देश में इस समय मुफ्त की रेवड़ियों को लेकर बहस चल रही है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर आम आदमी के बीच बहस चल रही है कि आखिर मुफ्त की रेवड़ियों पर लगाम कैसे लगेगी। गौरतलब है कि मप्र सहित देशभर में सबसे अधिक छूट बिजली पर दी जा रही है। साल 2020-21 के आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक ने सबसे अधिक 22,108 करोड़ की सब्सिडी दी। उसके बाद मप्र ने 19,595 करोड़, राजस्थान ने 6,545 करोड़, दिल्ली ने 3,149 करोड़ और मणिपुर ने 269 करोड़ की सब्सिडी दी है।
बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिजली क्षेत्र की प्रगति को प्रभावित करने वाले एक महत्वपूर्ण मुद्दे की तरफ देश का ध्यान खींचा है। आर्थिक विकास में बिजली क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करते हुए, उन्होंने राज्य सरकारों से बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) का बकाया भुगतान करने की अपील की है। डिस्कॉम का नुकसान और बकाया एक गंभीर समस्या है। पॉवर फाइनेंस कॉरपोरेशन की 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 29 में डिस्कॉम घाटे में चल रही हैं।
2019-20 तक, डिस्कॉम का कुल घाटा 5 लाख करोड़ रुपए पहुंच गया, और उनकी उधारी वर्ष 2010-20 की तुलना में ढाई गुना बढ़ गई। कोरोना महामारी के दौरान डिस्कॉम के नुकसान और कर्ज में और बढ़ोतरी हो गई है। डिस्कॉम के संकट का एक प्रमुख कारण 2 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का बकाया है, जिसमें सरकारी विभागों और राज्य सरकारों से लंबित भुगतान/ सब्सिडी की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत, और निजी उपभोक्ताओं (मुख्य रूप से घरेलू कनेक्शन) का बकाया 30 प्रतिशत है।
इसे हल करने के लिए राज्यों और डिस्कॉम को इन तीन प्रमुख उपायों पर केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहिए। पहला, छह राज्यों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, जिन पर डिस्कॉम के लंबित भुगतान का तीन-चौथाई हिस्सा बकाया है। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, मप्र, महाराष्ट्र, तेलंगाना और उप्र शामिल हैं। सरकारी विभागों से डिस्कॉम के बकाये का निपटान करने के लिए, संबंधित राज्य अपने बजटीय आवंटन में से चरणबद्ध रूप से अग्रिम कटौती करने के बारे में विचार कर सकते हैं।
दूसरा, राज्यों को अपने सीमित वित्तीय संसाधनों के कुशल उपयोग और बिजली को जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करने की संस्कृति बनाने के लिए बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी को तर्कसंगत बनाने और लक्षित करने की दिशा में काम करना चाहिए। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के अध्ययन के अनुसार, 7 राज्यों को छोड़कर, 2016-20 के दौरान अधिकांश राज्यों में बिजली दर (टैरिफ) में सब्सिडी पर निर्भरता में बढ़ोतरी हुई है।
मप्र, बिहार, राजस्थान, पंजाब और कर्नाटक उन शीर्ष राज्यों में शामिल हैं, जहां डिस्कॉम अपने कुल राजस्व के 30 प्रतिशत या उससे ज्यादा हिस्से के लिए टैरिफ सब्सिडी पर निर्भर हैं। बिजली पर सब्सिडी में बढ़ोतरी, राज्यों की पहले से तंग चल रही वित्तीय स्थिति और ज्यादा बिगाड़ रही है। इसलिए, राज्यों को केवल कमजोर और योग्य उपभोक्ताओं को ही सब्सिडी देनी चाहिए। इसके अलावा, राज्यों को पीएम-कुसुम योजना के तहत किसानों के बीच सोलर पंप जैसे सिंचाई के साधनों को बढ़ावा देना चाहिए।
तीसरा, डिस्कॉम को हाल ही में शुरू की गई 'रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टरÓ (आरडीएस) योजना के तहत उपलब्ध विभिन्न वित्तीय और तकनीकी मदद का पूरी सक्रियता के साथ लाभ उठाना चाहिए। तीन लाख करोड़ रुपए की इस योजना का उद्देश्य वर्ष 2025 तक डिस्कॉम को अपना घाटा 12-15 प्रतिशत तक घटाने में मदद करना है। इस लक्ष्य को पाने के लिए डिस्कॉम को अपने सभी बिजली कनेक्शन के साथ स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को मजबूत करने की जरूरत है।
भारत, पहले ही कई तरीकों से ऊर्जा और जलवायु परिवर्तन के मामले में अपने नेतृत्व को दुनिया के सामने प्रदर्शित कर चुका है। इसमें रिकॉर्ड समय में गांवों और घरों का विद्युतीकरण, और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अक्षय ऊर्जा उत्पादक बनने जैसी उपलब्धियां शामिल हैं। अब हमारे पास और भी महत्वाकांक्षी लक्ष्य हैं। अब हम 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा की उत्पादन क्षमता स्थापित करना, और 2070 तक नेट-जीरो (कार्बन न्यूट्रल) अर्थव्यवस्था बनना चाहते हैं। इन लक्ष्यों को पाने के लिए, राज्यों को निश्चित तौर पर केंद्र के साथ मिलकर बिजली क्षेत्र को स्वस्थ व मुश्किलों को सहने में सक्षम बनाना होगा।
फ्रीबीज के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। इन फ्रीबीज में भारत में राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा संवेदनशील मुद्दा बिजली सब्सिडी का है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार मुफ्त बिजली देती है। पंजाब चुनाव में आम आदमी पार्टी ने मुफ्त बिजली का वादा किया था। कई अन्य राज्यों में भी बिजली पर सब्सिडी दी जाती है। उधर, देश में पूरा बिजली सेक्टर घाटे में है और ज्यादातर वितरण कंपनियों के कर्ज बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सब्सिडी का इनएफिशिएंट स्ट्रक्चर ही बिजली क्षेत्र में घाटे के लिए जिम्मेदार है? सरकारों का बिजली पर सब्सिडी देना सही है या नहीं? बिजली कंपनियों को हो रहे नुकसान से निपटने के लिए सरकार क्या कर रही है? अगर ऐसे ही बिजली कंपनियों को नुकसान होता रहेगा तो भविष्य का इंफ्रास्ट्रक्चर कैसे मजबूत होगा?
गौरतलब है कि किसी भी चीज पर सरकार की तरफ से दी जाने वाली छूट को सब्सिडी कहते हैं। यह सरकार के नॉन-प्लान्ड खर्चों का एक हिस्सा होता है। दुनियाभर में सरकारें अपने नागरिकों को अलग-अलग चीजों पर सब्सिडी देती है। भारत में प्रमुख सब्सिडी पेट्रोलियम, फर्टिलाइजर, फूड, इलेक्ट्रिसिटी पर मिलती है। कई अर्थशास्त्री कहते हैं, अगर सब्सिडी किसी देश की समग्र अर्थव्यवस्था में सुधार करने में विफल रहती है, तो सब्सिडी एक विफलता है।
बिजली सब्सिडी कृषि और घरेलू उपभोक्ताओं के साथ पावर और हैंडलूम जैसे कुटीर उद्योगों और ग्राम पंचायतों को दी जाती है। इसके अलावा कई राज्यों में इंडस्ट्री और बिजनेस को भी बिजली सब्सिडी दी जा रही है। वसुधा फाउंडेशन के सीईओ श्रीनिवास कृष्णास्वामी कहते हैं कि जैसे-जैसे बिजली की खपत बढ़ती है वैसे-वैसे सब्सिडी कम होती जाती है और टैरिफ बढ़ता है। ऐसे में अधिक खपत वाले कई उपभोक्ताओं को बिजली ऊंची दर पर मिलती है।
पावर मिनिस्ट्री के आंकड़ों से पता चलता है कि 36 में से 27 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश उपभोक्ताओं को सब्सिडी वाली बिजली प्रदान कर रहे हैं, जिसमें कम से कम 1.32 लाख करोड़ रुपए देशभर में अकेले 2020-21 वित्तीय वर्ष में खर्च किए गए हैं। मप्र, राजस्थान और कर्नाटक ने 36.4 प्रतिशत या 48,248 करोड़ की सबसे ज्यादा बिजली सब्सिडी दी। तीन साल के डेटा एनालिसिस से पता चलता है कि दिल्ली ने 2018-19 और 2020-21 के बीच अपने सब्सिडी एक्सपेंडिचर में 85 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी। ये 2018-19 में 1,699 करोड़ रुपए थी, जो बढ़कर 3,149 करोड़ रुपए हो गई। ये सभी राज्यों में दूसरी सबसे अधिक है। मणिपुर ने इन तीन वर्षों में बिजली सब्सिडी में सबसे बड़ी 124 प्रतिशत की उछाल देखी गई। 120 करोड़ रुपए से बढ़कर ये 269 करोड़ पर पहुंच गई।
देश के अलग-अलग राज्यों में सब्सिडी के अलग-अलग ब्रैकेट हैं। दिल्ली और पंजाब में 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त है, तो हरियाणा में 150 यूनिट बिजली फ्री दी जाती है। झारखंड में भी 200 यूनिट तक बिजली फ्री है और उसके बाद खर्च बढ़ने के साथ सब्सिडी के स्लैब तय किए गए हैं। राज्यों पर फरवरी 2022 में पावर जनरेटिंग कंपनियों का 1,00,931 करोड़ रुपए का बकाया था। मार्च 2021 में ये 67,917 करोड़ था। बिजली तीन स्टेज से होकर हम तक पहुंचती है। पहली स्टेज प्रोडक्शन, दूसरी ट्रांसमिशन और तीसरी डिस्ट्रीब्यूशन स्टेज होती है। बिजली का प्रोडक्शन करने वाली कंपनियों को जेनकोज कहा जाता है। जेनकोज बिजली को ट्रांसमिशन करने वाली कंपनियों यानी ट्रांसकोज को भेजती है। फिर ट्रांसमिशन कंपनियां बिजली को डिस्ट्रीब्यूशन करने वाली कंपनियों (डिस्कॉम्स) तक पहुंचाती हैं। यह कंपनियां ही आपके घरों तक बिजली पहुंचाती हैं।
डिस्कॉम पर 60 हजार करोड़ का कर्ज
रिसर्च फर्म इंडिया रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों का खराब प्रदर्शन पिछले वित्तीय वर्ष (2021-22) में जारी रहा और उनका घाटा 2019-20 में 34,500 करोड़ रुपए की तुलना में बढ़कर लगभग 59,000 करोड़ रुपए हो गया। घाटे के कारण डिस्कॉम बिजली पैदा करने वाली कंपनियों का पैसा समय से नहीं चुका पाती। इन्हें घाटे से उबारने के लिए सरकार ने कई योजनाएं बनाई लेकिन समस्या का हल नहीं निकला। बकाया बढ़ने के कारण बिजली कंपनियों का वित्तीय प्रंबधन गड़बड़ा जाता है। बीते दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि विभिन्न राज्यों पर 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक का बकाया है। उन्हें यह पैसा बिजली उत्पादन कंपनियों को देना है। डिस्कॉम्स पर कई सरकारी विभागों और स्थानीय निकायों का 60 हजार करोड़ रुपए से अधिक बकाया है। राज्यों में बिजली पर सब्सिडी के लिए जो पैसा दिया गया है, वह इन कंपनियों को समय पर और पूरा नहीं मिल पा रहा है। यह बकाया भी 75,000 करोड़ रुपए से अधिक है। बिजली उत्पादन से लेकर डोर-टू-डोर डिलीवरी की जिम्मेदार कंपनियों के करीब ढाई लाख करोड़ फंसे हैं।
केंद्र की रिवेम्पड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम मप्र में भी होगी लागू
प्रदेश में बिजली चोरी को रोकने के लिए अब स्मार्ट मीटर लगाए जाएंगे। केंद्र सरकार की रिवेम्पड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम के तहत राज्य की विद्युत वितरण कंपनियों की कार्ययोजना को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। इसमें कंपनियां बिजली बिल की अग्रिम राशि पाने के लिए प्रीपेड मीटर को बढ़ावा देगी। फिलहाल कंपनियों को बिजली आपूर्ति के डेढ़ महीने बाद राशि का भुगतान प्राप्त होता है। वर्ष 2025 तक सभी उपभोक्ताओं के मीटर को प्रीपेड स्मार्ट मीटर में परिवर्तित करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्र सरकार ने विद्युत वितरण व्यवस्था में सुधार के लिए योजना तैयार की है। इसमें 60 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार द्वारा दी जाएगी और 40 प्रतिशत राशि राज्य को लगानी होगी। इसके आधार पर ऊर्जा विभाग ने प्रस्ताव तैयार करके कैबिनेट के समक्ष प्रस्तुत किया था। प्रोजेक्ट में 14,886 करोड़ रुपए खर्च होंगे। कंपनियों द्वारा प्रीपेड स्मार्ट मीटरिंग एवं सिस्टम मीटरिंग पर 8,736 करोड़, डिस्ट्रीब्यूशन लॉस कम करने 9,265 करोड़ तथा डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम आधुनिकीकरण पर 5,909 करोड़ खर्च होंगे। स्मार्ट मीटर लगने पर उपभोक्ता मोबाइल फोन, टीवी चैनल्स की तर्ज पर अब बिजली का उपयोग करने वाले उपभोक्ता जितनी राशि जमा करेंगे, उतनी ही बिजली जला सकेंगे। राशि खत्म होने पर अपने आप बिजली बंद हो जाएगी। अगले तीन साल में यह प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाए जाएंगे। इस योजना पर करीब 8,736 करोड़ रुपए की राशि खर्च होगी। जिसमें केंद्र सरकार 1,462 करोड़ का अनुदान देगी। इसके तहत विद्युत वितरण कंपनियों की 24,170 करोड़ की कार्य योजना को स्वीकृति दी गई है।
- कुमार राजेन्द्र