सांसद निधि पर नकेल जरूरी
26-Dec-2020 12:00 AM 1277

 

सांसद निधि पर कोरोना की काली छाया पड़ गई है। संक्रमणकाल के दौर में केंद्र सरकार ने देशभर के सांसदों को संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य कराने के लिए प्रतिवर्ष दी जाने वाली सांसद निधि पर इस बार रोक लगा दी है। बीते तीन वर्षों तक सांसदों को निधि जारी नहीं की जाएगी। इसके चलते सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में कार्यकर्ताओं और ग्रामीणों के मनमुताबिक विकास कार्य को अंजाम नहीं दे पाएंगे। जाहिर है इसके चलते सांसदों को मतदाताओं की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। 

केंद्र सरकार ने कोरोना महामारी को ध्यान में रखते हुए सांसद क्षेत्र विकास निधि के तहत होने वाले कार्यों को दो साल के लिए बंद कर दिया है, परंतु आने वाले समय में उसको इस मामले में कोई दो टूक निर्णय करना पड़ेगा। यानी इसे दोबारा शुरू किया जाए या हमेशा के लिए बंद कर दिया जाए। कई विवेकशील सांसदों, नेताओं तथा संस्थानों ने इसे हमेशा के लिए बंद करने के पक्ष में समय-समय पर अपनी राय दी है। याद रहे कि इस निधि के उपयोग में गड़बड़ियां लाख कोशिशों के बावजूद दूर नहीं हो पा रही हैं। इसके कारण राजनीति, राजनेता और सरकारी अधिकारियों की साख दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। इसका दुष्परिणाम सरकार के अन्य कामों पर भी पड़ रहा है। अपवादों को छोड़कर इससे अनाप-शनाप दामों पर चीजें खरीदी जा रही हैं। हालांकि इसके व्यय को लेकर सरकार के दिशा-निर्देश मौजूद हैं, पर जरूरत इसे कानूनी रूपरेखा प्रदान कराने की है।

अदालतें, कैग, केंद्रीय सूचना आयोग और पूर्ववर्ती योजना आयोग समय-समय पर सांसद निधि के दुरुपयोग के खिलाफ टिप्पणियां कर चुके हैं। वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाले द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने तो 2007 में ही इसकी समाप्ति की सिफारिश कर दी थी। तब उसने कहा था कि सुशासन के लिए यह जरूरी है कि सांसद निधि को पूरी तरह बंद कर दिया जाए। हालांकि इसके बावजूद लोक लेखा समिति के तत्कालीन प्रमुख और कांग्रेस नेता केवी थॉमस ने कहा था कि कई दलों के तमाम सांसद यह चाहते हैं कि सांसद निधि की सालाना राशि को पांच करोड़ रुपए से बढ़ाकर 50 करोड़ रुपए कर दिया जाए। शुक्र है कि ऐसा कुछ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो नहीं होने दिया, किंतु इस निधि को समाप्त करने की मांग भी अभी पूरी नहीं हुई है। हां, इस बीच इसके भविष्य पर विचार-विमर्श करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति जरूर बना दी गई है। वैसे राजनीतिक हलकों में आम धारणा यह है कि अधिकांश सांसद इसे समाप्त करने के सख्त खिलाफ हैं। जो सांसदगण इस निधि को लेकर अपनी बदनामी से बचना चाहते हैं, वे विश्वविद्यालय या फिर किन्हीं प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं को एकमुश्त राशि दे देते हैं। आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभवत: इस निधि को लेकर कोई कड़ा कदम उठाना चाहेंगे, क्योंकि वह इसके दुरुपयोग या फिर कम उपयोग की खबरों से अनभिज्ञ नहीं हैं। साथ ही वे राजनीति और प्रशासन में शुचिता लाने के लिए दिन-रात प्रयत्नशील भी हैं।

अब जरा इस निधि के इस्तेमाल को लेकर आए दिन मिल रही शिकायतों के बारे में विचार करें। इस निधि को लेकर केंद्र सरकार ने एक नोडल एजेंसी बना रखी है। इसका काम राज्य एवं जिला स्तर पर समन्वय बनाए रखना है। जांच से पता चला है कि आमतौर पर कोई समन्वय नहीं हो पाता। अपवादों की बात और है। सांसद निधि के खर्चे की जब कैग ने जांच की तो उसे 90 प्रतिशत योजनाओं के कार्यों में अनियमितता नजर आई। तत्कालीन योजना आयोग ने 2001 में ही कह दिया था कि इस निधि के खर्चे की निगरानी का काम बहुत कमजोर है। लोक लेखा समिति ने 2012 में कहा कि जितनी निधि उपलब्ध रहती है, उसकी आधी ही खर्च हो पाती है। खर्चे का हिसाब एवं प्रगति रिपोर्ट भी समय पर उपलब्ध नहीं होती। इनमें पारदर्शिता का अभाव है। याद रहे कि सांसद निधि में कमीशन लेने के कारण एक राज्यसभा सदस्य की सदस्यता तक जा चुकी है। इसके अलावा विधायक निधि मंजूर करने के लिए रिश्वत लेने के आरोप में बिहार के एक विधायक के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र भी दाखिल किया जा चुका है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा सांसदों को संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य के लिए प्रतिवर्ष सांसद निधि के तौर पर पांच करोड़ रुपए दिए जाते हैं। इस बार सांसद निधि को पीएम केयर्स फंड में समाहित कर दिया गया है। वर्ष 2020-21 व वर्ष 2021-22 की पूरी निधि पीएम केयर्स फंड में जमा होगी। कोरोना के बढ़ते संक्रमण का एक असर यह भी हुआ कि वर्ष 2018 के लिए केंद्र सरकार ने सांसद निधि की पहली किश्त ढाई करोड़ रुपए की जारी कर दी थी। दूसरी किश्त अब तक जारी हो जानी थी। दूसरी किस्त जारी होने की प्रत्याशा में बिलासपुर संभाग के अंतर्गत आने वाले लोकसभा क्षेत्र के सांसदों ने संसदीय क्षेत्र में विकास कार्य के लिए जिला योजना मंडल में प्रस्ताव भी भेज दिया है। प्रस्ताव के साथ ही सांसदों ने अपनी टीप में आवश्यक कार्यों को कराने के लिए तकनीकी जांच पड़ताल के बाद स्वीकृत करने की छूट भी जिला योजना मंडल को दे दी है। अब तक दूसरी किश्त की राशि भी नहीं आ पाई है। जानकारी के अनुसार दूसरी किश्त ढाई करोड़ में से एक करोड़ रुपए केंद्र सरकार ने पीएम केयर्स फंड में जमा करा दी है। लिहाजा अब सांसद निधि के रूप में एक करोड़ रुपए ही सांसदों के खाते में जमा कराई जाएगी। एक करोड़ रुपए खाते में जमा कराने को लेकर भी संशय बना हुआ है।

साल 1993 से ये योजना लगातार चल रही थी। लेकिन फिर आया 2020। और अपने साथ लाया कोरोना का वायरस। इससे लड़ने के लिए देश में लॉकडाउन कर दिया गया। सारी गतिविधियां ठप हो गईं और फिर तय किया गया कि देश के सांसदों को मिलने वाली सालाना पांच करोड़ की रकम अब अगले दो साल तक नहीं दी जाएगी। देश में सांसदों की कुल संख्या है 790। इसमें 545 लोकसभा सदस्य हैं और 245 राज्यसभा के सदस्य। पांच करोड़ रुपए साल के लिहाज से इन सांसदों की दो साल की निधि हो रही है 7900 करोड़ रुपए। इसी का इस्तेमाल कोरोना के खिलाफ चल रही लड़ाई में किया जाएगा। इसे देखते हुए उप्र सरकार ने भी विधायकों को मिलने वाले फंड को एक साल के लिए रोक दिया और इससे बचने वाले 1209 करोड़ रुपए को कोरोना से लड़ने वाले फंड में इस्तेमाल करने का फैसला किया। लेकिन पहले बात करते हैं सांसद निधि की। सांसद निधि लोकसभा के सांसद और राज्यसभा के सांसद दोनों की ही होती है। राज्यसभा के सांसद में राष्ट्रपति की ओर से नियुक्त सांसद भी हैं, जिन्हें सांसद निधि मिलती है। इनके पास ये अधिकार होता है कि अपने संसदीय क्षेत्र में हर साल ये पांच करोड़ रुपए तक के विकास के काम कर सकते हैं। राज्यों के विधायकों के साथ भी यही होता है। हालांकि हर राज्य के विधायक की निधि अलग-अलग होती है। दिल्ली जैसे राज्य में एक विधायक हर साल 10 करोड़ रुपए तक के विकास का काम करवा सकता है। पंजाब और केरल के विधायक हर साल पांच करोड़ रुपए तक के विकास का काम करवा सकते हैं। उप्र के विधायक पहले दो करोड़ रुपए तक का काम हर साल करवा सकते थे, लेकिन अब उनका फंड बढ़ाकर तीन करोड़ रुपए कर दिया गया है। असम, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और कर्नाटक के विधायक दो करोड़ रुपए तक के विकास के काम हर साल अपने क्षेत्र में करवा सकते हैं।

लेकिन क्या सरकार की ओर से ये पैसे सीधे सांसदों या विधायकों के खाते में जमा कर दिए जाते हैं? जवाब है नहीं। ये पैसे आते हैं स्थानीय प्रशासन के पास। अब सांसद या विधायक स्थानीय प्रशासन जैसे डीएम को पत्र लिखकर अपने क्षेत्र में विकास काम की जानकारी देता है। फिर डीएम उस काम के लिए एजेंसी का चुनाव करता है। एजेंसी काम करती है और फिर डीएम की ओर से उसे पैसे मिल जाते हैं। सांसद के लिए विकास कार्य का मतलब है कि वो अपने इलाके में सड़कें बनवाए, स्कूल की बिल्डिंग बनवाए। इसमें भी एक क्लॉज होता है कि सांसद को अपनी साल की कुल निधि की 15 फीसदी रकम अनुसूचित जाति के विकास के काम पर खर्च करनी होगी और 7.5 फीसदी रकम अनुसूचित जनजाति के विकास पर खर्च करनी होगी। यानि कि पांच करोड़ में से 75 लाख रुपए अनुसूचित जाति के विकास पर खर्च होंगे और 37.5 लाख रुपए अनुसूचित जनजाति के विकास पर खर्च होंगे। हालांकि कोरोना के आने के बाद इस साल के लिए जो सांसद निधि मिली है, उसे सांसद अपने इलाके लिए पीपीई किट और कोरोना टेस्टिंग किट खरीदने पर भी खर्च कर सकते हैं।

अब इस फंड को अगले दो साल तक के लिए रोक दिया गया है। सीधा मतलब है कि अब कोई सांसद अपनी निधि से अपने इलाके में स्कूल की बिल्डिंग, सड़कें, पीने का पानी, शौचालय या फिर विकास का कोई भी छोटा-मोटा काम नहीं करवा सकता है। उसकी जनता भी उससे एक बार भी नहीं पूछ पाएगी कि आपने इलाके के विकास के लिए क्या किया है, क्योंकि जनता को भी पता है कि सांसद के पास फंड नहीं है। सांसद भी अपनी जनता के प्रति जिम्मेदार नहीं रह पाएंगे, क्योंकि वो ये कहकर बच जाएंगे कि उनका फंड तो केंद्र सरकार ने रोक लिया है। और ये फंड है मात्र 7900 करोड़ रुपए।

प्रशासन के लिए चिंता का विषय

सांसद-विधायक निधि को लेकर जो आम चर्चाएं होती रहती हैं, वे स्वच्छ प्रशासन के लिए बहुत चिंता पैदा करती हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस निधि में भ्रष्टाचार की आम चर्चा होती है, उसे रोकने के लिए जनप्रतिनिधि सामूहिक रूप से आवाज क्यों नहीं उठाते? विडंबना यह है कि कुछ बड़े नेता जब विपक्ष में रहते हैं तब तो वे इस निधि के खिलाफ खूब बोलते हैं, किंतु सत्ता में आने पर उनका रुख ही अलग हो जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। सांसद निधि की शुरुआत 1993 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने की थी। उन्होंने इसकी सालाना राशि एक करोड़ रुपए रखी थी। यह जब हो रहा था, तब राव सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह विदेश दौरे पर थे। बाद में उन्होंने कहा कि 'यदि मैं तब देश में होता तो इस सांसद क्षेत्र विकास योजना की शुरुआत ही नहीं होने देता।Ó याद रहे कि सांसद निधि से मिले चंदे का इस्तेमाल अनेक सांसदगण सियासी खर्चे पर करते हैं। कुछ अन्य सांसद उसका उपयोग कुछ और काम में भी करते हैं। मनमोहन सिंह ने उस समय तो सांसद निधि का विरोध किया, किंतु जब खुद प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने इसकी राशि दो करोड़ से बढ़ाकर पांच करोड़ रुपए कर दी।

सांसद निधि पर सर्जिकल स्ट्राइक होना चाहिए

बहरहाल असल फैसला नरेंद्र मोदी को तब करना होगा जब निधि स्थगन की दो साल की अवधि पूरी हो जाएगी। हालांकि एक बात तो तय है कि सांसद निधि की राशि नहीं बढ़ेगी, परंतु शासन में शुचिता लाने के लिए इसको पूरी तरह समाप्त करने का काम होगा या नहीं? तब तक यह यक्ष प्रश्न कायम रहेगा। वैसे देश के तमाम विवेकशील लोगों की यह राय है कि नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार की पर्याय बनी सांसद निधि पर जरूर सर्जिकल स्ट्राइक करेंगे। इससे शासन में शुचिता लाने के मोदी के प्रयास को भारी बल मिल जाएगा। साथ ही सरकारी खजाने को भी राहत मिलेगी। कोरोना ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना सांसद आदर्श ग्राम पर भी ग्रहण लगा दिया है। सांसद निधि की राशि से सांसदों द्वारा आदर्श ग्राम का विकास किया जाता है। विकास कार्य के दौरान बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता दी जाती है। सांसद आदर्श ग्राम के चयन के बाद सांसद कार्यालय से जिला पंचायत सीईओ को पत्र लिखकर इस बात की जानकारी दी जाती है। केंद्र व राज्य शासन की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के तहत आदर्श ग्राम में फंड स्वीकृत किए जाते हैं।

- दिल्ली से रेणु आगाल

FIRST NAME LAST NAME MOBILE with Country Code EMAIL
SUBJECT/QUESTION/MESSAGE
© 2025 - All Rights Reserved - Akshnews | Hosted by SysNano Infotech | Version Yellow Loop 24.12.01 | Structured Data Test | ^