11-Nov-2014 05:18 AM
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कोयला और कालाधन ये दो ऐसे मुद्दे थे जिन्होंने पिछली सरकार की कब्र खोदी थी। नई सरकार इन्हीं मुद्दों पर जनता को जागरूक करने में कामयाब रही और बहुमत से जीती। लेकिन अब वही जागरूक जनता सरकार से पूछ रही है कि कालाधन कहां है? नरेंद्र मोदी ने चुनाव के दौरान अतिउत्साह में जनता से यह वादा कर लिया था कि 100 दिन के भीतर कालाधन भारत में वापस ले आएंगे, लेकिन अभी तक एक भी पैसा नहीं आया है। केवल उन 800 लोगों की सूची भारत को उपलब्ध हुई है जिनका धन स्विस बैंक के अलावा जूलियस बेयर, क्रेडिट सुइस और यूबीएस बैंक जैसे तमाम बैंकों में जमा है। लेकिन सबसे पहले तो सरकार को यह तय करना होगा कि जमा की गई राशि कालाधन ही है। यदि खाताधारी इस धन का सही स्रोत या किस प्रकार उसने यह धन प्राप्त किया इत्यादि बता देता है तो बैंकों में धन जमा करना कोई अपराध नहीं है, चाहे वो भारत के हों या भारत से बाहर के। इसलिए सबसे पहली चुनौती तो यह होगी कि विदेशों में भारतीयों का जो पैसा जमा है, उसका स्रोत पता लगाया जाए। उसके बाद यह तय किया जाए कि पैसा सही है या गलत। दोनों स्थितियों में पैसा भारत लाने के लिए सरकार के पास कोई सरल रास्ता नहीं है। सरकार को विभिन्न देशों से कुछ संधियां करनी पड़ेंगी, जो फिलहाल अस्तित्व में नहीं हैं। जिन देशों से दोहरी कर संधियां हैं, उन देशों के बैंकों में पैसा जमा करना अपराध नहीं माना जाता क्योंकि इस पैसे पर समुचित कर पहले ही दे दिया जाता है। इसलिए खाता धारियों के नाम उजागर होने मात्र से यह तय नहीं हो सकता कि खाताधारी कालाधन ठिकाने लगा आए हैं। फिर भारतवंशियों में से बहुत से विदेशों में रह रहे हैं, जिन पर भारतीय कानून लागू नहीं होता, ऐसे लोगों को भारत में पैसा जमा कराने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। केवल भारत के मूल निवासियों पर दबाव बनाया जा सकता है कि वे पैसा वापस ले आएं लेकिन इसके लिए भी सरकार को उन्हें कुछ आश्वासन देना होगा या कोई रास्ता निकालना होगा। जो भी हो विदेशों में जमा सारा धन (भारतीय खाताधारकों का) सरकार के खजाने मेें नहीं पहुंचेगा, उसका कुछ हिस्सा ही सरकार को मिल जाए तो गनीमत होगी। विदेशों में जमा धन तो केवल भारत के बैंकों में ट्रांसफर हो सकता है, वह भी कुछ शर्तों के साथ और ये धन उन्हीं खाताधारकों के खातों में रहेगा। जांच पूरी होने के बाद ही सरकार इसे गलत पाए जाने की स्थिति में राजसात कर सकती है, लेकिन तब भी सरकार को लंबी कानूनी लड़ाई लडऩी पड़ेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि फिलहाल ब्लैक मनी चुनावी स्टंट ही बना रहेगा। सरकार भी इस सच्चाई को जानती है, इसलिए वह चाहती है कि पूरा नहीं तो कम से कम कुछ नतीजा तो निकले। शायद इसी वजह से भारत और स्विट्जरलैंड एक ऐसी योजना पर काम कर रहे हैं, जिससे कि स्विस बैंकों में खाता खोलने वाले भारतीय ग्राहकों के नाम तुरंत भारत सरकार को प्राप्त हो जाएं। स्विस बैंकों से जिन लोगों को अपने अकाउंट बंद करने का संदेश प्राप्त हुआ है, उनका मानना है कि यह सब भारत सरकार के दबाव में किया जा रहा है।
स्विट्जरलैंड के अग्रणी बैंकों ने ब्लैक मनी को लेकर विवादों में घिरे ऐसे इंडियन कस्टमर्स से दूरी बनाने का प्रयास करना शुरू कर दिया है, जो भविष्य में उनके लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, स्विस बैंकों ने चार संदिग्ध भारतीयों से अपना पैसा 31 दिसंबर तक निकाल लेने को कहा है। कहा जा रहा है कि इनमें से तीन मुंबई और एक दिल्ली का निवासी है। पिछले कुछ हफ्तों से बैंक प्रबंधकों द्वारा गोपनीय अकाउंट्स को बंद करने को कहा जा रहा है। एक खाताधारक को 30 अक्टूबर तक अपना खाता बंद करने को कहा गया है, जबकि एक अन्य खाताधारक को यह साबित करने को कहा गया है कि क्या उसने बैंक में जमा कराए गए धन पर टैक्स चुकाया है। एक दशक पहले ये अकाउंट स्विस बैंकों में खोले गए हैं। भारतीय खाताधारकों को ये फोन कॉल जूलियस बेयर, क्रेडिट सुइस और यूबीएस बैंक से आए हैं, जो भारत में कार्यरत कंपनियों के बीच अपनी गोपनीयता और सुविधाओं के लिए जाने जाते हैं।
केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में विदेश में काला धन जमा करने वालों के नाम उजागर करने जा रही है। केंद्र की तरफ से सप्लीमेंट्री एफिडेविट फाइल की जाएगी, जिसमें 136 खाताधारकों के नाम बंद लिफाफे में दिए जाएंगे। बताया जा रहा है कि यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, वित्त मंत्री अरुण जेटली और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के बीच हुई चर्चा के बाद लिया गया है। पहली लिस्ट में कुल 800 नामों में से उन 136 का खुलासा किया जाएगा, जिन्हें यूरोपियन देशों की सरकारों ने उपलब्ध कराया है। कोर्ट तय करेगा कि ये नाम कब और किस तरह उजागर किए जाने हैं और किससे कितना टैक्स वसूलना है। सरकार के पास ऐसे खाताधारकों के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं, जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाकर स्विस बैंकों में बड़ी रकम जमा कर रखी है।
स्विस बैंकों में जमा भारतीय धनराशि में 2013 में 40 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी, जो करीबन भारतीय मुद्रा में 14000 करोड़ रुपए के आसपास होती है। पहले यह राशि तकरीबन 9514 करोड़ रुपए थी।
- भारतीयों के विदेशों में जमा धन का कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
- वाशिंगटन के थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंट्रीग्रिटी (त्रस्नढ्ढ) के मुताबिक, तकरीबन 28 लाख करोड़ रुपए भारतीयों के विदेशों में जमा हैं।
- थिंक टैंक के मुताबिक, यह राशि 1948 से 2008 के बीच उन देशों में जमा कराई गई है, जहां जमा राशि पर टैक्स न के बराबर लगता है।
- केंद्र सरकार ने भी 2011 में दिल्ली के तीन थिंक टैंक नेशनल काउंसिल फॉर अप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (हृष्ट्रश्वक्र), नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी (हृढ्ढक्कस्नक्क) और नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ फाइनेंशियल मैनेजमेंट (हृढ्ढस्नरू) को काली अर्थव्यवस्था के सही आंकड़े उजागर करने के काम में लगा रखा है।
- फाइनल रिपोर्ट अभी भी प्रस्तुत नहीं की गई है।
बीते कुछ वर्षों में यूपीए सरकार के कार्यकाल में काला धन वापस लाने के लिए देश में कई बड़े आंदोलन भी हुए। इनमें समाजसेवी अन्ना हजारे और योगगुरु बाबा रामदेव का आंदोलन प्रमुख था। वहीं, वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने भी काला धन जमा करने वालों के नाम उजागर करने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की है, जिस पर हाल ही में सरकार की ओर से कहा गया कि वह कई देशों से दोहरी कर संधि के चलते खाताधारकों के नाम उजागर नहीं कर सकती है। इसके अलावा, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी पिछले हफ्ते कहा था कि स्विटरजरलैंड सरकार खाताधारकों के नाम वाली लिस्ट साझा करने के लिए तैयार हो गई है। साथ ही, फ्रांस सरकार ने भी पिछले साल 782 भारतीय नागरिकों के नाम वाली लिस्ट उपलब्ध कराई थी, जिनका काला धन जिनेवा के ॥स्क्चष्ट बैंक में जमा है।