पूजीपतियों के हित मेें संशोधन
22-Nov-2014 03:01 PM 1237618

भूमि अधिग्रहण कानून

अभी हाल ही में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने राज्यसभा में बताया था कि 79 सार्वजनिक इकाईयां घाटे में चल रही हैं और यदि उन्हें बेच दिया जाए तो प्रत्येक भारतीय को 1 लाख 30 हजार रुपए मिलेंगे। इसके विपरीत सरकार हर साल 10 हजार करोड़ रुपए इन्हें जीवित रखने के लिए खर्च कर रही है। जाहिर है एक जमाने में जब ये इकाईयां स्थापित की गईं, उस वक्त इन इकाईयों के लिए बड़े क्षेत्रफल की जमीनें कि

सानों और जमीन मालिकों से हथियाई गईं थीं।

आज इन इकाईयों को बेचने के साथ-साथ सरकार भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास विधेयक में बदलाव की मंशा भी रखती है। हालांकि इन दो कदमों का अब उतना संबंध नहीं है, फिर भी कहीं न कहीं विरोधाभास तो प्रतीत होता ही है। जिस देश में कृषि उत्पादों में 15 लाख टन की कमी की चेतावनी दी गई है, वहां जमीनों के अधिग्रहण को आसान बनाने के लिए विधेयक में संशोधन से कई सवाल पैदा

होते हैं।

सरकार भूमि अधिग्रहण की कैफियत यह दे रही है कि इससे विकास को गति मिलेगी, क्योंकि विकास के लिए जमीनों की आवश्यकता पड़ेगी। सरकार के पास जमीनें बची नहीं हैं, जो हैं उनमें विकास गतिविधियां संभव नहीं हैं। इसलिए अधिग्रहण ही एकमात्र रास्ता बचता है। सरकार के इस कदम से किसान तो भयभीत हैं ही वे लोग भी भयभीत हैं जो आज भी यह मानते हैं कि कृषि इस देश की अर्थव्यवस्था की नींव है। यदि जमीनें नहीं रहेेंगी तो खेती कहां होगी? विडंबना तो यह है कि जो जमीन मौके की होती है वही उपजाऊ भी होती है। ऐसे में भरपूर पैदावार देने वाली जमीन को उद्योगों के लिए देेना खतरे से खाली नहीं है। सारे देश में शहर फैल रहे हैं और बिल्डरों ने शहरों के आस-पास की उपजाऊ जमीनों पर कॉलोनियां खड़ी कर दी हैं। कल जहां गेहूं, चना, ज्वार आदि खाद्यान्न पैदा किए जाते थे आज वहां मल्टीस्टोरी खड़ी हैं। कॉलोनियां उग आई हैं, उद्योग पनप रहे हैं लेकिन जिन किसानोंं ने इन जमीनों को बेचा था उनमें से ज्यादातर फिर से सड़क पर आ गए हैं। क्योंकि किसानों को सही तरीके से निवेश करना नहीं आता और न ही वे धन्धा कर पाते हैं। वे खेती मेंं माहिर हैं और उसी में उनका सुख है। दिल्ली सहित तमाम महानगरों के आस-पास जमीन बेचने से किसानों के बीच एक नव धनाड्य तबका अवश्य पैदा हो गया है, जो इतना सक्षम नहीं है कि अपनी समृद्धि को बरकरार रख सके। यह लोग चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात की तर्ज पर जल्द ही जमीन पर आने वाले हैं या आ चुके हैं। ऐसे में किसानों को लालच देकर या अन्य तरीके से उनके मूल कृषि कार्य से वंचित करना और दिशाहीन बेरोजगारों की नई फसल तैयार करना औचित्यपूर्ण नहीं है। भारत में समावेशी विकास की आवश्यकता है जिसमें हर स्तर पर होने वाले परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए कदम उठाए जाएं। केवल पूंजीवादी तबके को खुश करने के लिए जमीनों का अधिग्रहण घातक सामाजिक परिणामों को भी जन्म दे सकता है।

किसानों के बीच पनपती बेरोजगारी सरकार के लिए नया सरदर्द बनेगी। जिन लोगों को कृषि कार्य से हटाकर अन्यत्र झोंका जा रहा है, उस पूरे वर्क फोर्स के निराशा के गर्त में जाने की आशंका भी पैदा हो गई है। एक तरफ सरकार ग्राम्य आत्मनिर्भरता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बात करती है तो दूसरी तरफ गांव की रीढ़ कृषि को खत्म करके विकास की अवधारणा पर काम कर रही है। सरकार को समझना चाहिए कि जो देश औद्योगिकरण में सफल रहे हैं, वे कृषि में भी उतने ही उन्नत और सफल हैं। वस्तुत: कृषि में सफल और उन्नत होने के कारण ही वे देश इतने आगे बढ़ सके चाहे अमेरिका हो या रूस या चीन।

जमीनें हड़पने की साजिश

भारत की बढ़ती जनसंख्या के कारण उद्योग जगत ने जमीनों का महत्व समझ लिया है और अपनी इकाईयां लगाने के नाम पर पूंजीपति जमीनें सस्ते दामों में खरीदकर हड़प रहे हैं। छोटी-छोटी इकाईयों के लिए हजारों एकड़ जमीन की आवश्यकता क्या है? सरकार भी खैरात में जमीनें बांट रही है। कोई मापदंड तय नहीं है। किस उद्योग के लिए कितनी जमीन आवश्यक होगी, इसका खांका सरकार के पास उपलब्ध ही नहीं है। एक समूह सीमेंट प्लांट डालने के लिए 1 हजार एकड़ जमीन चाहता है तो दूसरा समूह उतना ही बड़ा प्लांट 4 हजार एकड़ जमीन पर लगा रहा है। कई समूहों ने सरकार से जमीन तो ले ली है लेकिन उस पर कोई काम वर्षों तक नहीें किया। जाहिर है यह सब जमीन हड़पने का षडयंत्र है। बड़े-बड़े समूह अपने जमीन बैंक बना रहे हैं, उसकी कोई सीमा नहीं है।

कोडिय़ों के  मोल जमीनें खरीदी जा रही हैं और उन पर उद्योग लगाने का झांसा दिया जा रहा है। सारे देश में यह साजिश चल रही है। जहां तक किसान का प्रश्न है, वह जमीनों के दाम कम ही पाता है। अक्सर सरकारें कम दाम पर किसानों से जमीन खरीदकर उन्हें महंगे दाम पर उद्योग जगत को बेच देती हैं और मुनाफा कमाती हैं। पिछले 1 दशक में खाद्यान्नों के दामों में जो बेतहाशा वृद्धि हुई है, उसका लाभ किसानों तक नहीं पहुंचा और वे वैसे ही गरीब बने रहे। लैंड यूज को लेकर कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप में उत्कृष्ट कार्य हुआ है, हमें उनके तरीके अपनाने चाहिए।

भारत मेंं टाउन प्लानिंग और कंट्री प्लानिंग की सख्त जरूरत है। मसलन, राजस्थान में काफी मात्रा में ऐसी जमीन है, जिसका औद्योगिक इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन अभी तक हमारा जोर कृषि भूमि खरीदने पर ही रहा है। खासतौर पर ढांचागत विकास के लिए गैर-कृषि भूमि का ही उपयोग होना चाहिए। यहां न सिर्फ इंडस्ट्री आ सकती है, बल्कि मार्केट बनाए जा सकते हैं, इसलिए किसानों को खेती से वंचित कर तकलीफ क्यों दी जाना चाहिए? राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर ही विकास कार्य करने चाहिए। उन्हें कृषि भूमि को बचाकर बंजर पर ही विकास कार्य करने चाहिए। वैसे ही जमीन की कमी महसूस होती जा रही है, इसलिए हमारे सामने खाद्य मुद्रास्फीति की समस्या मुंह बायें खड़ी है।

क्या बेच दी जाएंगी सार्वजनिक इकाईयां

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने 58 हजार 425 करोड़ रुपए की राशि के विनिवेश के माध्यम से अर्जित करने का जो लक्ष्य रखा है उसके बाद यह सवाल पैदा हो रहा है कि क्या सरकार कुछ बीमार सरकारी उपक्रमों को बेच देगी? आमतौर पर विनिवेश में इकाई पर सरकार का स्वामित्व बना रहता है। कंपनी के 49 प्रतिशत से कम शेयर बाजार में बेचे जाते हैं, जबकि निजीकरण में 51 प्रतिशत या अधिक शेयर क्रेता को बेच दिए जाते हैं जिससे कंपनी का स्वामी बदल जाता है। विनिवेश के माध्यम से सार्वजनिक इकाइयों की समस्या का हल नहीं होगा, क्योंकि इनका कामकाज सरकारी ढंग से ही चलता रहता है। केवल सतही सुधार होते हैं। कंपनियों के बोर्ड पर स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति की जाती है। कंपनी के शेयरों का स्टाक एक्सचेंज में व्यापार होता है। निवेशकों की कंपनी के कार्यकलापों पर नजर रहती है। प्रबंधन में गड़बड़ी होने पर शेयर के दाम घटने लगते हैं और सरकार सचेत हो जाती है। स्टाक एक्सचेंजों के साथ समझौते के अनुरूप कंपनी द्वारा तमाम सूचनाएं सार्वजनिक की जाती हैं, परंतु सार्वजनिक कंपनियों का मूल चरित्र पूर्ववत बना रहता है, जैसे नई बहू आ जाए तो भी परिवार का मूल चरित्र पूर्ववत बना रहता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जिन क्षेत्रों में उद्यमी ने क्षमता हासिल कर ली है उनसे सरकार को पीछे हट जाना चाहिए। तेल रिफाइनरी, बैंक, इंश्योरेंस, कोयले, तांबे तथा अन्य खनिजों का खनन, चीनी उत्पादन आदि तमाम क्षेत्र हैं जिनमें निजी क्षेत्र आज सक्षम है। वित्तमंत्री को चाहिए कि इन क्षेत्रों की इकाइयों का पूर्ण निजीकरण कर दें और मिली रकम का उपयोग नए क्षेत्रों में नई इकाइयों को स्थापित करने में लगाएं, जैसे अंतरिक्ष में सेटेलाइट पहुंचाने का काम आज इसरो कर रहा है। लेकिन इसरो का मूल काम नई तकनीकों की खोज करना है। दूसरे देशों के सेटेलाइटों को वाणिज्यिक आधार पर अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए एक नई सार्वजनिक इकाई स्थापित करनी चाहिए। दुनिया में तमाम भाषाओं के बीच अनुवाद का काम बढ़ रहा है। एक सार्वजनिक इकाई स्थापित करनी चाहिए जो विभिन्न भाषाओं में हमारे युवाओं को ट्रेनिंग दे, जैसे जापानी से जर्मन में अनुवाद कराए। छोटे देशों के पास डब्ल्यूटीओ तथा अन्य वैश्विक अदालतों में अपने मामलों की पैरवी करने की क्षमता नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में एक कंसल्टेंसी कंपनी बनाकर इस सेवा को उपलब्ध कराना चाहिए।

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