26-Dec-2020 12:00 AM
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उप्र विधानसभा चुनाव में भले ही अभी साल से अधिक समय शेष है लेकिन राजनीतिक दलों ने अपने सियासी समीकरण और गठजोड़ बनाने शुरू कर दिए हैं। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सहित अन्य दल भी अपने-अपने मुहरे फिट करने में जुटे हुए हैं। उप्र की वर्तमान राजनीति पर गहराई से गौर करें तो पता चलता है कि यहां विपक्ष की करीब-करीब सभी राजनीतिक पार्टियां भाजपा की चुनावी रणनीति पर काम कर रही है। यही रणनीति भाजपा ने पिछले उप्र विस चुनावों में अपनाई थी जो काफी सफल रही थी। अब इसी रणनीति पर करीब-करीब सभी बड़े राजनीतिक दल काम कर रहे हैं। कांग्रेस ग्रामीण स्तर पर इसी रणनीति को साध रही है।
दरअसल, भाजपा ने पिछले चुनावों में बड़े राजनीतिक दल यथा सपा और बसपा से उलट वहां से स्थानीय और छोटे-छोटे राजनीतिक दलों से संपर्क साधा था। उप्र में दर्जनभर से अधिक छोटे राजनीतिक दल हैं। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में सुभासपा को 8 और अपना दल को 11 सीटें दीं जबकि खुद 384 सीटों पर मैदान में लड़ी थी। इसके दूसरी ओर पिछली सत्ता में काबिज सपा ने कांग्रेस से गठबंधन किया। बसपा ने अलग चुनाव लड़ा लेकिन किसी को भी उतनी सफलता हासिल नहीं हुई जितनी मिलनी चाहिए थी। भाजपा ने विजय पताका यादवों के गढ़ में फहराई।
अब इसी सफल और कारगर रणनीति पर अन्य राजनीतिक दल भी चल रहे हैं। इनमें सबसे आगे है अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, जो सबसे अधिक छोटे दलों को साध रही है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव अब बड़े दलों के बजाय छोटे दलों के साथ हाथ मिलाने के फॉर्मूले को लेकर चल रहे हैं। अखिलेश यादव लगातार यह बात कह रहे हैं कि 2022 में बसपा और कांग्रेस जैसे दलों के साथ गठबंधन करने के बजाय छोटे दलों के साथ मिलकर लड़ेंगे। इस कड़ी में सपा ने महान दल के साथ हाथ मिलाया और हाल ही में हुए उपचुनाव में चौधरी अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के लिए एक सीट छोड़ी थी जिसके यह संकेत हैं कि आगे भी वह अजित सिंह के साथ तालमेल कर सकते हैं।
जनवादी पार्टी के संजय चौहान सपा के चुनाव चिन्ह पर चंदौली से लोकसभा चुनाव लड़कर हार चुके हैं। वर्तमान में भी चौहान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ सक्रिय हैं। इसके अलावा अखिलेश ने सपा से विद्रोह कर प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) बनाने वाले अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव की सीट पर 2022 में प्रत्याशी न उतारने की बात कह कर साफ कर दिया है कि उन्हें भी एडजस्ट किया जा सकता है। हालांकि अखिलेश की मंशा लोहिया का सपा में विलय करने की है और इस बारे में उन्होंने शिवपाल को बताया भी है लेकिन शिवपाल केवल गठबंधन के लिए राजी हैं। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह के छोटे भाई शिवपाल यादव ने विलय की बात से साफ इनकार कर दिया है और विस चुनाव के करीब आते ही एक बार फिर सियासी जमीन तलाशना शुरू कर दिया है। इधर, 2019 में हुए लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने मायावती के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा लेकिन सपा को बहुत लाभ नहीं मिला। सपा सिर्फ पांच सीटों पर ही रह गई लेकिन बसपा को 10 सीटें जरूर मिल गईं। यही वजह है कि अखिलेश अब बसपा के साथ गठजोड़ करने में ज्यादा इच्छुक नहीं हैं। राज्यसभा चुनावों में एक सीट पर उलटफेर करने के चक्कर में वैसे भी मायावती अखिलेश यादव से खफा हैं।
उप्र में कांग्रेस भी इस बार नए प्रयोग की तैयारी में है और वह भी इस बार चुनाव में छोटे दलों से समझौता कर चुनाव लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। प्रियंका गांधी लगातार मृतप्राय पार्टी में प्राण फूंकने का काम कर रही है। कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने बताया कि अभी हमारी कोशिश पार्टी संगठन को ग्राम स्तर पर मजबूत करने की है जिसे दिसंबर तक पूरा कर लिया जाएगा। इसके बाद गठबंधन को लेकर कोई बात करेंगे लेकिन हमारी कोशिश जरूर है कि सूबे के जो भी छोटे दल हैं उन्हें साथ लेकर चलें। कांग्रेस पहले भी छोटे दलों को सियासी तरजीह देती रही है। कांग्रेस ग्राम स्तर पर लगातार छोटे दलों को साध रही है।
अब बात करें भीम आर्मी प्रमुख और उभरते दलित नेता चंद्रशेखर आजाद की, जिन्होंने भीम आर्मी के राजनीतिक फं्रट आजाद समाज पार्टी के बैनर तले उपचुनाव के जरिए सियासी एंट्री की है। आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार को बुलंदशहर में मिले मतों के आधार पर चंद्रशेखर दलित समाज में अपनी पैठ मजबूत करने में कामयाब हो रहे हैं।
होने लगे गठबंधन
उप्र के पांच स्थानीय दलों ने बड़े दलों के साथ जाने के बजाय आपस में ही हाथ मिलाकर चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। सुहेलदेव भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व में बाबू सिंह कुशवाहा की जनाधिकार पार्टी, अनिल सिंह चौहान की जनता क्रांति पार्टी, बाबू रामपाल की राष्ट्र उदय पार्टी और प्रेमचंद्र प्रजापति की राष्ट्रीय उपेक्षित समाज पार्टी ने भागीदारी संकल्प मोर्चा के नाम से नया गठबंधन तैयार किया है। ये उप्र की पिछड़ी जातियों के नेताओं का गठबंधन है जिसका ऐलान ओमप्रकाश राजभर ने दो दिन पहले ही किया है। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी के समाज की जहां भागीदारी होगी, वहां पर वो पार्टी चुनावी मैदान में किस्मत आजमाएगी। उप्र में पिछड़े वर्ग में प्रभावी कुर्मी समाज से आने वालीं सांसद अनुप्रिया पटेल इस दल की अध्यक्ष हैं जबकि अति पिछड़े राजभर समाज के नेता ओमप्रकाश राजभर सुहेलदेव भाजपा का नेतृत्व करते हैं। भाजपा को 312, राजभर को 4 और अपना दल (एस) को 9 सीटों पर जीत मिली थी। हालांकि ओमप्रकाश राजभर ने बाद में पिछड़ों के हक का सवाल उठाते हुए भाजपा से नाता तोड़ लिया है। ऐसे में भाजपा और अपना दल (एस) अभी भी एक साथ हैं और माना जा रहा है कि 2022 में फिर एक साथ चुनावी मैदान में उतर सकते हैं।
- लखनऊ से मधु आलोक निगम