19-Sep-2020 12:00 AM
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राजस्थान में अब तक जो सियासी घमासान मचा हुआ था उसका निपटारा हो चुका है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच खींचतान फिलहाल भले ही थमती नजर आ रही है, लेकिन यह स्थिति कब तक बनी रहेगी, इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल है। क्योंकि सियासी उठापटक का दूसरा अध्याय पहले से ही शुरू हो गया है। पहले सचिन पायलट की ही बात करें तो वे राजस्थान आ तो गए हैं, लेकिन अब उनके पास न तो उपमुख्यमंत्री का पद है और न ही पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का। फिर जयपुर आने के बाद उन्होंने मीडिया में जितने भी बयान दिए हैं उनमें एक ही लाइन को बार-बार दोहराया है कि 'पद हो या ना हो, प्रदेश की जनता के प्रति अपने दायित्व को निभाता रहूंगा’। उनकी इस बात का यह मतलब निकाला जा रहा है कि शायद राजस्थान में उन्हें पार्टी या सरकार में हाल-फिलहाल कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिलने वाली है। वे अपने समर्थकों को जताना चाहते हैं कि उनकी लड़ाई सिर्फ स्वाभिमान के लिए ही थी और उन्हें कभी किसी पद का कोई लालच नहीं था। संभावना यह भी जताई जा रही है कांग्रेस हाईकमान पायलट को संगठन में प्रदेश के बजाय राष्ट्रीय स्तर पर कोई जिम्मेदारी सौंप सकता है। हालांकि यह किसी से नहीं छिपा है कि उनका मन केंद्र के बजाय राजस्थान की राजनीति में ही ज्यादा रमता है।
विश्लेषकों के मुताबिक यदि सचिन पायलट तमाम हालातों के मद्देनजर दिल्ली में कोई जिम्मेदारी संभाल लेते हैं तो उनके लिए 2023 के अगले विधानसभा चुनाव तक राजस्थान की सरकार और पार्टी संगठन में कोई प्रत्यक्ष और प्रभावशाली भूमिका निभा पाने की गुंजाइश कम ही नजर आती है। इस हिसाब से राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट का कैरियर कम से कम तीन वर्ष के लिए पीछे खिसकता दिख रहा है। और यदि 2023 में राजस्थान के मतदाताओं ने चुनाव-दर-चुनाव सत्ता बदलने की अपनी परंपरा को बरकरार रखा तो मुख्यमंत्री बनने के लिए पायलट को कम से कम 8 साल का इंतजार करना पड़ेगा। तब तक उनकी उम्र 50 का आंकड़ा पार कर चुकी होगी। और उस वक्त भी उनका वक्त तब आएगा जब सारी राजनीतिक परिस्थितियां उनके पक्ष में होंगी। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि इस दौरान पार्टी हाईकमान सूबे में किसी तीसरे चेहरे को मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाने पर भी विचार कर सकता है। कई पायलट समर्थकों का भी यह कहना है कि सचिन पायलट की पूरी लड़ाई खुद मुख्यमंत्री बनने की नहीं बल्कि गहलोत को पद से हटाने की थी। इनकी बात के समर्थन में कहा जा सकता है कि तीसरे मुख्यमंत्री का विकल्प पायलट ने 2018 में भी पार्टी शीर्ष नेतृत्व के सामने रखा था। हालांकि इसे समझना कोई मुश्किल बात नहीं कि पायलट के लिए यह मजबूरी का विकल्प ही रहा होगा। और इस विकल्प को सामने रखकर वे किसी न किसी तरह खुद की दावेदारी ही मजबूत करना चाह रहे होंगे।
वर्तमान घटनाक्रम से पहले तक इस बात का ठीक-ठाक अंदाजा शायद कम ही लोगों को था कि राजस्थान में कांग्रेस के सभी विधायकों में से कितने पायलट के पक्ष में हैं और कितने गहलोत के। लेकिन हालिया घटनाक्रम के दौरान पायलट के साथ पार्टी के 100 में से सिर्फ 18 और तेरह निर्दलीय में से महज तीन विधायकों ने ही हरियाणा में डेरा जमाया था। गौरलतब है कि मुख्यमंत्री गहलोत के खिलाफ खोले गए मोर्चे में पायलट अपने कई करीबी विधायकों और मंत्रियों तक का समर्थन हासिल नहीं कर पाए। इनमें राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास प्रमुख थे जो इस पूरे विवाद के दौरान अपने बयानों के जरिए पायलट पर बड़े हमले बोलने की वजह से चर्चाओं में रहे थे। जबकि स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा बहुत पहले ही पायलट से दूरी बना चुके हैं।
जानकारों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन की सचिन पायलट की मांग पर सिर्फ तभी विचार कर सकता था जब वे पांच सप्ताह हरियाणा में जमे रहने के बजाय शुरुआती दिनों में ही उससे जाकर मिल लेते। जानकारों का कहना है कि आने वाले दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों के मौके पर एक बार फिर राजस्थान कांग्रेस में बड़ी उठापटक देखने को मिल सकती है। क्योंकि दोनों ही खेमे सत्ता में ज्यादा से ज्यादा भागीदारी चाहते हैं। ऐसे में दोनों में से किसी एक पक्ष के विधायकों को तो मन मसोस कर रहना पड़ेगा। सत्याग्रह से हुई बातचीत में महान आगे जोड़ते हैं, 'इस सब के चलते राजस्थान कांग्रेस में जो अस्थिरता पैदा हो सकती है उसे भुनाने में भारतीय जनता पार्टी इस बार कोई चूक नहीं करेगी। वो तो वैसे भी किसी भी राज्य में 'ऑपरेशन लोटस’ को अंजाम देने के लिए हरदम तैयार रहती है!’ जानकारों की मानें तो इस पूरी रस्साकशी के बाद सचिन पायलट को राहुल गांधी के करीबी होने का लाभ तो मिला ही है।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर असर!
इस पूरी उठापटक में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जीते हुए भी नजर आ रहे हैं और नहीं भी! वे अपने पद और सरकार को तो बचा पाने में सफल नजर आ रहे हैं। लेकिन उनकी जो मुख्य कवायद पायलट की सदस्यता रद्द करवाकर उन्हें हमेशा के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने की थी उसमें वे नाकाम हुए हैं। कुछ जानकारों के अनुसार शायद गहलोत को इस बात का अंदाजा पहले से था कि देर-सवेर गांधी परिवार पायलट के साथ संवाद करने के लिए तैयार हो जाएगा। इसलिए ही उन्होंने इस मामले में अति की जल्दबाजी भी दिखाई। लेकिन पहले तो पायलट गुट ने अदालत जाकर और फिर राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र ने विधानसभा बुलाने की अनुमति न देकर गहलोत को अपनी रणनीति में कामयाब नहीं होने दिया। कांग्रेस का राजनीतिक इतिहास बताता है कि वह बागियों को मौके देने में विश्वास रखती आई है।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी