19-Feb-2013 11:23 AM
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अफजल गुरु को फांसी पर लटका दिया गया। दुनिया के इतिहास में ऐसा होता आया है। यह कोई नया फैसला नहीं है और न ही कोई नया कदम है। जब सद्दाम हुसैन को फांसी पर लटकाने का दृश्य इंटरनेट पर आया था तब भी दुनिया के मानव अधिकारवादियों ने चीत्कार की थी। ओसामा बिन लादेन को जिन नील कमांडोज ने मारा था उनके विरोध में भी स्वर उठे थे। सद्दाम हुसैन की फांसी तो खैर एक राजनीतिक हत्या थी लेकिन ओसामा बिन लादेन को जिस अंदाज में अंजाम तक पहुंचाया गया वह अभूतपूर्व था। गहराती रात के साए में दुनिया को अंधेरे में धकेलने वाले एक दुर्दांत आतंकवादी का कत्ल। कत्ल कहें या हत्या या सजा आतंक से दुनिया को दहलाने वालों के हिस्से में यही आ सकता है क्योंकि उनके हृदय नहीं पसीजते उन मासूम मौतों पर जो दिनदहाड़े अंजाम दी जाती हैं।

भारत की संसद में भी यही हुआ था वनिस्पत इसके कि भारत का संविधान अरुंधति राय जैसों को भी बोलने की इजाजत देता है-अफजल गुरु ने अलग रास्ता चुना। इस देश को चुनौती देने का देश की सर्वोच्च संस्था को ध्वस्त करने का। जरा सोचिए उस दिन संसद में गोली चल जाती तो क्या होता? विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र तबाही की कगार पर खड़ा होता? केवल भारत ही नहीं सारी दुनिया थरथरा जाती? लेकिन ऐसा हुआ नहीं, वह अलग बात है क्योंकि इस देश में जान की बाजी लगाने वालों की कमी नहीं है। उन सुरक्षाकर्मियों ने अपने सीने पर बंदूक की गोलियां झेल ली कि आंच न आने पाएं इस देश की अस्मिता पर, इस देश की शक्ति पर, लोकतांत्रिक शक्ति पर। जो लोग यह समझते हैं कि परमाणु बमों में और देश की शक्तिशाली सेना में इस देश की शक्ति है वह गलत समझते हैं। इस देश की शक्ति है वह संसद जिसमें विराजते हैं जनता के प्रतिनिधि जो 100 करोड़ लोगों के भाग्य विधाता हैं। इन भाग्य विधाताओं को छलनी करनी का विचार अपने आप में भारत के विरुद्ध युद्ध छेडऩे के समान है। इसीलिए जब संसद पर हमला हुआ तो देश का बच्चा-बच्चा कांप उठा। क्रोध से भर गया। प्रतिशोध की भावना प्रबल हो उठी।
आवश्यकता तो थी कि उसी पल गाजीबाबा के उन गुर्गों को पालने पोषने वाले पाकिस्तान को सबक सिखाया जाता लेकिन ऐसा नहीं हो सका। संयम, धैर्य और कई बार कायरता की हद तक पहुंच चुकी शांति जिस देश का लक्ष्य हो वह त्वरित कार्रवाई नहीं कर सकता। लेकिन कार्रवाई तो करनी ही पड़ती है। इसीलिए पहले कसाब को उसके अंजाम तक पहुंचाया गया उसके 80 दिन बाद अफजल गुरु को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। इसके पीछे राजनीति चाहे जो हो। शिंदे के भगवा आतंकवाद संबंधी बयान से इसका ताल्लुक हो या राहुल की आसन्न राजनीति के मार्ग में पड़े कंटकों से छुटकारा पाने की रणनीति हो लेकिन यह एक बहुप्रतीक्षित फैसला था। अनिवार्य था यह। एक दुर्दांत आतंकवादी को फांसी पर लटकाना। जो डॉक्टर की डिग्री हासिल करने वाला था, किंतु उसके मन में यह संवेदना नहीं थी कि जिस शरीर को, जिस मानव को बचाने के लिए डॉक्टर अपना दिन का चैन और रात की नींद खो देता है उसे चंद गोलियों से छलनी नहीं किया जा सकता। अफजल को यह भी गुमान नहीं था कि इसी देश के संविधान ने उसे अधिकार दिया है अपनी बात कहने का, अपनी भावनाओं के प्रकटन का। वह चाहता तो संसद के सामने प्रदर्शन कर सकता था। किंतु नहीं उसने रास्ता चुना रक्त बहाने का, निर्दोषों को मारने का, देश की सर्वाेच्च संवैधानिक संस्था की पवित्रता नष्ट करने का। इसीलिए उसे फांसी के तख्ते तक तो पहुंचना ही था। यह नहीं तो कोई और सरकार उसकी फांसी को अंजाम देती। अंजाम देना भी जरूरी है। यदि हम यह परवाह करते रहें कि कश्मीर सुलग उठेगा, हालात 1989 जैसे हो जाएंगे तो इस डर से हमारे सीने छलनी ही होते रहेंगे। इतिहास की गल्तियों को सुधारने का यह एक अवसर है। देश को यह संदेश देना ही पड़ेगा कि वह एक सॉफ्ट स्टेट नहीं है। वह डरपोक भी नहीं है। आवश्यकता पडऩे पर आक्रामक हो सकती है। देश के दुश्मनों को फांसी के तख्त तक पहुंचा सकती है। यही किया इस देश के राष्ट्रपति ने। जो शायद एक संकल्प के साथ राष्ट्रपति भवन में गए थे। प्रणब मुखर्जी की देश भक्ति को मेरा प्रणाम है।
किंतु बात इतनी ही नहीं है बात उससे आगे की भी है। कसाब और अफजल गुरु तो एक मोहरे हैं। देश की सीमाओं पर 42 से अधिक आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर है। जिनमें भारत के खिलाफ साजिश बदस्तूर जारी है। जो भारत को तोडऩे की दिन-रात व्यूह रचना करते रहते हैं। कड़कती धूप हो या बर्फ से अच्छादित मज्जा ठिठुरा देने वाली सर्दी-ये लोग बेखौफ पाकिस्तानी सेना के साए में घुसपैठ करते रहते हैं। इनको भी सबक सिखाना इसलिए जरूरी है कि भारत एक कमजोर राष्ट्र नहीं है वह अपनी सीमाओं में रहना जानता है और सीमाओं की सुरक्षा करना भी जानता है इसलिए निर्भय होकर कार्रवाई की जानी चाहिए।
एक मजबूत राष्ट्र को अपनी आंतरिक बनावट भी मजबूत रखनी चाहिए। कसाब को फांसी हुई कोई पत्ता भी नहीं हिला। कांग्रेस को आशंका थी कि एक वर्ग विरोध करेगा। शायद कांग्रेस को उस वर्ग की देशभक्ति पर संदेह था। किंतु उस वर्ग ने शांति बनाए रखकर अपनी देशभक्ति का नि:संदेह प्रमाण दिया। अब अफजल गुरु की फांसी के बाद भी यह आशंका निर्मूल साबित हुई है। कांग्रेस को इन आशंकाओं के दलदल से निकलना चाहिए और राममंदिर का मार्ग भी आगे बढ़कर प्रशस्त करना चाहिए। राम मंदिर जैसी समस्याओं का हल न्यायालय की दहलीज पर नहीं निकलेगा बल्कि आपसी बातचीत से ही निकल सकेगा। देश के दो समुदाय मिलकर तय कर लें तो इस देश को विश्व की महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता। यदि न्यायालय ने दो तिहाई जमीन पर राम का आधिपत्य स्वीकार किया है तो बाकी एक तिहाई जमीन पर इस देश के सर्वस्वीकार्य मर्यादा पुरुषोत्तम का आधिपत्य क्यों नहीं हो सकता। क्या इसके लिए मुस्लिमों को मनाया नहीं जा सकता। क्यों यह मुद्दा राजनीति का होना चाहिए? क्यों इसकी आड़ में राजनीति होनी चाहिए? क्यों तुष्टिकरण होना चाहिए। इतिहास आपकी तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है। इसे बदलने का एक मौका मत गंवाइए।
कुमार सुबोध