सत्ता नहीं, जनता सर्वोपरि
23-Jun-2020 12:00 AM 3836

 

चुनाव की दहलीज पर खड़ा अमेरिका इन दिनों आमजन के गुस्से की लपटों से घिरा है। अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए सुर्खियों में रहने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर विवादित बयान देकर 'गुस्से की आग’ को और हवा दे दी। हालांकि ह्यूस्टन के पुलिस प्रमुख आर्ट एसिविडो ने ट्रंप के बयान पर आपत्ति जताते हुए साफ कहा, 'अगर आपके (ट्रंप के) पास मुद्दे से निपटने का कोई अच्छा सुझाव नहीं है तो कृपया अपना मुंह बंद रखें।’ एसिविडो हालात की गंभीरता को समझ रहे हैं। इस वक्त अमेरिका के 150 से अधिक शहर हिंसा की चपेट में हैं। करीब 40 शहरों में कर्फ्यू लगा हुआ है। अब तक अरबों डॉलर की संपत्ति नष्ट हो चुकी है। अनेक लोग और पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। विरोध प्रदर्शनों की लपटों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के 28 राज्यों और वाशिंगटन डीसी में 21 हजार के करीब सुरक्षाकर्मी तैनात किए गए हैं।

असल में, हिंसा तब भड़की, जब अफ्रीकी मूल के अमेरिकी निवासी 46 वर्षीय एथलीट जॉर्ज फ्लॉयड के प्रति एक पुलिस अधिकारी की बर्बरता का वीडियो वायरल हुआ। श्वेत पुलिस अफसर डेरेक चौविन ने फ्लॉयड को जमीन पर पटका और उसकी गर्दन पर घुटना रख दिया। फ्लॉयड का दम घुटता रहा और अफसर की क्रूरता जारी रही। एक राहगीर ने पूरी वारदात का वीडियो बना लिया। फ्लॉयड की मौत और वीडियो के वायरल होने के बाद जनता भड़क गई। अमेरिका के मिनियापोलिस शहर से उठीं गुस्से की लपटें वाशिंगटन स्थित 'व्हाइट हाउस’ तक पहुंच गईं। मामला इस कदर गंभीर हो गया कि अमेरिकी राष्ट्रपति को विशेष तौर पर तैयार बंकर में पहुंचाना पड़ा। कोरोना महामारी के दौर में बिना सोशल डिस्टेंसिंग और बिना मास्क पहने हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने सरकार को सकते में डाल दिया। राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों की तुलना फासीवादियों से कर डाली और प्रभावित शहरों में सेना तैनात करने की चेतावनी भी दे दी।

बेशक, हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता और प्रदर्शन की आड़ में लूटपाट की इजाजत नहीं दी जा सकती, लेकिन जनता के उस बड़े वर्ग की चिंता को समझना सरकार की जिम्मेदारी है जो भेदभावपूर्ण व्यवहार को कतई बर्दाश्त नहीं करने का संदेश दे रहा है। अमेरिका में रंगभेद हिंसा का यह कोई पहला मामला नहीं है। पहले भी, कभी छिटपुट तो कभी बड़ी वारदातें हुई हैं। इस वक्त पुलिस अफसर की क्रूरता के बाद जिस तरह से पूरे विश्व से प्रतिक्रियाएं आई हैं, उससे अमेरिकी सरकार पर धब्बा तो लगा है। हालांकि कुछ बातें महत्वपूर्ण हैं जो अमेरिका को थोड़ा अलग बनाती हैं। फ्लॉयड की मौत के इस मामले में वहां न सिर्फ तमाम अमनपसंद लोगों ने प्रतिक्रियाएं दीं, बल्कि संस्थानों ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। आरोपी अफसर चौविन को तुरंत नौकरी से निकाल दिया गया और गिरफ्तार भी कर लिया गया। उन पर थर्ड-डिग्री के इस्तेमाल और हत्या का आरोप लगाया गया, जिससे उन्हें 35 साल तक की कैद हो सकती है।

दरअसल, हिंसा के दौर में राष्ट्रपति ट्रंप को भी जनता की भावनाओं को समझना चाहिए था और उसी हिसाब से प्रतिक्रिया देनी चाहिए थी। ट्रंप की बयानबाजी के बीच ह्यूस्टन पुलिस के प्रमुख आर्ट एसिविडो एक नायक के रूप में उभरे हैं जो ऐसी स्थिति में दिल जीतना जानते हैं। उन्होंने राष्ट्रपति को मुद्दे का सही हल तलाशने तक चुप रहने के लिए कह दिया। बहरहाल, ट्रंप दुनिया के सबसे 'ताकतवर’ राष्ट्र की सत्ता पर तो काबिज हो गए, लेकिन ऐसे नाजुक मौकों पर उन्हें अपने इस पुलिस अफसर से सीखना चाहिए कि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मामले से कैसे निपटा जाना चाहिए। कमोबेश यही संदेश अन्य देशों के उन नेताओं के लिए भी है जो सत्ता सौंपने वाली जनता को, सत्ता पर काबिज होने के बाद या तो भूल जाते हैं या फिर विरोध करने के उनके अधिकारों पर कुठाराघात करते हैं। सत्ता के मद में जनता को भूलने वालों का हश्र भी दुनिया ने देखा है।

अमेरिका के पूर्व रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर आरोप लगाया है कि वे देश में विभाजन की आग भड़का रहे हैं और अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ट्रंप ने जिस तरह हालिया घटनाओं को हैंडल किया है, उससे वे नाराज हैं और आश्चर्यचकित भी हैं। इसके जवाब में डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें 'ओवररेटेड जनरल’ की संज्ञा दी और कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि मैटिस ने अपना पद छोड़ दिया था।

काले लोगों के साथ किस तरह होता है दुर्व्यवहार

अमेरिका में काले लोगों के साथ अधिक ज्यादती होती है। मौजूदा आंकड़े इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पुलिस की गोली से मारे जाने के मामले में अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों की तादाद उनकी अमेरिका में कुल आबादी के अनुपात में अधिक है। आधिकारिक आकड़ों के मुताबिक, 2019 में अफ्रीकी-अमेरिकी लोगों को संख्या अमेरिका की कुल आबादी का 14 फीसदी है। 23 फीसदी से ज्यादा मामलों में अफ्रीकी-अमेरिकी पुलिस की गोली का शिकार बनते हैं और संख्या के हिसाब से यह करीब 1000 मामलों से थोड़ा ज्यादा होता है। 2017 से लगातार यह आकड़ें बने हुए हैं जबकि पुलिस की गोली से मारे जाने वाले गोरे लोगों की संख्या में तब से गिरावट आई है। गोरे लोगों की तुलना में ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार होने वाले अफ्रीकी-अमेरिकियों की दर कहीं ज्यादा है जबकि सर्वे में यह बात सामने आई है कि दोनों ही समुदायों में ड्रग्स का इस्तेमाल समान स्तर पर ही होता है। 2018 में करीब प्रति एक लाख अफ्रीकी-अमेरिकियों पर 750 लोग ड्रग्स के मामले में गिरफ्तार हुए थे जबकि इसकी तुलना में गोरे अमेरिकी सिर्फ 350 ही थे। राष्ट्रीय स्तर पर किए गए पिछले सर्वे में यह बात सामने आई थी कि गोरे लोग उसी स्तर पर ड्रग्स का सेवन करते हैं जितने की अफ्रीकी-अमेरिकी लोग। लेकिन गिरफ्तारी के मामले में अफ्रीकी-अमेरिकियों की दर अधिक है। अमेरिकी सिविल लिबर्टीज यूनियन के अध्ययन में पाया गया है कि मारिजुआना रखने के आरोप में अफ्रीकी-अमेरिकी लोग 3.7 गुना गोरे की तुलना में अधिक गिरफ्तार हुए हैं भले ही मारिजुआना के सेवन के मामले में दोनों लगभग बराबर ही थे।

- ऋतेन्द्र माथुर

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