03-Sep-2020 12:00 AM
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मप्र की तरह राजस्थान में भी कांग्रेस में असंतोष के बाद सत्ता पर संकट मंडराया था, लेकिन राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने जिस सूझबूझ के साथ इस संकट का सामना और खात्मा किया इससे उन्होंने अपने जादूगरी का एक बार फिर से लोहा मनवा दिया है। मप्र में कमलनाथ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे, लेकिन गहलोत जयपुर से लेकर दिल्ली तक संकट को खत्म करने के लिए मोर्चा संभाले रहे। मुख्यमंत्री गहलोत के अनुभव और जादुई नेतृत्व ने सचिन पायलट और भाजपा की उस योजना को ऐसी पटखनी दी है कि आने वाले कई समय तक राजनीतिक गलियारों में इसका जिक्र होगा। होना भी चाहिए, एक के बाद एक राज्यों में खरीद फरोख्त, दल-बदल कानून की धज्जियां उड़ाकर संविधान की भावना के साथ खिलवाड़ करते हुए जनता की चुनी हुई सरकारें गिर रही हैं। खास बात यह है कि सभी जगह कांग्रेस की ही सरकारें गिर रही हैं, उससे बड़ी बात यह है कि सभी जगह भाजपा की सरकार बन रही है। पूरे देश में कांग्रेस के अब तक 110 विधायक बागी होकर भाजपा से मिलकर नई सरकारें बना चुके हैं। भाजपा लाख सच छुपाए, सच छुप नहीं सकता। राजस्थान के सियासी खेल में भी पायलट और भाजपा का गठजोड़ था, लेकिन यहां कामयाबी नहीं मिल सकी। क्योंकि यहां कांग्रेस के पास अशोक गहलोत जैसा मजबूत अनुभवी नेता बैठा है।
गहलोत ने अपने राजनीतिक चातुर्य से भाजपा और पायलट की रणनीति को ऐसी पटखनी दी कि भाजपा खुद अपने विधायकों को बचाने के काम में लग गई, वहीं पायलट खेमा चुपचाप गहलोत शरणम् गच्च्छामी हो गया। यह मुख्यमंत्री गहलोत की केवल जादूगरी नहीं है बल्कि महाजादूगरी कही जानी चाहिए। मुख्यमंत्री गहलोत ने इतनी तगड़ी किलेबंदी की, कि कांग्रेस खेमे में बैठा एक भी विधायक इधर से उधर नहीं हो सका। सचिन पायलट ने जिस अंदाज के साथ 18 विधायकों को लेकर गहलोत के खिलाफ महासंग्राम शुरू किया था, उन्हें अपनी सारे राजनीतिक हथियार डालकर गहलोत के पास आगे होकर आना पड़ गया। घटनाक्रम कैसे भी चला हो, कुछ भी हुआ हो, गहलोत सरकार गिराने के लिए जिस तरह पायलट अहसाय हो गए, ठीक वैसा ही हाल भाजपा का भी था। गहलोत के द्वारा एक के बाद एक ऐसे निर्णय किए गए कि विपक्षी खेमे के होश उड़ गए। कई राज्यों में कांग्रेस विधायकों का सहारा लेकर कांग्रेस की सरकारों को गिरा चुकी भाजपा की स्थिति तो ऐसी हो गई कि उसके नेताओं ने यह कहकर पल्ला झाड़ने की कोशिश कि यह कांग्रेस का अंदरूनी झगड़ा है, उसे इससे कोई लेना-देना नहीं है। यहां तक कि भाजपा ने एक बार भी नहीं कहा कि गहलोत सरकार अल्पमत में है, उसे बहुमत साबित करना चाहिए। बल्कि नहले पे देहला यह रहा कि गहलोत खुद ही बहुमत लेकर राजभवन पहुंच गए, बोले- बुलाईए विधानसभा का सत्र।
इतनी हिम्मत कौन मुख्यमंत्री कर सकता है, वो भी तब जब उसकी पार्टी के 19 विधायक बागी हो चुके हों। यह काम देश में पहली बार गहलोत सरकार ने करके दिखाया है। गहलोत की रणनीति इतनी मजबूत रही कि भाजपा और पायलट का प्लान हर दिन बदलता चला गया। आखिर में दोनों के पास एक-दूसरे से दूर होने के अलावा कोई चारा नहीं रहा। इस पूरे सियासी संग्राम में जहां एक ओर मुख्यमंत्री गहलोत ने लोकतंत्र और अपनी सरकार को बचाया, बल्कि विधायकों की खरीद-फरोख्त संबंधी ऑडियोटेप जारी कर लोकतंत्र विरोधी मुहिम में शामिल किए जाने वाले हथकंडों को एक्सपोज भी किया। मुख्यमंत्री गहलोत बहुत पहले से यह बात बोलते आ रहे हैं कि देश में चुनी हुई सरकारों को गिराने का षड्यंत्र किया जा रहा है। गहलोत ने बाकायदा अमित शाह का नाम लेकर बोला कि वो हमेशा सरकारें गिराने का ही सपना देखते रहते हैं, लेकिन राजस्थान में ऐसा नहीं होगा। मुख्यमंत्री गहलोत ने पायलट से ज्यादा बड़े हमले भाजपा पर किए, कहा कि भाजपा कि खट्टर सरकार न सिर्फ कांग्रेस विधायकों की मेहमान नवाजी में लगी है बल्कि उनको हरियाणा पुलिस बल के बीच बैठा रखा है।
मुख्यमंत्री गहलोत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को गिराने की बात अच्छी नहीं है। यह नैतिक नहीं है। खुद अपना उदाहरण देते हुए बताया कि भाजपा के भैरोंसिंह शेखावत की बीमारी के मौके पर वो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष थे। कुछ लोगों ने उनकी सरकार को ऐसे मौके पर गिराने का षड्यंत्र रचा। लेकिन खुद गहलोत ने पहल करते हुए उस षड्यंत्र को नाकाम कर दिया। गहलोत बार-बार कहते रहे कि चुनी हुई सरकारों को गिराने की परंपरा अच्छी नहीं है। कम से कम राजस्थान में तो ऐसा किसी भी हाल में नहीं होना चाहिए। चाहे सरकार किसी की भी हो।
पायलट और समर्थकों के सामने विकल्प नहीं
मुख्यमंत्री गहलोत ने सचिन पायलट खेमे के लिए ऐसी स्थिति खड़ी कर दी कि उनके पास दो ही विकल्प बचे, या तो अपने इस्तीफे दे दें या फिर खामोशी के साथ, बिना शर्त लौटकर आ जाएं वापस। हुआ भी वही, मुख्यमंत्री गहलोत से नाराज होकर गए सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद से अशोक गहलोत को हटाने के लिए अपनी सबसे बड़ी और पहली मांग ही छोड़नी पड़ गई। इसी बात को लेकर ही तो पायलट ने बागी बनकर संग्राम शुरू किया था। लेकिन गहलोत ने उन्हें हाशिए पर ला दिया। पायलट दो दिन की और देरी कर देते दो काम होने निश्चित थे, पहला- पायलट के 18 विधायकों का खेमा आधा रह जाता, दूसरा- बाकी बचे विधायकों की विधायकी भी जाती और 6 साल के लिए चुनाव लड़ने से अयोग्य भी साबित हो जाते। यानी कि पूरे राजनीतिक कैरियर पर काफी समय के लिए प्रश्न चिन्ह लग जाता। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस राजनीतिक महासंग्राम को जीतकर साबित कर दिया कि वो अब राजनीति के केवल जादूगर नहीं बल्कि महाजादूगर हो गए हैं।
- जयपुर से आर.के. बिन्नानी