20-Oct-2020 12:00 AM
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उत्तर प्रदेश में बाजी पलट रही है! प्रियंका गांधी ने साबित कर दिया है कि राज्य में असली विपक्ष वही हैं। कांग्रेस के कार्यकर्ता जिस बूस्टर डोज का इंतजार कर रहे थे वह उन्हें मिल गया है। हाथरस जाते समय पुलिस की लाठियों के सामने जिस तरह प्रियंका आईं उसने लोगों को इंदिरा गांधी की याद दिला दी। इंदिरा गांधी की कई छवियां जनता के और खासतौर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मन में स्थाई हैं। संघर्ष के दिनों की। 1977 की। जब पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई थी। इनमें पहली छवि है इंदिरा गांधी की हाथी पर बैठकर बेलछी जाने की। और दूसरी है उसी साल गिरफ्तारी के बाद दिल्ली से हरियाणा ले जाने का विरोध करते हुए रेलवे क्रॉसिंग पर बनी पुलिया पर बैठ जाने की। वह भी 3 अक्टूबर था। और इस बार भी 43 साल बाद का एक 3 अक्टूबर। इंदिरा गांधी की पोती पुलिस की लाठियों के सामने आ गई। अपने कार्यकर्ताओं को बचाने के लिए पुलिस की हमला करती लाठी को उसने अपने हाथों पर ले लिया। भारत की जनता के साथ राजनीतिक कार्यकर्ता को भी अपना नेता लड़ता हुआ ही पसंद आता है। बहुत प्रभावित करता है।
राहुल गांधी का शांत और संयत व्यवहार अलग मानवीय गुणों से भरा हुआ है। मगर हमारे मन में घोड़े पर सवार एक हाथ से लगाम थामे और दूसरे से तलवार लहराती झांसी की रानी की छवि ही अंकित है। प्रियंका ने अपना यह रूप सायास नहीं गढ़ा है वे एक स्नेहिल मां, बहन, बेटी और नेता हैं। मगर दादी इंदिरा का असर उन पर इतना ज्यादा है कि किन्हीं खास मौकों पर जैसा वाजपेयी जी ने 1971 में कहा था कि इंदिरा जी दुर्गा बन गईं, वैसे ही उनकी पोती भी उन्हीं तेवरों में आ जाती हैं। कम ही लोगों को मालूम होगा कि उनके नजदीक के कुछ लोग उनकी गैरमौजूदगी में उन्हें झांसी की रानी कहते हैं। और उनके सामने उन्हें संबोधन के लिए 'भइयाजीÓ तो कहा ही जाता है।
कांग्रेस को उप्र में तीन दशक से ज्यादा ऐसे ही किसी करिश्मे की तलाश थी। बिहार में भी है। वहां भी कांग्रेस इसी तरह चौथे नंबर की पार्टी बनी हुई है। मगर फर्क यह है कि उप्र नेहरू गांधी परिवार का घर है। इसलिए यहां चौथे नंबर की पार्टी होना उसकी कसक को और बढ़ा देता है। मगर अब स्थिति यह है कि कांग्रेस चौथे नंबर की पार्टी विधानसभा में तो है मगर सड़क पर वह मुख्य विपक्षी दल बन गई है। मायावती की बसपा तो कहीं नजर ही नहीं आ रही है। अखिलेश यादव की सपा की मौजूदगी भी खाली खानापूर्ती है। कांग्रेस जिस जज्बे के साथ उप्र से लड़ रही है वह बताता है कि इस बार विधानसभा चुनाव में वही भाजपा के मुकाबले होगी।
हाथरस में दलित की बेटी के साथ हुए भारी जुल्म के बाद लोगों को उम्मीद थी कि कम से कम इस मामले में तो मायावती घर से बाहर निकलेंगीं। लेकिन खुद को दलित की बेटी कहकर राजनीति करने वाली मायावती ने ट्वीट और बाइट के अलावा कुछ नहीं किया। इस बात को लेकर दलित खुद को छला हुआ महसूस कर रहे हैं। दलितों की एकजुटता की वजह से ही मायवती चार बार उप्र की मुख्यमंत्री बनीं। मगर अब दलितों का मोहभंग हो गया है। वे कांग्रेस की तरफ वापस मुड़ सकते हैं। प्रियंका में उन्हें उम्मीद कि किरण दिखाई दे रही है। अगर ऐसा होता है तो उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण जो बिल्कुल फैंस पर बैठा है वह भी अपनी पुरानी पार्टी कांग्रेस की तरफ वापस आ सकता है।
और सबसे बड़ा धमाका, नया इतिहास होगा उप्र में यादवों का कांग्रेस के साथ आना। पिछले साढ़े तीन सालों में यादवों को बहुत घेरा गया। इससे पहले कभी यादव इतना निरूपाय नहीं हुआ था। 30 साल पहले जब उसने उप्र और बिहार कहीं सत्ता का स्वाद भी नहीं चखा था तब भी कृषि प्रधान जातियों में वह उत्तर भारत में सबसे बेहतर स्थितियों में था। कभी पुलिस या सरकार ने उसे टारगेट करके प्रताड़ित नहीं किया था। मगर इस बार तो मुख्यमंत्री रहे, सभ्य सुसंस्कृत अखिलेश यादव को टोंटी चोर जैसे घटिया आरोप झेलने पड़े। यादवों में बड़ा मैसेज यह गया है कि अखिलेश न खुद को बचा पाए न हमें बचा पा रहे हैं। और फिर जब उप्र का यादव बिहार से अपनी तुलना करता है तो उसे और निराशा होती है। वहां लालू यादव जेल में हैं। मगर फिर भी यादव के नाम पर सामान्य यादवों पर अत्याचार नहीं किया जा सकता। एनकाउंटर का तो सवाल ही नहीं। ऐसे में यादव अपने विकल्प के बारे में सोच रहा है। और जहां तक मुसलमान का सवाल है उसे अब मायावती और अखिलेश से कोई उम्मीदें नहीं बची हैं। अखिलेश जब सत्ता में थे तभी मुजफ्फरनगर कांड हुआ था। और अखिलेश एवं मायवती दोनों में से कोई वहां गया तक नहीं था। ऐसे में कांग्रेस के नेताओं की बांछें खिलना स्वाभाविक है। जैसे उप्र के बुंदेलखंड वाले इलाके में कहा जा रहा है 'हौंसे फूले हम फिरत, होत हमाओ ब्याह!Ó
हाथ पर हाथ धरे बैठे कांग्रेसी
कांग्रेसी सोचते हैं जैसे 2004 में सोनिया गांधी ने गांव-गांव की खाक छानकर सत्ता हमारे हमारे हाथों में रख दी थी वैसे ही इस बार प्रियंका दीदी कर देंगी। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि 2022, 2004 से बहुत अलग होगा। तब राजनीति में इतने बड़े दांव नहीं थे। इस तरह सांप्रदायिकता नहीं थी। जाति के सवाल इतने पैने नहीं हुए थे। अगर वे मेहनत नहीं करेंगे, कार्यकर्ताओं का विश्वास नहीं जितेंगे तो अकेली प्रियंका के भरोसे जनता का उनके साथ आना मुश्किल है। 2004 का अनुभव भी जनता के लिए बहुत अच्छा नहीं है। गांधी-नेहरू परिवार के नाम पर उसने वोट दिया। मगर दस साल तक जिन मंत्रियों और बड़े नेताओं ने सत्ता सुख लिया उन्होंने कभी जनता या कांग्रेस कार्यकर्ता का हाल नहीं पूछा। सोनिया गांधी ने सत्ता लाकर कांग्रेसियों के हाथों में रख दी थी।
- लखनऊ से मधु आलोक निगम