26-Dec-2020 12:00 AM
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महाराष्ट्र विधानसभा के लिए 2019 में हुए चुनाव के नतीजों से पहले भाजपा के कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं को पूरा भरोसा था कि उनकी पार्टी 288 सदस्यीय सदन में 135-140 सीटें जीतने जा रही है और देवेंद्र फडणवीस एक बार फिर मुख्यमंत्री के रूप में वापसी करेंगे। नतीजों ने सारी उम्मीदें धराशायी कर दीं-भाजपा 105 विधायकों की जीत के साथ साधारण बहुमत के लिए जरूरी 144 सीटों के आंकड़े से काफी पीछे रह गई, और फिर सहयोगी शिवसेना के साथ बढ़ी तकरार ने आखिरकार शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस के बीच गठबंधन का रास्ता खोल दिया।
भाजपा नेताओं को उस समय तो यही लग रहा था ये गठबंधन ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। हालांकि, पार्टी को अब विपक्ष में बैठे करीब एक साल हो गया है और इसके साथ ही एक युवा नेता की अगुवाई में 'विकास सर्वप्रथमÓ एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली एक अपराजेय पार्टी की उसकी छवि भी प्रभावित हो रही है। भाजपा अब धर्मनिरपेक्ष पार्टी वाली छवि को लेकर शिवसेना के खिलाफ माहौल बनाकर महाराष्ट्र के हिंदूवादी वोट बैंक को अपने पाले में लाकर फिर संगठित होने की उम्मीदें लगाए बैठी है।
राजनीतिक टिप्पणीकार प्रकाश बल कहते हैं, 'राजनीतिक समीकरण ऐसे हैं कि भाजपा किसी भी पार्टी को तोड़ने और सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। इसके लिए तो उसे किसी पार्टी को पूरी तरह ही अपने साथ लाना होगा।Ó महाराष्ट्र विकास अघाड़ी में शिवसेना के पास 56 सीटें हैं, एनसीपी के पास 53 (एक विधायक की पिछले महीने मृत्यु होने से आंकड़ा 54 से घट गया) और कांग्रेस के पास 44 विधायक हैं।
बागी अजित पवार के साथ मिलकर बनाई गई फडणवीस की 80 घंटे की नाकाम सरकार का जिक्र करते हुए बल ने कहा, 'जो कुछ हुआ था उसके बाद एनसीपी तो भाजपा के साथ नहीं जाएगी, इसके अलावा न तो कांग्रेस उसके साथ जाएगी और न ही शिवसेना जाएगी। यह स्थिति भाजपा के लिए थोड़ी पेचीदा है और इसीलिए वह अपने राजनीतिक एजेंडे के लिए राजभवन का इस्तेमाल करने और 'धर्मनिरपेक्ष छविÓ को लेकर शिवसेना पर निशाना साधने की कोशिश में जुटी है।Ó एमवीए सरकार के गठन के बाद से ही महाराष्ट्र के राज्यपाल बीएस कोश्यारी के साथ उसके रिश्ते ज्यादा सौहार्दपूर्ण नहीं रहे हैं। कोश्यारी भाजपा के पूर्व पदाधिकारी और कट्टर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थक हैं।
शिवसेना के नेता अक्सर आरोप लगाते रहे हैं कि भाजपा अपनी राजनीति के लिए राजभवन का दुरुपयोग कर रही है। उदाहरण के तौर पर राज्यपाल राज्य विधान परिषद के लिए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को चुने जाने संबंधी कैबिनेट की सिफारिश लटका रहे थे। नियमानुसार 2019 का चुनाव नहीं लड़ने वाले ठाकरे के लिए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण के छह महीने के भीतर दोनों सदनों में से किसी एक का सदस्य बनना जरूरी था। राज्यपाल उस समय भी मुख्यमंत्री के साथ टकराव की स्थिति में नजर आए जब भाजपा मार्च में लॉकडाउन शुरू होने के बाद से ही बंद चल रहे धार्मिक स्थलों को खोलने की मांग को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थी। आखिरकार, राज्य सरकार ने पिछले महीने पूजा स्थल खोलने का फैसला किया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पिछले एक साल के घटनाक्रम ने देवेंद्र फडणवीस की छवि को काफी हद तक प्रभावित किया है और ऐसा लगता है कि विपक्ष के नेता के तौर पर उनका पार्टी में वैसा नियंत्रण नहीं रह गया है जैसा मुख्यमंत्री रहने के दौरान था। राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, 'उद्धव ठाकरे को परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री को यह बताना होगा कि वह महामारी के बीच प्रदर्शन के नाम पर गैर-जिम्मेदाराना तरीके से भीड़ जुटाने वाले भाजपा नेताओं पर लगाम कसें।Ó देसाई ने कहा, 'फडणवीस खुद तो गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार नहीं कर रहे, लेकिन कुछ अन्य लोग हैं जो ऐसा कर रहे हैं। फिर ऐसे नेता भी हैं जो ऐसे बयान देते रहते हैं कि कैसे तीन महीने में, छह महीने में या फिर अब दिवाली के बाद एमवीए सरकार गिर जाएगी। इस सबके बीच फडणवीस कहते हैं कि विपक्ष सरकार को अस्थिर करने के लिए कुछ नहीं कर रहा, वह खुद-ब-खुद गिर जाएगी।Ó उन्होंने कहा, 'इससे पहले, जब वह मुख्यमंत्री थे, तब कोई भी बड़े विवादित बयान नहीं आते थे, लेकिन अब जब विपक्ष के नेता हैं तो ऐसा नहीं रहा।Ó एकनाथ खडसे और जयसिंहराव गायकवाड़ पाटिल जैसे वरिष्ठ नेताओं के इस्तीफे ने भी फडणवीस के नेतृत्व को झटका दिया है। खडसे ने तो खुले तौर पर अपने इस्तीफे के लिए फडणवीस को जिम्मेदार ठहराया है जबकि पाटिल ने कहा था कि वह पार्टी के लिए काम करना चाहते थे लेकिन पार्टी उन्हें मौका नहीं दे रही थी।
देसाई ने कहा, 'विपक्ष में एक साल रहने के बाद भी हम अभी तक यह नहीं कह सकते कि भाजपा ने अपनी जमीन खो दी है। सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों के आयोजन और नेता विपक्ष के व्यापक दौरों के जरिए पार्टी ने दिखा दिया है कि वह अब भी काफी मजबूत स्थिति में है। लेकिन एक एकजुट और जिम्मेदार विपक्षी पार्टी के तौर पर उसकी छवि पर प्रतिकूल असर जरूर पड़ रहा है।Ó
हिंदुत्व बनेगा हथियार
पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने दोहरे उद्देश्य के साथ हिंदुत्व के एजेंडे को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया है। एक तो यह कि शिवसेना को प्रतिक्रिया के लिए उकसाया जाए, जिससे कांग्रेस और एनसीपी के असहज होने और गठबंधन के बीच वैचारिक दरार बढ़ने की उम्मीद है। लेकिन, इससे भी अहम बात यह है कि भाजपा की नजरें 2022 पर टिकी हैं। जब 'मिनी विधानसभा चुनावÓ माने जाने वाले 10 नागरिक निकायों, जिनमें शिवसेना के गढ़ मुंबई और ठाणे शामिल हैं, और 27 जिलों में जिला परिषदों के लिए चुनाव होने हैं। शिवसेना अब चूंकि पूर्व में अपनी वैचारिक विरोधी रही कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला चुकी है, भाजपा को उम्मीद है कि वह शिवसेना की हिंदुत्ववादी पार्टी वाली छवि खत्म कर देगी और 2022 के चुनावों में राज्य में भगवा वोट-बैंक पर पूरी तरह कब्जा कर लेगी।
- बिन्दु माथुर