कोने-कोने तक इसके विज्ञापनों पर खर्च किया। यूं लगा कि दिल्ली की सारी समस्याओं की जड़ उसका पूर्ण राज्य नहीं होना है। लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल भी पूर्ण राज्य पर बात करने से परहेज कर रहे हैं। केंद्र ने जो नहीं करने दिया वह नहीं, बल्कि जो किया, कर सकते हैं और आगे करेंगे उसी का प्रचार कर रहे। कांग्रेस और भाजपा के बाद केजरीवाल ने भी पूर्ण राज्य पर चुप्पी क्यों साधी? सबसे पहले तो एक चीज उन्हें समझ आ गई कि पूर्ण राज्य के दर्जे का मतलब है केंद्र सरकार से सीधी टकराहट। अपनी सत्ता के शुरुआती दिनों में अरविंद केजरीवाल ने केंद्र से पूरी तरह टकराव मोल कर जनता से सहानुभूति हासिल करने की रणनीति रखी। 'काम नहीं करने देते हैं जी, हमारे पास कोई शक्ति ही नहीं हैÓ उनका प्रिय संवाद था। लेकिन विधानसभा चुनाव के छह महीने पहले वो सारे काम अचानक से होने लगे जो अब तक केंद्र सरकार उन्हें नहीं करने देती थी। खासकर प्रधानमंत्री को लेकर उनकी भाषा एकदम से बदल गई। अब अगर भाजपा ने दिल्ली के पानी की गुणवत्ता पर हमला बोला तो केजरीवाल ने बहुत नरम शब्दों में कह दिया कि हम मिलकर पानी की गुणवत्ता ठीक करेंगे और इसका श्रेय प्रधानमंत्री को दे देंगे। दिल्ली चुनाव में बिहार की धमक विधानसभा चुनाव भले ही दिल्ली में होने जा रहा है, लेकिन वहां भी 'बिहार की धमकÓ सुनाई दे रही है। दिल्ली चुनाव में तीन दलों ने अपनी रणनीति पूरी तरह बिहार की तिकड़ी या यूं कहें कि 'झा तिकड़ीÓ के हवाले कर दी है। दिल्ली चुनाव में भाग्य आजमा रही कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति की बागडोर जहां कांग्रेस के नेता और दरभंगा से पूर्व सांसद रहे कीर्ति झा आजाद के जिम्मे है, वहीं बिहार में सत्ताधारी जनता दल (यूनाइटेड) ने दिल्ली का चुनाव प्रभारी बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा को बनाया है। यही नहीं, बिहार में मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भी राज्यसभा सांसद मनोज झा को चुनाव प्रभारी बनाकर चुनावी मैदान में उतर रही है। राजद और जद (यू) जहां अपने विस्तार पर लगातार जोर दे रही है, वहीं कांग्रेस एकबार फिर दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना चाहती है। दिल्ली के कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पूर्वाचल समाज के लोग अच्छी खासी तादाद में हैं। यही कारण है कि दिल्ली के सभी राजनीतिक दल पूर्वाचली मतदाताओं को लामबंद करने के लिए अपने-अपने तरीके से योजनाएं बना रहे हैं। इस समाज के लोग मुख्य तौर पर उत्तरी-पश्चिमी, उत्तरी-पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली इलाकों में ज्यादा हैं। जद (यू) के एक नेता कहते हैं, 'दिल्ली चुनाव का दायित्व बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा को सौंपा गया है। दिल्ली में बड़ी संख्या में पूर्वाचल के लोग रहते हैं, इसी भरोसे जदयू यहां से कुछ सीटें हासिल करने की उम्मीद में है। पिछले दिनों बदरपुर में पार्टी अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक सभा कर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर चुके हैं।Ó सूत्रों का कहना है कि जदयू भाजपा के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में उतरना चाहती है, जिसके लिए बातचीत भी चल रही है। हालांकि सूत्र यह भी कहते हैं कि अगर बात नहीं बनती है, तब जद (यू) अकेले भी चुनाव मैदान में उतर सकती है। - ऋतेन्द्र माथुर