सत्ता के समीकरण
19-Sep-2020 12:00 AM 3916

बिहार के आगामी विधानसभा चुनाव के नतीजों को लेकर अटकलों का बाजार अभी से गर्म है। तरह-तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं, पर राज्य के चुनावी गणित को समझने वालों के लिए यह कोई पहेली नहीं है। पिछले कुछ चुनावों के नतीजों से यह साफ है कि राज्य के अधिकतर मतदाता तीन राजनीतिक शक्तियों-जदयू, भाजपा और राजद के साथ प्रमुखता से जुड़ चुके हैं। इनमें से कोई भी दो दल मिलकर तीसरे को हरा देते हैं। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू ने मिलकर कुल 243 में से 206 सीटें हासिल कर ली थीं तो 2015 के विधानसभा चुनाव में जदयू और राजद मिलकर विजयी रहे थे। दरअसल असली ताकत जदयू-राजद की ही थी, लेकिन कांग्रेस ने इस गठबंधन में शामिल होकर 27 सीटें हासिल कर ली थीं।

आगामी चुनाव में जदयू, भाजपा और लोजपा साथ-साथ रहेंगे, इसकी संभावना है। ऐसी स्थिति में राजद के लिए कोई संभावना नहीं बनती प्रतीत हो रही है। 2010 के विधानसभा चुनाव में राजद और लोजपा ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। दोनों को मिलाकर विधानसभा की मात्र 25 सीटें ही मिल पाई थीं। लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी तत्व अधिक प्रभावकारी रहता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू भाजपा के साथ नहीं थी। इसके बावजूद राजग को बढ़त मिली। 2019 के लोकसभा चुनाव में तो भाजपा, जदयू और लोजपा ने मिलकर बिहार में कमाल ही कर दिया। मुस्लिम बहुल क्षेत्र किशनगंज को छोड़कर बाकी सभी 39 सीटें राजग को मिल गईं। उसी मोदी लहर की पृष्ठभूमि में बिहार विधानसभा का अगला आम चुनाव होने जा रहा है। राजनीतिक रूप से जागरूक प्रदेश बिहार में राष्ट्रीय स्तर की घटनाओं का भी असर पड़ता रहता है। हाल के महीनों में इस तरह की कुछ ऐसी बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिनका श्रेय नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को मिला है।

रामविलास पासवान ने लोजपा की कमान पुत्र चिराग पासवान को सौंप दी है। उन्हें भाजपा से तो नहीं, किंतु नीतीश कुमार से कई शिकायतें हैं। चिराग के ऐसे बयान आते रहते हैं, जिनसे लगता है कि शायद उनकी पार्टी राजग से अलग हो जाएगी, लेकिन लगता यही है कि विधानसभा की अधिकाधिक सीटों पर लड़ने के लिए लोजपा का नया नेतृत्व दबाव बना रहा है। नीतीश विरोधी बयान उसी रणनीति का हिस्सा है। अंतत: क्या होगा, यह तो आने वाले कुछ सप्ताह बताएंगे, पर यदि महत्वाकांक्षी लोजपा राजग से अलग भी हो जाए तो उसका कोई खास असर नतीजे पर नहीं पड़ेगा। लोजपा के विकल्प के जुगाड़ में भी बिहार राजग का नेतृत्व लगा हुआ है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम भी राजग को चुनावी लाभ पहुंचा सकती है। गत लोकसभा चुनाव में किशनगंज में भले कांग्रेसी उम्मीदवार की जीत हुई हो, लेकिन ओवैसी के उम्मीदवार को 2 लाख 95 हजार वोट मिले थे। 2019 में हुए किशनगंज विधानसभा उपचुनाव में तो ओवैसी के उम्मीदवार की जीत हो गई थी। इससे एआईएमआईएम का मनोबल बढ़ गया है।

ओवैसी ने देश में अपनी पार्टी के फैलाव की महत्वाकांक्षी योजना बना रखी है। बिहार विधानसभा चुनाव में उनके दल ने 32 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का निर्णय किया है। जाहिर है ये 32 सीटें वही होंगी, जहां मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी है। एम-वाई यानी मुस्लिम-यादव वोट समीकरण पर निर्भर राजद की राह में ओवैसी का दल रोड़ा बनने वाला है। इसका सीधा लाभ राजग को मिलेगा। वैसे तो बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने पिछली गलतियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी है, किंतु राजद ने सामान्य वर्ग के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के विधेयक का जो विरोध किया, उसके लिए उन्होंने कोई माफी नहीं मांगी है। इस विरोध के कारण गत लोकसभा चुनाव में राजद के कम से कम दो जीतने योग्य सवर्ण उम्मीदवार हार गए थे। सवाल है कि विधानसभा चुनाव में अपवादों को छोड़कर सवर्ण मतदाताओं के मत राजद को कैसे मिल पाएंगे? राजद के समक्ष यह एक बड़ी चुनौती है।

बीते दिनों राजद से जुड़े विधान परिषद के पांच सदस्य जदयू में शामिल हो गए। छह विधायकों ने भी राजद छोड़कर जदयू का दामन थाम लिया। आश्चर्यजनक रूप से उनमें तीन यादव थे। राजद छोड़ने वाले पांच एमएलसी में भी यादव और मुस्लिम थे। इतने कम समय में इतनी संख्या में विधायकों के राजद छोड़ने का हाल के वर्षों में यह एक रिकॉर्ड है। सवाल है कि ये विधायक राजद में अपना राजनीतिक भविष्य क्यों नहीं देख पा रहे थे? क्या उन्होंने हवा का रुख पहचान लिया है? अपने चुनावी भविष्य के प्रति चिंतित कांग्रेस और राजद के विधायकों में से कुछ अन्य विधायक भी आने वाले दिनों में दल छोड़ दें तो कोई अचंभे की बात नहीं होगी।

मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर पहुंचाना एक चुनौती

कोरोना काल में हो रहे चुनाव में अधिक से अधिक मतदाताओं को मतदान केंद्रों पर पहुंचाना भी राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती होगी। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि अल्पसंख्यक और यादव मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक उत्साह से मतदान केंद्रों पर पहुंचेंगे, किंतु राजग के मतदाता खासकर शहरी मतदाता आलस्य और कोरोना ग्रंथि के शिकार हो सकते हैं। वैसे चुनावी मुकाबले में राजद जब-जब अपनी अधिक ताकत दिखाने लगता है, तब-तब लालू विरोधी मतदाता भी सक्रिय हो जाते हैं। याद रहे कि लालू प्रसाद का परंपरागत यादव-मुस्लिम वोट अपवादों को छोड़कर अभी भी राजद के साथ है, पर साथ ही 15 साल का जंगलराज झेल चुके लालू विरोधी मतदाताओं में इस बार भी उत्साह की कमी नहीं होगी, ऐसी उम्मीद राजग जाहिर कर रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में राजग का पलड़ा भारी जरूर नजर आ रहा है, पर कई कारणों से बिहार का यह चुनाव पहले की तरह ही दिलचस्प और तनावपूर्ण रहेगा, भले ही पहले की तरह हिंसक न हो।

- विनोद बक्सरी

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