04-May-2020 12:00 AM
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जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी जिसने भी जिस भावना धार्मिक ग्रंथों को पढ़ा वैसा ही उसे नजर आया। क्या कारण है कि रामायण को लोग पूजते हैं और कुछ लोग महाभारत को घरों में रखना भी वर्जित मानते हैं। रामायण प्रेम, त्याग, कर्तव्य, समभाव और आज्ञापालन जैसे कई आदर्श मूल्यों के साथ-साथ जोड़ने की प्रवृति सिखाती है। जबकि महाभारत इससे बिलकुल उलट है। राग, द्वेष, छल-कपट, राजनीति नैतिकता के ह्रास व बड़ों की अवहेलना के साथ उद्दंडता परिवार तोड़ने और अति महत्वाकांक्षा, अहंकार का चरमोत्कर्ष दिखाती है लेकिन अंत में महाभारत में भी न्याय व सत्य की ही विजय दिखाती है। जबकि दोनों में विष्णु अवतार मौजूद हैं और अधर्म पर धर्म की विजय गाथा है।
रामायण व महाभारत दोनों ही भारतीयों के जीवन, नैतिक विचारों और धार्मिक मान्यताओं को प्रभावित करते हैं। अंतर यह है कि रामायण प्रधानरूप से अलंकृत काव्य के रूप में प्रस्तुत इतिहास है जबकि महाभारत एक शुद्ध इतिहास ग्रंथ है। कहा जाता है भगवान शंकर ने सर्वप्रथम सौ करोड़ श्लोकों में राम भगवान के चरित्र का वर्णन किया था- 'चरितं रघुनाथस्य शतकोटि प्रविस्तरं’, जबकि महाभारत मूल रूप से 'जय संहिता’ थी। महाभारत के पहले ही श्लोक में 'ततो जयमुदीरयेत’ का उल्लेख होता है। जब तुलसीदासजी ने रामचरित मानस लिखी तो उन्होंने इसके संदर्भों का उल्लेख करते हुए 'नाना पुराण निगमागम सम्मतं यत रामायणे निगदितं क्वचितअन्यतोपि’ अर्थात इस ग्रंथ में अनेक प्रकार के पुराणों, रामायण आदि का संदर्भ लिया गया है ऐसा उल्लेख किया है। महाभारत में इस प्रकार के संदर्भ घटनाओं के रूप में बीच-बीच में मिलते हैं पुस्तकों के रूप में नहीं।
दोनों का प्रारंभ राज्यसभा के दृश्य से होता है दोनों में ही सत्य की असत्य पर विजय दिखाई गई है। कुछ समय तक चाहे असत्य का उत्कर्ष दिखाई पड़े परंतु अन्ततोगत्वा सत्य की ही विजय होती है। दोनों ही काव्य अपने-अपने रचयिताओं के शिष्यों द्वारा यज्ञ के शुभ अवसर पर सुनाए गए हैं। दोनों काव्यों में चिरकाल तक आदान-प्रदान होता रहा है और समय के साथ-साथ इन दोनों काव्यों में परिवर्धन एवं परिशोधन होता रहा है। वेदों की भांति प्राकृतिक शक्तियों की उपासना समाप्त हो गई थी। वरुण अश्विन्, आदित्य, उषस आदि वैदिक देवताओं का अस्तित्व समाप्त हो गया था। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश आदि की उपासना की जाती थी। मंदिरों का निर्माण किया जाता था।
दोनों ग्रंथों में सीता और द्रौपदी नामक नायिकाओं का जन्म भी अलौकिक प्रकार से हुआ है, सीता का पृथ्वी से और द्रौपदी का अग्निकुण्ड से। दोनों ग्रंथों में अयोध्या राजकुमारों का जन्म व कौरव-पांडवों का जन्म भी सामान्य नहीं है। द्रौपदी व सीता के पास क्षुधा-तृप्ति की दिव्य शक्ति थी, द्रौपदी के पास अक्षय पात्र और सीता का इंद्र द्वारा दी हुई खीर का अशोकवाटिका में सेवन। दोनों का प्रारंभ राज्यसभा के दृश्य से होता है। सीता स्वयंवर एवं द्रौपदी स्वयंवर में राम व अर्जुन द्वारा धनुर्विद्या का प्रदर्शन करने में, रावण द्वारा सीताहरण व द्रौपदी का जयद्रथ द्वारा हरण होने में, राम तथा पाण्डवों के वनवास में सीता व द्रौपदी के कारण महायुद्ध होने में, देवताओं द्वारा प्रदत्त दिव्यास्त्र प्राप्त करने में राम को सुग्रीव से तथा पाण्डवों की मत्स्यनरेश विराट से मित्रता होने जैसी बातों की समानता मिलती है।
रामायण में एक ही नायक है और वह है राम, लेकिन महाभारत में मुख्य पात्रों के बीच में किसी एक का नायक के रूप में चयन करना कठिन है। रामायण में धर्म की प्रधानता है जबकि महाभारत में शौर्य और कर्म प्रधान हैं। रामायण में राम का रावण के साथ युद्ध करना एक नियति थी जबकि महाभारत में कौरवों व पाण्डवों का युद्ध पारस्परिक द्वेष और ईर्ष्या के कारण ही हुआ। रामायण में सदाचार और नैतिकता का प्राधान्य है। जबकि महाभारत में राजनीति और कूटनीति का प्रधान है। रामायण में वर्ण व्यवस्था कठोर थी जबकि महाभारत के समय तक इसमें शिथिलता आ गई थी। रामायण में जब हनुमान सीता को अपनी पीठ पर बिठाकर उसे राम के पास ले जाने का प्रस्ताव रखते हैं, तो सीता परपुरुष-स्पर्श के भय से उसे अस्वीकार कर देती है। सीता को अपनी चारित्रिक शुद्धि प्रमाणित करने के लिए अग्नि-परीक्षा देनी पड़ती है। किंतु महाभारत में जयद्रथ द्वारा द्रौपदी के अपहरण के पश्चात उसे कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी पड़ती। द्रौपदी पांच पतियों वाली है। अग्नि परीक्षा का चलन महाभारत में नहीं था।
रामायण महाभारत से पहले की रचना है। कारण यह है कि रामायण, महाभारत के पात्रों से अनभिज्ञ थे लेकिन महाभारत के रामोपाख्यान में रामकथा का वर्णन है। रामायण महाभारत की अपेक्षा बहुत ही लघु है भाषा और शैली की दृष्टि से भी दोनों में साम्य है। कुछ उपमाओं, लोकोक्तियों व श्लोकों के अर्थ भी एक समान हैं। दोनों काव्यों में शब्दावली एक जैसी है, उदाहरणार्थ 'नोत्कंठा कर्तुमर्हस’ दोनों काव्यों में पाया जाता है। रामायण की कथा सुश्लिष्ट एवं सुसंबद्ध है। किंतु महाभारत की कथा इतनी सुश्लिष्ट एवं सुसंबद्ध नहीं है। ऐसा प्रतीत होता है कि महाभारत में विभिन्न विषय एक साथ रख दिए गए हों। रामायण एक ही कवि की रचना है, जबकि महाभारत पर अनेक कवियों की छाप है। व्यास, वैशम्पायन व सौति उग्रश्रवा यह तीन तो मुख्य रूप से वक्ता हैं ही। इसीलिए रामायण की शैली में एकरूपता है और महाभारत की शैली में भिन्नता। रामायण की भाषा कलात्मक, परिष्कृत, अलंकृत है, जबकि महाभारत की भाषा प्रभावशाली एवं ओजयुक्त है।
रामायण में आर्यसभ्यता अपने विशुद्ध रूप में मिलती है, जबकि महाभारत के समय में म्लेच्छों का आगमन प्रारंभ हो गया था। लाक्षागृह बनाने वाला पुरोचन म्लेच्छ था। धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर की उत्पत्ति नियोगविधि द्वारा हुई थी। दुर्योधन भरी सभा में द्रौपदी का अपमान करता है और गुरुजन उसे रोक नहीं पाते। दोनों ग्रंथों को नैतिकता और वैवाहिक विचारों में काफी मतभेद है। धार्मिक विश्वास और नैतिक नियमों में भी दोनों ग्रंथों में पर्याप्त अंतर है।
-ओम