23-Jun-2020 12:00 AM
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रा ज्यसभा चुनाव के चलते ही फिलहाल राजस्थान में तनावपूर्ण माहौल बना हुआ है, हालांकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरफ से बार-बार स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। खुले तौर पर अशोक गहलोत के निशाने पर नजर तो भाजपा ही आ रही है, लेकिन सचिन पायलट की तरफ भी कुछ-कुछ संदेह की आंच और लपटें घूम रही हैं। ऐसे में सचिन पायलट को भी सफाई देनी पड़ रही है। अभी मध्य प्रदेश जैसी कोई खिचड़ी भले ही नहीं पक रही हो, लेकिन सचिन पायलट भी नपे-तुले बयान वैसे ही दे रहे हैं जैसे लॉकडाउन से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया के मुंह से बातें सुनने को मिल रही थीं।
अब ये तो है कि सचिन पायलट भी वैसी ही नाव पर सवार हैं, जैसी नाव लेकर सिंधिया कांग्रेसी भंवर में जूझ रहे थे और जब किनारे पहुंचे तो सबसे करीब भाजपा नजर आई और उसी के होकर रह गए। सिंधिया के फैसला ले लेने के बाद सचिन पायलट पर भी निगाहें वैसे ही टिकी थीं, लेकिन सचिन पायलट अभी तक सिस्टम में रहकर ही हालात से जूझने के फैसले पर कायम हैं। इसमें तो कोई शक नहीं कि सचिन पायलट को अशोक गहलोत वैसे ही फूटी आंख भी नहीं सुहाते होंगे जैसे सिंधिया को कमलनाथ।
बहरहाल, राजस्थान के मामले में फिलहाल ये समझना ये जरूरी है कि अगर वास्तव में कोई खतरा है तो वो सिर्फ राज्यसभा सीटों तक ही सीमित है या फिर अशोक गहलोत सरकार पर भी है? एक जुड़ता और ज्यादा अहम सवाल ये भी है कि अगर अशोक गहलोत को लगा कि सरकार जा सकती है तो वो किस हद तक जा सकते हैं? कांग्रेस ने 110 विधायकों को दिल्ली रोड पर जयपुर के एक रिसॉर्ट में ठहराया है। विधायकों में निर्दलीय भी हैं। विधायकों के साथ ऐसा व्यवहार हालिया राजनीति में कम से कम दो स्थितियों में जरूर हो रही है- एक, जब राज्यसभा के चुनाव होने वाले होते हैं और दो, जब किसी राज्य में सरकार बनने या बिगड़ने वाली होती है।
राजस्थान में मामला तो ऊपर से राज्यसभा चुनाव का लगता है, लेकिन क्या पता- मध्य प्रदेश में भी सारी राजनीतिक उठापटक की नींव राज्यसभा चुनाव को लेकर ही पड़ी थी। क्या हुआ और सब कैसे हुआ आपको एक-एक वाकया याद होगा ही। अभी कितने दिन हुए हैं। कुमारस्वामी तो शांत हो गए, लेकिन कमलनाथ तो पलटवार की तैयारी में जुटे हुए हैं। हाल ही में छिंदवाड़ा पहुंचकर भी अपने पुराने तेवर दिखाने की कोशिश कर ही रहे थे। सवाल है कि राजस्थान की राजनीतिक गतिविधियां राज्यसभा चुनाव तक ही सीमित रह जाने वाली हैं या फिर अशोक गहलोत के हाथों की लकीरें भी कमलनाथ की तरह कोई अंगड़ाई ले रही हैं?
राज्यसभा की 3 सीटों के लिए 19 जून को चुनाव होने वाले हैं और 200 सीटों वाली राजस्थान विधानसभा में जीत के लिए हर प्रत्याशी को 51 वोटों की जरूरत होगी। अगर मैदान में तीन ही उम्मीदवार होते तो कोई बात ही नहीं होती, सभी निर्विरोध जीत चुके होते। चार-चार उम्मीदवारों के मैदान में उतर जाने से मामला फंस रहा है। कांग्रेस ने संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल और नीरज डांगी को अपना उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने राजेंद्र गहलोत के साथ-साथ ओंकार सिंह लखावत को भी अपने दूसरे प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतार दिया है।
विधानसभा में संख्या बल के चलते सत्ता में होने और उसके नाते कांग्रेस का पलड़ा भारी है। वैसे कांग्रेस का तो दावा है कि उसे 123 विधायकों का समर्थन हासिल है। कांग्रेस निर्दलियों और बीएसपी से कांग्रेस में शामिल हुए विधायकों को भी जोड़कर पेश कर रही है। भाजपा के पास 72 विधायक हैं और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के तीन विधायक भी उसी का समर्थन कर रहे हैं। गणित के हिसाब से जो समीकरण बन रहे हैं उसमें कांग्रेस भी दो सीटें आराम से जीत जाएगी, लेकिन अगर भाजपा ने ऑपरेशन कमल जैसा कोई कमल दिखाया तो कांग्रेस के लिए राज्यसभा की सीटें जीतनी मुश्किल तो होगी ही अशोक गहलोत के भी कमलनाथ गति को प्राप्त होते देर नहीं लगने वाली है।
मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कह रहे हैं, 'हमारे विधायक बहुत समझदार हैं... वे समझ गए। उन्हें खूब लोभ-लालच देने की कोशिश की गई, लेकिन ये हिंदुस्तान का एकमात्र राज्य है जहां एक पैसे का सौदा नहीं होता। ये इतिहास में कहीं नहीं मिलेगा। मुझे गर्व है कि मैं ऐसी धरती का मुख्यमंत्री हूं जिसके लाल बिना सौदे के, बिना लोभ लालच के सरकार का साथ देते हैं कि सरकार स्थिर रहनी चाहिए राज्य में। और तभी लगे हाथ, अशोक गहलोत भाजपा पर विधायकों की खरीद फरोख्त का इल्जाम जड़ देते हैं। रिजॉर्ट में रखे गए कांग्रेस विधायकों लेकर कोई कह रहा है कि वे पॉलिटिकल क्वारंटीन में हैं तो कोई लॉक-अप रखा हुआ बता रहा है। तभी कांग्रेस सरकार में मंत्री विश्वेंद्र सिंह भरतपुर ट्विटर पर रणदीप सुरजेवाला के साथ एक तस्वीर में पेश होते हैं और समझाते हैं कि सब मजे में है। अशोक गहलोत के हॉर्स ट्रेडिंग के आरोपों पर भाजपा ने साफ-साफ कह दिया है कि किसी को पैसे का कोई ऑफर दिया ही नहीं गया है। यहां तक कि राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट भी ऐसी कोई जानकारी होने से इंकार कर रहे हैं, फिर तो सवाल उठता है कि अशोक गहलोत सरकार बचाने के नाम पर किसी और पॉलिटिकल लाइन पर काम तो नहीं कर रहे हैं?
निशाने पर सचिन पायलट तो नहीं?
राजस्थान में कांगे्रस सरकार के खिलाफ जो भी गतिविधियां होती हैं, उसके लिए सचिन पायलट को शक की निगाह से देखा जाता है। राज्यसभा चुनाव से पहले प्रदेश में जो घटनाएं हो रही हैं, उसमें पायलट को ही टारगेट किया जा रहा है। जबकि कांग्रेस पार्टी के हिसाब से देखें तो राजस्थान में राज्यसभा का ये चुनाव लगभग उतना ही महत्वपूर्ण हो चला है जितना 2017 में गुजरात में हुआ राज्यसभा का चुनाव। वो चुनाव कांग्रेस नेता अहमद पटेल के चलते अहम हो गया था और ये कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के कारण। केसी वेणुगोपाल, राहुल गांधी के उतने ही भरोसेमंद हैं जितने सोनिया गांधी के लिए अहमद पटेल।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी