19-May-2020 12:00 AM
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अलग-अलग क्षेत्रों में, विशेष रूप से खेलों में महिलाएं अपनी विशेष पहचान बनाती हैं और देश और दुनिया को गौरवान्वित करती हैं, तो यह किसी सपने को आकार देने जैसा ही होता है। देश-विदेश की ऐसी अनेक महिलाएं हैं जिन्होंने मातृत्व की जिम्मेदारियों को निभाते, घर और खेल के मध्य की कशमकश से महफूज निकलकर कुछ समय के ब्रेक के बाद फिर अपने खेल को न केवल आगे बढ़ाया, अपितु उसे नए मुकाम पर पहुंचा दिया। अपनी प्रतिभा का दमन न करके उससे न्याय किया।
ऐसा ही एक नाम है एमसी मैरीकॉम। विदेश में जहां भारतीय महिला मुक्केबाजों की पहचान उन्हीं से है, वहां देश में महिला मुक्केबाजी के प्रचार-प्रसार की पूरी जिम्मेदारी आज 37 वर्ष की उम्र में भी उन्होंने संभाल रखी है। विश्वकप मुक्केबाजी इतिहास में वह एकमात्र महिला हैं, जो 6 बार खिताब जीत चुकी हैं। मणिपुर की इस सुपर मॉम को अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी ने 2020 के टोक्यो ओलंपिक के लिए सम्मान स्वरूप महिला मुक्केबाज अंबेसडर नामांकित किया है। राष्ट्रपति पहले ही उन्हें 2016 में राज्यसभा में सदस्य नामांकित कर चुके हैं। इसी साल उन्हें देश के दूसरे सर्वोच्च सम्मान पद्म विभूषण से नवाजा गया है। अधिकांश पदक मैरीकॉम ने 2 बच्चों को जन्म देने के बाद जीते हैं। थकान या 'बहुत हो गया’ जैसे भाव तो उनसे कोसों दूर हैं।
टेबल टेनिस की लंबी-ऊंची खिलाड़ी मणिका बतरा भी एक ऐसा ही नाम है, जिन्होंने विश्व स्तर पर भारतीय महिला टेबल टेनिस को पहचान दी है। दिल्ली की यह 25 वर्षीय खिलाड़ी लाइम लाइट में तब आई जब 2018 के गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेल में उन्होंने देश को 4 पदक दिला दिए। इनमें एकल स्वर्ण, महिला टीम स्वर्ण, महिला युगल रजत और मिश्रित युगल कांस्य पदक शामिल थे। हालांकि इससे पूर्व 2016 के दक्षिण एशियाई खेल में 4 स्वर्ण जीतकर वह अपनी पहचान बना चुकी थीं। 2018 के एशियाई खेल में भी वह अत्यधिक कड़ी स्पर्धा के बीच मिश्रित युगल में देश के नाम कांस्य पदक कर चुकी हैं। वर्तमान में वह भारत की सर्वश्रेष्ठ महिला खिलाड़ी हैं और भविष्य में उनसे और पदकों की आशा की जा सकती है।
विश्व स्तर पर भी कई महिलाओं ने खेल जगत में धूम मचा रखी है। ऐसा ही एक नाम जमैका की फर्राटा चैंपियन शैली एनफे्रजर का है, जिन्होंने फर्राटा के इतिहास में सर्वाधिक खिताब (महिला) जीते हैं। मात्र 5 फुट कद की होने के कारण 'पॉकेट राकेट’ या 'छुटकी’ के नाम से ख्यात शैली वास्तव में किसी अजूबे से कम नहीं हैं। 2019 विश्व एथलेटिक्स प्रतियोगिता में उन्होंने बच्चे को जन्म देने के बाद 32 वर्ष की उम्र में 100 मीटर दौड़ जीतने का कारनामा कर दिखाया। वह अब तक सौ मीटर रेस में 2 ओलंपिक गोल्ड, 4 विश्व चैंपियनशिप गोल्ड जीतकर पूरी दुनिया को चकाचौंध कर चुकी हैं। विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं में वह अब तक सौ, दो सौ और 4&100 रिले रेसों में कुल 17 स्वर्ण पदक, 6 रजत और 2 कांस्य पदक जीतकर जमैका की ओर से सर्वाधिक पदक जीतने वाली खिलाड़ी बन चुकी हैं और उनका यह सफर अभी जारी है। महान ओलंपिक धावक माइकल जॉनसन ने उन्हें सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ महिला फर्राटा चैंपियन का दर्जा दिया है।
उज्बेकिस्तान की जिम्नास्ट ओकसाना चुसोवितना (44) जैसी साहसी मां की बराबरी भला कौन कर सकता है। वह 1992 से लेकर लगातार 7 ओलंपिक में भागीदारी कर चुकी हैं और इस साल टोक्यो ओलंपिक की वॉल्ट स्पर्धा के लिए फिर क्वालीफाई कर चुकी हैं। वह ऐसे खेल में उम्र को मात दे रही हैं, जहां लचीलापन सर्वाधिक आवश्यक है और जहां उनकी प्रतियोगिता अधिकांशत: टीनएजर्स से होती है। मां बनने के बाद वह 2008 ओलंपिक में एकल वॉल्ट में रजत जीत चुकी हैं, जबकि उन्होंने अपना पहला टीम स्वर्ण तत्कालीन सोवियत संघ की टीम की ओर से खेलते हुए 1992 में जीता था। है न दंत कथाओं-सी दास्तान।
महान माताओं की श्रेणी में एक और नाम अमेरिका की सेरेना विलियम्स का है, जिन्होंने पदार्पण के साथ ही टेनिस खेल का तरीका ही बदल दिया और इसे पॉवर टेनिस का रूप दिया। 1999 में पहले ग्रैंड स्लैम से लेकर वह आज तक 23 एकल, 14 युगल और 2 मिश्रित युगल ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम कर चुकी हैं। सभी युगल खिताब उन्होंने बड़ी बहन वीनस विलियम्स के साथ जोड़ी बनाकर जीते हैं और यह जोड़ी आज तक फाइनल में अविजित है। इसके अतिरिक्त वह विश्व स्तर पर 73 डब्ल्यूटीए एकल खिताब अलग से जीत चुकी हैं। 2017 में बच्चे को जन्म देने के बाद उन्होंने टेनिस में वापसी की है और 39 की उम्र में भी वह टीनएजर को मात दे रही हैं।
सानिया की सनसनी
सानिया मिर्जा भी ऐसा ही नाम हैं, जो टेनिस में मातृशक्ति का झंडा उठाए हुए हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनके नाम से ही भारतीय महिला टेनिस की पहचान है। 2003 में प्रोफेशनल बनने के बाद से वह अपने खेल कौशल से धूम मचा चुकी हैं और आज तक भारत की नंबर एक खिलाड़ी के रूप में जानी जाती हैं। भारतीय टेनिस की 'उड्डगण’ सानिया की अपार क्षमताओं का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह अब तक एक डब्ल्यूटीए टाइटल और 14 आईटीएफ खिताब (एकल) भी जीत चुकी हैं, हालांकि वह 2013 में एकल टेनिस को अलविदा कह चुकी हैं। इन्हीं उपलब्धियों के कारण उन्हें अर्जुन पुरस्कार, खेल रत्न पुरस्कार और पद्मभूषण पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। दो साल के मातृत्व अवकाश से लौटकर इसी साल जनवरी में वह होबार्ट इंटरनेशनल टूर्नामेंट का महिला युगल खिताब नादिया के साथ जोड़ी बनाकर जीती हैं। टेनिस जगत में ही एक और मां बेल्जियम की किम क्लिस्टर्स ने जीवट का परिचय देते हुए 2009 में न केवल अमेरिका ओपन का एकल खिताब जीता, बल्कि अगले साल इस कारनामे को दोहराया। 2011 में ऑस्ट्रेलिया ओपन ग्रैंड स्लैम जीतने के बाद तो उन्होंने खेल प्रशंसकों को दांतों तले उगली दबाने पर मजबूर कर दिया।
-आशीष नेमा