19-May-2020 12:00 AM
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लॉकडाउन का मूल मकसद सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंस) की अनिवार्यता है। कोरोना वायरस से बचाव के लिए फिलहाल इसका पूरे जोर-शोर से पालन हो रहा है। ऐसे में इस लॉकडाउन के दौरान परिवार के सभी सदस्य लगभग एक महीने से कमोबेश साथ-साथ ही हैं। बिना किसी काम या अनुमति के चूंकि घर से बाहर निकलना कानूनन गलत है और पुलिसिया कार्रवाई भी हो रही है। अक्सर देखा जाता है कि जब आदमी के पास काम न हो और रोजगार आदि पर भी संकट मंडरा रहा हो, तब घरेलू कलह और हिंसा में बढ़ोतरी हो जाती है। तो क्या लॉकडाउन के समय में भी सामान्य दिनों के मुकाबले घरेलू हिंसा की घटनाएं घट रही हैं या फिर इनका विस्तार हो रहा है?
लॉकडाउन अवधि के दौरान पंजाब, हरियाणा और पड़ोसी राज्य राजस्थान में मिली शिकायतों के आधार पर कहा जा सकता है कि शिकायतों की संख्या कम हुई है, लेकिन घटनाएं कम हुई हैं, इस बारे में नहीं कहा जा सकता। ये शिकायतें ईमेल, फोन या अन्य माध्यमों से आयोग तक पहुंच रही हैं। सामान्य दिनों मेें पीड़ित पक्ष सीधे तौर पर आयोग तक पहुंच करता है।
अभी शिकायतों की स्थिति जस-की-तस है, क्योंकि मौजूदा हालात में कार्रवाई संभव नहीं है। हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष प्रतिभा सुमन के मुताबिक, सामान्य दिनों में राज्य में औसत तौर पर 200 से 250 शिकायतें आती हैं। मौजूदा स्थिति में संख्या में कमी हुई है, लेकिन इसकी वजह घटनाओं में कमी को नहीं, बल्कि पहुंच न सकने की विवशता हो सकती है। गंभीर तरह के मामलों को संबंधित उच्चाधिकारियों के पास भेजा जाता है और ऐसा हो भी रहा है। बाकी शिकायतों के बारे में कामकाज की स्थिति सामान्य होने पर संज्ञान लिया जाएगा।
पंजाब में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है, लेकिन वहां संख्या हरियाणा की अपेक्षाकृत कुछ ज्यादा है। पंजाब महिला आयोग की अध्यक्ष मनीषा गुलाटी की राय में शिकायतों का सिलसिला अनवरत चलता रहता है। स्थिति के मुताबिक संख्या में कमी आ सकती है, लेकिन हालात तो वही हैं। वैसे चौबीसों घंटे साथ रहने की स्थिति बिल्कुल अलग है। ऐसा कभी हुआ नहीं था और न ही इसके बारे में किसी ने कल्पना की होगी। जहां पहले से ही घरेलू हिंसा की जमीन तैयार थी, वहां स्थिति अब भी कमोबेश वैसी ही होगी। मजबूरी के चलते साथ-साथ, लेकिन अलग की मनोवृत्ति कहीं न कहीं खुन्नस के रूप में उभरती है।
देश में घरेलू हिंसा की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इसकी वजह महिला आयोगों की स्थापना और सशक्तिकरण होना है। जागरूकता की कमी और मामले सार्वजनिक होने के डर से कई शिकायतें बाहर नहीं आती। ऐसे मामलों का नतीजा घुट-घुटकर किसी तरह जिंदगी बिता देना या फिर कोई आत्मघाती कदम उठाने तक रह जाता है। दहेज प्रताड़ना से लेकर यौन उत्पीड़न या फिर छिटपुट विवाद का बड़ा मसला बन जाने जैसे कई कारक हैं।
मनोविज्ञान कहता है कि लंबे समय तक साथ रहने से छोटे-मोटे विवाद दूर होने की ज्यादा संभावना है। इस दौरान संवाद की गुंजाइश बहुत ज्यादा होती है। पूरा समय रहता है, जिससे मुद्दे की तह तक पहुंचना ज्यादा आसान होता है। सामान्य दिनों में ऐसा नहीं हो पाता। जरा सी बात पर छोटा विवाद बड़ा हो जाता है और एक पक्ष घर से बाहर चले जाने पर विवश हो जाएगा। लॉकडाउन में ऐसा संभव नहीं है। लिहाजा हल की उम्मीद कुछ ज्यादा बढ़ जाती है। इसके दूसरे पहलू पर विचार करना भी जरूरी होगा। अगर विवाद ज्यादा बढ़ गया तो क्या हो? चूंकि अब बाहर जाना संभव नहीं, फिर लंबे समय तक के लिए तो सोचा भी नहीं जा सकता। सामान्य दिनों में परिवार के सभी सदस्य हर समय साथ नहीं होते लिहाजा कोई मध्यस्थता नहीं करता। मौजूदा स्थिति में यह संभव है। निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि लॉकडाउन की विशेष अवधि में मामलों में कमी आने का यह भी एक कारण हो सकता है। इसे स्थायी हल नहीं कहा जा सकता है, लेकिन हालातों को देखते हुए यह राहत भरा कदम तो है। वैसे इस समस्या का स्थायी हल भी नहीं है। आपसी विवादों को मिल बैठकर बिना किसी पूर्वाग्रह के दूर किया जा सकता है। लॉकडाउन ने शायद इसकी भूमिका तैयार कर दी है।
संयुक्त परिवार में स्थिति बेहतर
लॉकडाउन की अवधि में घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों में कमी आनी चाहिए। इसके लिए बहुत से कारण हैं। इस दौरान परिवार के सभी सदस्य साथ हैं। अगर बात करें संयुक्त परिवार की तो फिर स्थिति में सुधार की गुंजाइश और भी ज्यादा है। बड़े बुजुर्ग किसी भी छोटे-मोटे विवाद को दूर करने में अहम भूमिका निभा सकता हैं। सामान्य दिनों के मुकाबले अब स्थिति कुछ अलग है। हर व्यक्ति कोरोना वायरस से भयभीत है। अन्य देशों से मौत के भयावह आंकड़ों से सिहरन-सी दौड़ जाती है। जिंदगी बहुत ही छोटी-सी लगने लगती है। वायरस के डर से मौत के बाद शव न लेने जैसी घटनाओं ने एक वर्ग को जिंदगी के प्रति नजरिया बदलने पर विवश-सा कर दिया है। यह सब स्थायी तो नहीं है। संभव है महामारी निकलने के बाद फिर से वैसे ही हालात होने लगें। लेकिन यह तय है कि इसने बहुसंख्यक वर्ग की सोच को बदल दिया है। ऐसे में घरेलू हिंसा से जुड़े मामलों की संख्या बढ़ने के मुकाबले उनमें कमी आने की संभावना ज्यादा प्रतीत होती है। हरियाणा में लगभग एक माह के दौरान 100 से भी कम शिकायतें आई हैं। यह संख्या सामान्य के मुकाबले आधे से भी कम है। इनमें भी ज्यादातर मामले गंभीर प्रवृत्ति के नहीं है। इसलिए उन्हें हल करना आसान माना जा सकता है। राजस्थान राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष सुमन शर्मा का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा की घटनाओं के कम या ज्यादा होने का अभी कोई पैमाना नहीं है।
- ज्योत्सना अनूप यादव