क्या अब दिल्ली में भाजपा दिखाएगी साहस?
10-Nov-2014 02:15 PM 1237583

दिल्ली में चुनाव से डर रही भाजपा को हरियाणा के चुनावी परिणामों ने संजीवनी दी है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कह दिया है कि राष्ट्रपति शासन विकल्प नहीं है दिल्ली में सरकार बननी चाहिए जनता को लंबे समय तक मूर्ख बनाना उचित नहीं है। खरीद-फरोख्त और दल-बदल के जरिए येन-केन प्रकारेण सरकार बनाने की जुगाड़ कर रहे भाजपा के कुछ हतोत्साहित नेता अब दिल्ली में थोड़ा सुकून से चुनावी समर में कूदने की हिम्मत जुटा सकते हैं। नरेंद्र मोदी का जादू चुका नहीं है वह बरकरार है और दिल्ली में सर चढ़कर बोल सकता है। लेकिन विधानसभा चुनाव के परिणामों से कांग्रेस में जो हताशा और निराशा का माहौल बना है, उसके चलते कांग्रेस की आम आदमी पार्टी के साथ जाने की आशंका भी पैदा हो रही है। दिल्ली मेंं तो कांग्रेस के गिने-चुनेे विधायक इतने भयभीत हैं कि वे आलाकमान को कई बार संकेत दे चुके हैं कि अकेले चुनाव में जाने की ताकत उनकी नहीं है। जब दिल्ली में कांगे्रस ने आम आदमी पार्टी को बाहरी समर्थन दिया था, उस वक्त भी इन विधायकों का यही भय काम कर रहा था। अब पुन: वैसे ही हालात हैं और आगामी पराजय की आशंका से आला कमान पर दबाव बनाया जा रहा है कि वह आम आदमी पार्टी को गठबंधन के लिए राजी करे। उधर आम आदमी पार्टी भी भली-भांति जानती है कि अकेले चुनाव में जाने से उसे नुकसान हो सकता है। चुनावी राजनीति में जीवित बचे रहने के लिए आम आदमी पार्टी का कम से कम एक राज्य में सत्तासीन रहना अत्यंत आवश्यक है। दिल्ली में दुनिया भर का मीडिया है इसलिए वहां सरकार बनाकर छापामार राजनीति करते हुए आम आदमी पार्टी सुर्खियों में बनी रह सकती है। क्योंकि नरेंद्र मोदी के जादू ने आम आदमी पार्टी के सुर्खियां पसंद नेताओं को सुर्खियों से बाहर कर दिया है। जिस तासीर की यह पार्टी है उसमें यह अनिवार्य है कि किसी भी समाचार पत्र के मुख प्रष्ठ पर या चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज में उनका एक न एक समाचार चलता रहे, अन्यथा ऐसी पार्टियां शीघ्र ही अपनी पहचान खो सकती हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव निश्चित रूप से आम आदमी पार्टी के लिए एक अच्छा प्लेटफार्म साबित हो सकता है, जहां से वे भाजपा के मुकाबले राष्ट्रीय फलक पर प्रकट होने की अपनी चिर-परिचित महत्वाकांक्षा को फलीभूत होते देख सकते हैं। लेकिन इन सब में कांग्रेस की क्या दुर्गति होगी, कहा नहीं जा सकता। हरियाणा के नतीजों ने कांग्रेस को बेहद मायूस किया है। जीतने की उम्मीद तो उसे बिल्कुल नहीं थी लेकिन दूसरे नंबर पर आने की कोशिश पार्टी ने भरसक की थी। पर अब पांसे उल्टे पड़ चुके हैं। पार्टी तीसरे नंबर पर है और लगातार पिछड़ती जा रही है, दिल्ली में भी कमोबेश यही हालात हैं। जहां तक संगठित होकर भाजपा का मुकाबला करने का प्रश्न है, इसे लेकर दिल्ली में कांग्रेसियों के बीच एक राय नहीं है। कुछ बड़े नेता चाहते हैं कि कांग्रेस जीते अथवा हारे लेकिन हर हाल में उसे अकेले ही लडऩा चाहिए। अकेले लडऩे में ही उसका वजूद बचा रहेगा। यह वजूद बचाना में जरूरी है क्योंकि एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस की दुर्दशा असहनीय है। ओखला से कांगे्रस विधायक आरिफ मोहम्मद खान ने तो साफ कह दिया है कि दिल्ली में
चुनाव कराया जाना चाहिए और कांग्रेस अकेले मैदान में जाने में सक्षम है। उनके इस कथन से कांग्र्रेस की भीतरी कशमकश का अनुमान लगाया जा सकता है।
हरियाणा और महाराष्ट्र में शानदार प्रदर्शन के बाद भाजपा अब दिल्ली में चुनाव का सामना करने के लिए कमर कसती दिख रही है, भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं विधायक नंद किशोर गर्ग ने कहा, हम चुनाव के लिए तैयार हैं। लोगों का भरोसा भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर है। महाराष्ट्र और हरियाणा में यह साबित हो गया है। इससे पहले लोकसभा चुनाव में भी हमने दिल्ली में सभी सातों सीटें जीतकर यह बात सिद्ध की है।ÓÓ दिल्ली प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश उपाध्याय ने भी कहा था कि राष्ट्रीय राजधानी में राजनीतिक अस्थिरता जल्द समाप्त होनी चाहिए और वह तत्काल ताजा चुनाव का सामना करने के लिए पूरी तरहÓÓ तैयार है। अब सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद चुनाव ही विकल्प है।

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