19-Sep-2020 12:00 AM
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विधानसभा और लोकसभा में परचम लहरा रही भाजपा ने 2022 के उप्र विधानसभा की तैयारी शुरू कर दी है। इसके तहत भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को संजोकर रखने के लिए 'मिशन 7500’ तैयार किया है। दरअसल भाजपा सहकारिता के क्षेत्र में अपने कार्यकर्ताओं को जगह दिलाने की कोशिश में है। भाजपा की नजर उन सहकारी समितियों पर है, जहां शिवपाल यादव का झंडा बुलंद है। पशुपालन, दुग्ध विकास और हथकरघा जैसे अन्य समितियों में चुनाव होने हैं, जिसको लेकर भाजपा ने अपना प्लान तैयार कर लिया है। लोकसभा चुनाव तक शिवपाल यादव पर मुलायम दिख रही भाजपा अब सख्त नजर आ रही है। सहकारिता के लिए अब होने वाले चुनाव के लिए महामंत्री संगठन सुनील बंसल, प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह, सहकारिता मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा, महामंत्री विद्यासागर सोनकर सहित पार्टी पदाधिकारियों ने रणनीति तैयार कर ली है। इसके लिए एक सहकारिता से जुड़े लोगों की बैठक भी बुलाई गई। भाजपा की मानें तो भाजपा कार्यकर्ता सहकारिता को मजबूत करने के उद्देश्य से मैदान में उतर रहे हैं।
उत्तरप्रदेश में यह बैंक ग्रामीण स्तर के माने जाते हैं। इन्हीं बैंकों पर मुलायम परिवार 'तीन दशकों से कब्जा जमाए बैठा हुआ था।’ मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश में सहकारिता आंदोलन को मजबूत करने के लिए गांव-गांव और छोटे-छोटे कस्बों में सहकारिता समितियां बनाई थीं। इसके तहत किसानों, मजदूरों को संगठित करना, उन्हें लोन दिलाना, बैंक स्थापित करना, लैंड डेवलपमेंट करवाना मुलायम का बड़ा योगदान माना जाता है। यही नहीं मुलायम की राजनीतिक मजबूती का सबसे बड़ा आधार यही रहा है।
यहां तक कि मायावती के दौर में भी सहकारी ग्रामीण विकास बैंक पूरी तरीके से 'यादव परिवार के कंट्रोल में ही रहा’, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने इस बार न सिर्फ 'सपा का तिलिस्म तोड़ा’ बल्कि प्रचंड जीत के साथ भविष्य के संकेत भी दे दिए हैं। बता दें कि उत्तरप्रदेश सहकारी ग्रामीण बैंकों के लिए चुनावी प्रक्रिया का प्रावधान है। इन बैंकों की शाखाओं के लिए हुए चुनाव के नतीजे घोषित किए गए जिसमें भाजपा ने 323 शाखाओं में 293 पर जीत दर्ज कर शानदार परचम फहराया है। विपक्ष (जिसमें समाजवादी पार्टी और कांग्रेस शामिल है) को ग्रामीण बैंक की सिर्फ 19 सीटें मिली हैं, जबकि 11 सीटों पर चुनाव रद्द कर दिए गए थे।
सहकारी ग्रामीण बैंकों के चुनाव में कांग्रेस अपनी परंपरागत सीट अमेठी के जगदीशपुर में ही जीत दर्ज करा सकी। दूसरी ओर विपक्षी दलों द्वारा जीती गई अन्य प्रतिष्ठित सीटों में वाराणसी, बलिया, गाजीपुर और इटावा है। इस जबरदस्त जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा कि विपक्षी उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं की। वहीं समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने कहा कि योगी सरकार ने चुनावों को हाइजैक कर लिया था, तभी हमारी हार हुई है।
मुलायम सिंह के छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव वर्ष 2005 से लगातार इस बैंक के अध्यक्ष पद पर रहे हैं। इस बार प्रदेश की योगी सरकार ने सहकारी ग्रामीण बैंकों के नियमों में बदलाव करने से शिवपाल यादव चुनाव नहीं लड़ सके हैं। प्रदेश में सहकारी ग्रामीण विकास बैंक की 323 शाखाएं हैं। प्रत्येक शाखा से एक-एक प्रतिनिधि चुना जाता है। यह निर्वाचित प्रतिनिधि सूबे में अब 14 डायरेक्टर्स का चुनाव करेंगे, जिसमें से एक सभापति और उपसभापति चुना जाएगा। इन जीते हुए शाखा प्रतिनिधियों द्वारा बैंक की प्रबंध कमेटी के सदस्यों का निर्वाचन 22 और 23 सितंबर को किया जाएगा। इस चुनाव के बाद अब बैंक के प्रबंध कमेटी पर भाजपा का नियंत्रण हो जाएगा और 23 सितंबर को बैंक के सभापति, उप सभापति और अन्य समितियों में भेजे जाने वाले प्रतिनिधियों का चुनाव होना है। बता दें कि उप्र सहकारी ग्रामीण बैंकों में शिवपाल यादव की 'बादशाहत’ अभी तक कायम थी। पिछले दिनों शिवपाल की भाजपा सरकार से नजदीकियां भी सुर्खियों में रही थीं। इसके बावजूद उन्हें इन चुनावों में कोई फायदा नहीं मिल सका है। इन सहकारी बैंकों के चुनावों में शिवपाल अपनी और पत्नी की सीट बचाने में बड़ी मुश्किल से कामयाब हो सके हैं।
वैसे कहने के लिए तो सहकारिता किसानों, मजदूरों, गरीब लोगों के लिए एक हथियार था, लेकिन आंदोलन कहीं और रह गया और विभाग राजनीतिक कार्यकर्ताओं को उपकृत करने का यंत्र बन गया। अब भाजपा की निगाहें इस पर लग गई हैं। 2022 विधानसभा चुनाव से पहले सहकारिता के पशुधन, दुग्ध विकास, हथकरघा जैसे क्षेत्र में चुनाव होने हैं, वहां भाजपा अपने कार्यकर्ताओं की एडजस्ट करने की जुगत में है। अभी तक सहकारिता में जहां-जहां चुनाव हुए हैं। वहां-वहां भाजपा का कब्जा नजर आ रहा है। समितियों का चुनाव सितंबर में होना है, जिस पर भाजपा की निगाहें लगी हुई हैं। 7500 सहकारी समितियों पर कब्जा अब भाजपा का लक्ष्य है।
समाजवादी पार्टी का दबदबा 1991 से
बात 1977 की है। जब उप्र सरकार में मुलायम सिंह यादव ने सहकारिता मंत्रालय संभाला था। दरअसल प्रदेश का सहकारिता विभाग पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल से याद किया जाता है। बता दें कि 1991 से अब तक सहकारिता के क्षेत्र में समाजवादी पार्टी और मुलायम सिह यादव के परिवार का दबदबा बना हुआ था। उसके बाद मुलायम सिंह यादव ने अपने छोटे भाई शिवपाल सिंह यादव को सहकारी ग्रामीण बैंकों का मुखिया बना दिया था। इन बैंकों पर शिवपाल सिंह यादव की इतनी तगड़ी पकड़ हो चुकी थी कि बसपा भी उसे नहीं तोड़ सकी थी, जबकि 2007 से 2012 तक मायावती पांच साल तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं। बसपाकाल में सपाइयों ने कोर्ट में मामला उलझाकर चुनाव नहीं होने दिए थे और अपने सियासी वर्चस्व को बरकरार रखा था। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी और योगी सरकार ने सहकारी समितियों से समाजवादी पार्टी और शिवपाल यादव का किला ध्वस्त कर दिया है।
- लखनऊ से मधु आलोक निगम