11-Nov-2014 07:00 AM
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यह योजनाओं का दौर है। हर सरकार अपनी योजनाएं लागू कर रही हैं। पिछली सरकारों ने भी कई योजनाएं लागू कीं, वर्तमान सरकार ने आते ही योजनाओं की झड़ी लगा दी। मध्यप्रदेश में तो मुख्यमंत्री कन्यादान योजना से लेकर ममता अभियान और बेटी बचाओ अभियान जैसी योजनाएं केंद्र सरकार के लिए भी प्रेरणा का विषय बनीं और प्रदेश की कई योजनाओंं को केंद्र ने थोड़ा बहुत बदल कर या उसी रूप में लागू भी किया। कई दूसरे प्रदेशों ने भी विभिन्नय योजनाओं को अपनाया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वर्तमान में लागू जन धन योजना भी मध्यप्रदेश के वित्तीय समावेशन मॉडल (सम़ृद्धि) से कहीं न कहीं प्रेरित है। अच्छा लगता है जब किसी प्रदेश की योजना को देश स्तर पर अपनाया जाए। फिर इन योजनाओं का अन्तिम लक्ष्य भी तो गरीबों का कल्याण ही है। योजनाएं बहुधा उस वर्ग के लिए बनाई जाती हैं जो अपनी आर्थिक चुनौतियों से दशकों से जूझ रहा है और उसके इस संघर्ष का कारण सामाजिक, राजनीतिक हो सकता है। इसलिए गरीबों के लिए बनने वाली या आम जनता के लिए बनने वाली इन योजनाओं में सरकार के धन की जितनी आवश्यकता है उतनी ही मन के धन की भी है। मन का धन से आशय है उन लोगों की इच्छा शक्ति और सदिच्छा जो इसे लागू कराने में सक्षम हैं या जिनके ऊपर इन योजनाओं को लागू कराने का दारोमदार है। देश की स्वतंत्रता के बाद से ही हम विभिन्न योजनाओं को सफल और असफल होते देखते आए हैं। कभी हरित क्रांति ने हमें आत्मनिर्भर बनाया और कभी पंचवर्षीय योजनाओं ने देश के विकास के विभिन्न सोपान तय किए। और भी कई योजनाएं हैं जो सार्थक तथा सफल रहीं किंतु कुछ योजनाओं में गड़बड़ी भी देखने को मिली। क्योंकि उनमें सरकार का धन तो लगा लेकिन उन्हें लागू करने वालों ने मन लगाकर काम नहीं किया। आज यदि मनरेगा जैसी योजनाओं को 200 जिलों तक ही समेटने की कोशिश हो रही है। या इस योजना में 40 प्रतिशत तक घालमेल पाया गया है तो इसमें दोष किसका है? निश्चित रूप से जिन्हें इस योजना को लागू करना था, उन्होंने मन लगाकर काम नहीं किया। योजनाएं ऐसे ही धराशाई होती हैं। मनरेगा ने गांव की गरीबी और भुखमरी कम करने मेंं उल्लेखनीय भूमिका निभाई थी लेकिन इसे दिशाहीन करने की कोशिश की गई। यही हाल राशन की दुकानों का हुआ। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पनपते भ्रष्टाचार के कारण इन दुकानों की प्रासंगिकता ही खत्म हो गई। पिछली सरकार ने खाद्य सुरक्षा योजना बड़े जोर-शोर से प्रारंभ की थी, लेकिन आज उसका कोई उल्लेख नहीं है। ऐसे हालात में किसी नई योजना के आते ही संदेह पैदा हो ही जाता है।