श्रीलंका से बढ़ेंगे खतरे
21-Aug-2020 12:00 AM 3935

 

श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) के 74 वर्षीय नेता महिंदा राजपक्षे चौथी बार देश के प्रधानमंत्री बन गए हैं। एसएलपीपी ने 5 अगस्त को हुए संसदीय चुनाव में दो तिहाई बहुमत से जीत दर्ज की। एसएलपीपी को देश की कुल 225 सीटों में से 145 पर जीत हासिल हुई, जबकि उसके नेतृत्व वाले गठबंधन को कुल 150 सीटें मिली हैं। श्रीलंका में बीते साल हुए ईस्टर बम धमाकों के बाद वहां के कई क्षेत्रों में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी, इसमें सिंहली समुदाय ने मुस्लिम समुदाय को काफी निशाना बनाया था। जानकारों की मानें तो बीते नवंबर में हुए राष्ट्रपति चुनाव के बाद अब यहां के संसदीय चुनाव में भी सिंहली और तमिल-मुस्लिम समुदायों के बीच राजनीतिक ध्रुवीकरण साफ दिखा है। इसका फायदा सीधे तौर पर सिंहली समुदाय से आने वाले महिंदा राजपक्षे और उनके छोटे भाई गोटबाया राजपक्षे को मिला है। श्रीलंका के पूर्व सेना प्रमुख रह चुके गोटबाया राजपक्षे इस समय श्रीलंका के राष्ट्रपति हैं। उन्होंने 2019 में अपना पद संभालते ही महिंदा राजपक्षे को देश का कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया था।

श्रीलंका में 70 फीसदी सिंहली-बौद्ध आबादी है, चुनाव नतीजों को देखें तो सिंहली बहुल क्षेत्रों में राजपक्षे की पार्टी के उम्मीदवार भारी बहुमत से जीते हैं। खुद महिंदा राजपक्षे ने वोटों के मामले में नया इतिहास रचा है। उन्हें पांच लाख से ज्यादा वोट मिले हैं। श्रीलंका के इतिहास में इतने वोट किसी नेता को इससे पहले नहीं मिले। विदेश मामलों के ज्यादातर विशेषज्ञ महिंदा राजपक्षे का सत्ता में आना, भारत के लिए बड़े झटके जैसा बताते हैं। इसकी वजह राजपक्षे परिवार का चीन के करीब होना है। महिंदा राजपक्षे ने ही पहली बार चीनी निवेश को श्रीलंका में हरी झंडी दिखाई थी। चीन से भारी भरकम कर्ज के बदले उन्होंने श्रीलंका में उसे अपने मन मुताबिक प्रोजेक्ट चुनने और निवेश करने की खुली छूट दे दी थी। इसी कर्ज के दबाव में कुछ साल बाद श्रीलंकाई सरकार को अपना बेहद महत्वपूर्ण हंबनटोटा बंदरगाह चीनी सरकार को 100 साल की लीज पर देना पड़ा था। गोटबाया राजपक्षे देश के रक्षा सचिव की जिम्मेदारी भी निभा चुके हैं। बतौर रक्षा सचिव उन्होंने चीनी युद्धपोत और पनडुब्बियां श्रीलंका के समुद्री तटों के पास लंबे समय तक रुकने की इजाजत दी थी।

पूर्व राजनयिक राजीव भाटिया भारत सरकार को श्रीलंका के मामले में बहुत सोच-समझकर कदम बढ़ाने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं- 'अब ये बात सबको स्पष्ट हो गई है कि श्रीलंका के पास एक बहुत स्थाई सरकार है। राजपक्षे बंधु वहां फिर से सबसे शक्तिशाली बन गए हैं और वो चीन समर्थक के तौर पर जाने जाते हैं। लेकिन उन्हें अब भारत के साथ भी डील करनी पड़ेगी। भारत को अब अपने रिश्तों को अच्छे से संभालना होगा क्योंकि श्रीलंका के साथ हमारे मतभेद भी हैं और झुकाव भी है। हमें इस खेल में दिखने की जरूरत है। विदेश मामलों के जानकार ऐसी भी कुछ वजहें बताते हैं जिनके चलते श्रीलंका के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री और उनके भाई राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के चीन के करीब रहने की संभावना काफी ज्यादा नजर आती है।

- ऋतेन्द्र माथुर

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