04-Jun-2020 12:00 AM
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उत्तर प्रदेश की सीमा से प्रियंका गांधी की बसें तो लौट गईं, लेकिन राजनीति घुस कर रफ्तार भरने लगी है। ये भले लगता हो कि मजदूरों के नाम पर हुई बसों की राजनीति में प्रियंका गांधी ने योगी आदित्यनाथ पर हमला बोला है, लेकिन असलियत तो ये है कि सबसे ज्यादा घाटे में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और बसपा नेता मायावती हैं। क्या ऐसा नहीं लगता कि योगी आदित्यनाथ और उनकी टीम ने बसों के मामले को बेवजह इतना तूल दे दिया? क्या ऐसा नहीं लगता कि प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अखिलेश यादव और मायावती को फिलहाल पीछे छोड़ दिया है? सबसे बड़ा सवाल तो एक ही है - प्रियंका गांधी की राजनीतिक घेरेबंदी में योगी आदित्यनाथ फंस कैसे जाते हैं?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को शायद ही कभी अखिलेश यादव और मायावती के हाथ मिलाने से घबराहट में देखा गया हो। 2018 के उपचुनावों में जब सपा-बसपा ने गोरखपुर और फूलपुर में संयुक्त उम्मीदवार उतारे तो योगी आदित्यनाथ उसे टिप्पणी के लायक भी नहीं समझते रहे। भाजपा की हार के बाद कहे भी थे कि जरा हल्के में ले लिया गया और नतीजा उलटा हो गया। आम चुनाव में तो खैर बदला भी ले लिए और अखिलेश-मायावती के गठबंधन को एक खास दायरे को लांघने तक नहीं दिया और हाल ये हो गया कि गठबंधन ही टूट गया।
2019 के आम चुनाव में तो योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस को भी सिर्फ एक सीट पर समेट दिया। अब इससे बड़ी बात क्या होगी कि राहुल गांधी को अमेठी से बोरिया बिस्तर समेटने के लिए मजबूर कर दिया, लेकिन ऐसा क्या होता है कि जब भी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश की राजनीति पर धावा बोलती हैं अपने मन की करके ही लौटती हैं। जिन बातों के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार के अफसर प्रियंका गांधी को पहले साफ मना कर देते हैं, बाद में वही काम कांग्रेस नेता के मन मुताबिक करने को मजबूर हो जाते हैं। सोनभद्र में स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने नरसंहार के पीड़ितों से मिलने से ही रोक दिया था और फिर मिलाने के लिए गाड़ी में बैठाकर उस गेस्ट हाउस तक ले गए जहां प्रियंका गांधी को हिरासत में रखा था। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों के दौरान लखनऊ पुलिस ने प्रियंका गांधी के सारे रास्ते रोकने की कोशिश की, लेकिन बाद में पुलिस एक्शन के शिकार लोगों के घरों में जाकर इमोशनल तस्वीरें लेने और ट्वीट करने की पूरी छूट दे दी। बिलकुल वही काम मजदूरों के लिए प्रियंका गांधी की भेजी गई बसों के साथ भी योगी सरकार ने किया है।
फर्ज कीजिए योगी सरकार ने बसों का मामला सीधे-सीधे खारिज कर दिया होता तो कौन-सा पहाड़ टूट जाता? जो राजनीतिक दांव प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश को लेकर चलती हैं, उससे बड़ी चालें कांग्रेस नेतृत्व दिल्ली में चलता है। दिल्ली दंगों का केस ही देख लीजिए। पहले सोनिया गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस कर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को कठघरे मे खड़ा करने की कोशिश की। उसके बाद राष्ट्रपति भवन जाकर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अमित शाह को बर्खास्त करने के लिए ज्ञापन दिलवाया और फिर मीडिया के सामने आकर बयान भी दिलवाया। तुरंत ही भाजपा के कुछ नेताओं ने मोर्चा संभाला और 1984 के दंगों की याद दिलाते ही गुब्बारा फूटकर हवा हो गया।
जबसे कोरोना संकट आया है सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी भी हर रोज किसी न किसी बहाने मोदी सरकार पर हमला बोलते हैं, लेकिन एक-दो भाजपा नेता सामने आते हैं और बड़े आराम से न्यूट्रलाइज कर देते हैं। कई बार तो संबित पात्रा जैसे प्रवक्ताओं के स्तर पर ही मामला शांत हो जाता है। तो क्या उप्र में इतनी हलचल योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक अपरिपक्वता की वजह से मच जाती है? ये सब देखकर तो ऐसा ही लगता है कि योगी आदित्यनाथ अगर प्रियंका गांधी की बसें भेजने की पेशकश को नजरअंदाज कर दिए होते तो ज्यादा सुखी रहते। ये भी तो हो सकता था कि सरकार चुप रहती और कांग्रेस के राजनीतिक हमले का जवाब भाजपा नेता लखनऊ में दे देते और योगी आदित्यनाथ पर आंच तक न पहुंच पाती। अब तो हालत ये है कि ट्विटर पर भी लोग बस पॉलिटिक्स का भरपूर मजा लूट रहे हैं। कई लोग तो कोरोना संकट में सरकारी इंतजामों तक से जोड़ दे रहे हैं।
अखिलेश और मायावती तो हाथ मलते रह गए
उप्र में सत्ताधारी भाजपा के बाद सबसे बड़े विपक्षी दल के तौर पर अखिलेश यादव की सपा है और उसके बाद बसपा। अपना दल के बाद पांचवें पायदान पर रहने वाली कांग्रेस की हैसियत तो इतनी भर बची है कि लोकसभा में रायबरेली से सोनिया गांधी की सीट और विधानसभा में कुल जमा 7 विधायक हैं। फिर ऐसा क्या है कि प्रियंका गांधी की राजनीति का योगी आदित्यनाथ पर असर होता है? यही यक्ष प्रश्न मायावती और अखिलेश यादव के सामने भी होगा ही। जिस कांग्रेस पार्टी को अखिलेश यादव 2017 के चुनावों में गठबंधन के तहत एक-एक सीट के लिए रुला डाले थे उसे उप्र में भाजपा इतना महत्व क्यों देने लगती है? ठीक वैसे ही 2019 में जब सपा-बसपा गठबंधन बना मायावती ने कांग्रेस को आसपास फटकने तक नहीं दिया था, लेकिन वक्त की नजाकत देखिए कि सिर्फ एक या दो बार नहीं बार-बार प्रियंका गांधी बाजी मार ले जा रही हैं और मायावती हों या अखिलेश यादव गुबार देखते रह जाते हैं। देखा जाए तो उन्नाव रेप पीड़ित की मौत के वक्त प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और मायावती तीनों फील्ड में नजर आए थे। वरना, ज्यादातर वक्त सभी ट्विटर से ही आजकल काम चला रहे हैं। प्रियंका गांधी और अखिलेश-मायावती में एक फर्क जरूर नजर आता है, प्रियंका गांधी हर मौके पर फील्ड में उतर जा रही हैं, जबकि अखिलेश यादव और मायावती या तो ट्विटर पर बयान जारी कर रहे हैं या ज्यादा से ज्यादा मीडिया के सामने आकर। जाहिर है फील्ड का ज्यादा असर होता है इसलिए फायदा भी वैसा ही मिलता है।
- लखनऊ से मधु आलोक निगम