वर्ष 1962 के आम चुनावों में पूरी ताकत लगाने के बावजूद अपेक्षित सफलता न मिलने के बाद समाजवादी पुरोधा डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया था। इस नारे के आलोक में 1967 में हुए आम और विधानसभा चुनावों में सात राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार कांग्रेस इन राज्यों में विपक्ष में बैठी। तब डॉक्टर लोहिया ने गैर कांग्रेसी सरकारों से कहा था, 'बिजली की तरह कौंध जाओ और सूरज की तरह स्थायी हो जाओ।Ó इन शब्दों में लोहिया का गैर कांग्रेसी सरकारों के लिए संदेश था, जनहित में जल्दी-जल्दी चौंकाने वाले काम करो और लोगों के दिलों के बीच स्थायी रूप से छा जाओ। लेकिन गैर कांग्रेसी सरकारें लोहिया का यह संदेश ग्रहण नहीं कर पाईं। कुछ ही दिनों बाद पहले उत्तर प्रदेश और फिर मध्य प्रदेश में गैर कांग्रेसी सरकारों का पतन हो गया। आजादी के बाद नरेन्द्र मोदी पहले गैर कांग्रेसी नेता रहे, जिन्होंने खुद के दम बहुमत पाया। लोहिया के उन्हीं शब्दों को उधार लें तो वे बिजली की तरह कौंधे और सूरज की तरह छा गए। 2014 और 2019 के आम चुनावों में जिस तरह उन्होंने बड़ी जीत हासिल की, उससे माना जा सकता है कि उन्होंने जल्दी-जल्दी चौंकाने वाले काम किए और लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे। उनकी इस कामयाबी का स्वाद कई राज्यों में भाजपा ने भी चखा। लेकिन पिछले एक साल से जिस तरह राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की हार-दर-हार होती जा रही है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि भाजपा के मुख्यमंत्री सूरज की तरह स्थायी कहां तक होते, बिजली की तरह कौंध भी नहीं पा रहे हैं। महाराष्ट्र और झारखंड के भाजपा के मुख्यमंत्रियों को लेकर तो इतना कहा ही जा सकता है। अक्टूबर के चुनावों में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने अपने दम पर सरकार बनाने की कोशिश की, मनमाने तरीके से टिकटों का बंटवारा किया, एकनाथ खड़से जैसे नेता को किनारे लगाया और अब तो आरोप है कि पार्टी की दूसरी बड़ी कद्दावर नेता पंकजा मुंडे को परली विधानसभा सीट पर हराने में पार्टी का अंदरूनी हिस्सा भी सक्रिय रहा, उसका असर यह हुआ कि महाराष्ट्र में 2014 के विधानसभा चुनावों में हासिल 122 सीटों की तुलना में 105 सीटें ही हासिल हुईं। कुछ वैसा ही झारखंड में हुआ। दिसंबर में हुए चुनावों में रघुबरदास की अगुवाई वाली भाजपा की इज्जत बचाने लायक हार हुई। पार्टी 33.7 प्रतिशत मत पाकर सबसे ज्यादा वोट पाने वाला दल जरूर रही, लेकिन वह सत्ता से दूर हो गई। रघुबरदास की मनमानी की वजह से भारतीय जनता पार्टी के राज्य के कद्दावर नेता सरयू राय ने न सिर्फ बागी रूख अख्तियार किया, बल्कि जमशेदपुर में अजेय समझे जाते रहे रघुबरदास को हार का स्वाद चखने के लिए भी मजबूर कर दिया। भाजपा की हार की एक बड़ी वजह यह भी रही है कि केंद्रीय नेतृत्व ने राज्यों में कठपुतली नेतृत्व को आगे बढ़ाया है। यह अमित शाह की कमी मानी जा सकती है। भाजपा से जुड़े सूत्र कहते हैं कि अमित शाह के इर्द-गिर्द वाह-वाही करने वाले लोगों की टीम जुट गई है और वे पार्टी के लिए उचित सलाह देने की जगह सिर्फ और सिर्फ उनकी वाहवाही करती रहती है। 1996 की तरह सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए सुषमा स्वराज ने कांग्रेस की ओर सवाल उछाला था कि कहां है आपका दूसरी पंक्ति का नेतृत्व। उन्होंने अपनी यानी भाजपा की ओर का उदाहरण देते हुए कहा था कि हमारे पास वेंकैया नायडू, प्रमोद महाजन, अनंत कुमार, अरुण जेटली जैसे दूसरीं पंक्ति के नेता हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश अमित शाह के उभार के दौर में भाजपा में दूसरी पंक्ति के नेता ही नजर नहीं आ रहे। खुदा न खास्ता कोई उभरने की कोशिश करता है तो उसे उभरने ही नहीं दिया जाता है। अंग्रेजी में जिसे 'यस मैनÓ कहा जाता है, राज्यों में केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से ऐसे ही नेताओं को सत्ता दी जा रही है। एक दौर था कि मध्य प्रदेश में सुंदरलाल पटवा, उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह, हिमाचल प्रदेश में शांता कुमार और राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत जैसे मुख्यमंत्री थे, जिनका कद भारतीय जनता पार्टी की पहली पंक्ति के नेताओं जैसा था। भाजपा बेशक बड़ी हो गई है। लेकिन अब उसके पास ऐसे नेताओं की भारी कमी है और ऐसे नेता बनाने की उसकी अंदरूनी प्रक्रिया पर जैसे ब्रेक लग गया है। इसलिए जरूरी है कि पार्टी एक बार फिर इस तरफ सोचे। भाजपा अगर राज्यों में कद्दावर नेतृत्व नहीं उभार पाई तो निश्चित तौर पर यह उसके भविष्य के लिए अच्छा नहीं होगा। भाजपा एक दौर में ब्राह्मण-बनिया की पार्टी कही जाती रही है और उसके विरोधी उसकी इस हेतु आलोचना करते रहे हैं। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में उसने मान लिया है कि ब्राह्मण और ठाकुर वोट जाएंगे कहां, उसके ही पास आएंगे। इसलिए उसने ब्राह्मण नेतृत्व को किनारे लगाना शुरू कर दिया है। लेकिन इतिहास गवाह है कि गंगा-यमुना के मैदान में उसी ने राज किया है, जिसने ब्राह्मणों पर भरोसा किया है। ब्राह्मण समुदाय चूंकि ज्यादा बोलता है, इसलिए वह पार्टी के लिए माहौल बनाता है। पिछड़ी और आदिवासी जातियां अपने जातीय हक के लिए सिर उठा सकती हैं, लेकिन मौजूदा माहौल में ब्राह्मण नहीं उठा सकता। लेकिन उसके मन में कसक तो रहती ही है और उपेक्षित होने के बाद वह मायूस हो जाता है। इसका भी असर है कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता निराश हो रहे हैं और वे वोटरों को घरों से बाहर लाने के लिए उत्साह से काम नहीं कर रहे हैं। भारतीय शासन व्यवस्था में कार्यकर्ताओं को कमाने देने की जो परिपाटी विकसित हुई है, उस परिपाटी से चूंकि स्वच्छता का दावा करने वाली भाजपा अलग रहती है। भाजपा में कार्यकर्ताओं को समायोजित करने का ढंग नहीं है। वह कांग्रेस और दूसरे दलों की तरह अपने कार्यकर्ताओं को खुश नहीं रखती, इसका भी असर है कि अब कार्यकर्ता नाराज हो रहा है और वह पार्टी के साथ खड़ा होने से हिचक रहा है। यह सच है कि केंद्रीय स्तर पर तीन तलाक, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत योजना, किसान सम्मान निधि और प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी कल्याणकारी योजनाएं भाजपा ने लागू की। अव्वल तो इनसे जिन्हें फायदा मिले, उन्हें तो भाजपा का वोटर होना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक मशीनरी राज्यों के पास है और केंद्र की चाहे कितनी भी महत्वाकांक्षी योजना क्यों ना हो, उसे राज्यों के जरिए ही लागू किया जाता है। लेकिन इन योजनाओं को लागू करने वाला प्रशासनिक तंत्र बेहद भ्रष्ट है और दुर्भाग्य की बात है कि भाजपा शासित राज्यों में भी इस तंत्र को काबू करने की कोशिश नहीं हुई। केंद्रीय स्तर पर सत्ता का विकेंद्रण कम ही हुआ और अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुली छूट दी। अधिकारी सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय की सुनते हैं और मंत्रियों तक की नाफरमानी करते हैं। नौकरशाही बेलगाम हो चुकी है। इसीलिए अच्छी और भली योजनाएं लागू नहीं हो रही हैं। इससे भी जनता नाराज है। राज्यों में हो रही भाजपा की हार की एक वजह यह भी है कि अब जनता समझदार हो गई है। अनुच्छेद 370 का हटाना, नागरिकता कानून में संशोधन और राम मंदिर के निर्माण की राह को खोलने से व्यापक हिंदू समाज को आप खुश तो कर सकते हैं, लेकिन आज का वह समाज भी मानता है कि ये सब राष्ट्रीय मुद्दे हैं और राष्ट्रीय स्तर पर इनके लिए वे भाजपा को समर्थन दे सकते हैं। लेकिन राज्य स्तर पर तो वे उन्हें ही समर्थन देंगे, जो उनके रोजगार, रोटी और बेहतर जिंदगी का इंतजाम कर सकते हैं। लगता है कि भाजपा इन तथ्यों को नहीं समझ रही। बीजेपी को कितना बदल पाएंगे नड्डा? अक्सर मुस्कराते दिखाई देने वाले जेपी नड्डा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए हैं। नड्डा की मोदी से पुरानी राजनीतिक जान-पहचान है और वह उनके नजदीकी भी रहे हैं। राजनीतिक जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखने वाले जेपी नड्डा के पास संगठन और सरकार में काम करने का लंबा अनुभव है। नड्डा को आरएसएस की पसंद माना जाता है, लेकिन क्या वह बीजेपी को अमित शाह की छाया से बाहर निकाल पाएंगे? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से नड्डा का नजदीकी और लंबा रिश्ता रहा है। बीस साल पुरानी एक घटना है। तब नरेन्द्र मोदी बीजेपी के पंजाब, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और चंडीगढ़ के प्रभारी थे। हिमाचल में फरवरी, 1998 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस को बराबर-बराबर 31-31 सीटें मिली थीं। कांग्रेस से अलग हुए नेता और भ्रष्टाचार से चौतरफा घिरे सुखराम की पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस को 5 सीटें मिली थीं। उस वक्त बीजेपी के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता शांता कुमार ने सुखराम की पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। मोदी की रणनीति, नड्डा का साथ मोदी के लिए यह पहला मौका था, अपनी राजनीतिक कुशलता दिखाने का। मोदी हिमाचल में बीजेपी की सरकार बनाना चाहते थे। मोदी ने रणनीति बनाई और जगत प्रकाश नड्डा ने उसे अमलीजामा पहनाने में अहम भूमिका निभाई। बीजेपी ने हिमाचल विकास कांग्रेस के चार विधायकों, कांग्रेस के एक नाराज विधायक और एक निर्दलीय विधायक को अपने पक्ष में कर लिया और बीजेपी के व अन्य सभी विधायकों को हिमाचल से हरियाणा के पंचकूला ले जाया गया। फिर पंचकूला से चंडीगढ़ के शिवालिक व्यू होटल में रखा गया। उस दौरान मैं भी वहां मौजूद था। लेकिन हिमाचल प्रदेश के इंटेलीजेंस के अफसरों को भनक लग गई, इसलिए उन्हें वहां से हटाना जरूरी था। तब मोदी ने हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल से बात की और विधायकों को कुरुक्षेत्र में सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। लंबी सियासी कसरत के बाद प्रेम कुमार धूमल मुख्यमंत्री बने और उस सरकार में नड्डा स्वास्थ्य और संसदीय कार्यमंत्री बनाए गए। तब से मोदी और नड्डा का रिश्ता बरकरार रहा। अक्सर हिमाचली टोपी लगाए रखने वाले नड्डा का जन्म दिसम्बर, 1960 में पटना में हुआ था, जहां उनके पिता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी रहे। - दिल्ली से रेणु आगाल