भक्ति का प्रवाह
18-Jan-2020 08:05 AM 1239031
रामचरित मानस हमारे जीवन में भक्ति का प्रवाह करता है। इससे हम परमात्मा की शरण का आश्रय प्राप्त करके अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं। रामचरितमानस वह ग्रंथ है जिसमें कि मनुष्य के जीवन का कल्याण समाहित है। रामचरितमानस के पठन-पाठन से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। और मानव के जीवन में जितने भी दोष हैं वह रामचरितमानस के पाठ करने व उसे जीवन में अपनाने से स्वत: ही दूर हो जाते हैं। विकराल कलिकाल में मानव के जीवन में अनेक समस्याओं का प्रादुर्भाव हो गया है, परमात्मा की कृपा यदि प्राप्त करना है तो इस कलयुग में रामचरितमानस का आश्रय लेना पड़ेगा। गोस्वामी तुलसीदास महाराज ने रामचरितमानस की रचना जगत कल्याण के लिए की थी और रामचरित मानस सम्मेलन के आयोजन से हमारे जीवन में परमात्मा की कृपा का प्रादुर्भाव स्वत: ही हो जाता है। इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह परमात्मा की शरण का आश्रम ग्रहण करें और रामचरितमानस से स्वयं के संबंध को स्थापित करें। रामचरित मानस एक समग्र जीवन दर्शन है, जिसमें संसार की जितनी भी कठिनाइयां हैं उनका निदान हमें मिल जाता है। रामचरितमानस भगवान राम का कलेवर है। यह गोस्वामी तुलसीदास के मानस में विराजमान भगवान राम का श्री विग्रह है। बालकांड राम का चरण, अयोध्याकांड राम का कटि, अरण्य कांड राम का उदर, किष्किंधा कांड राम का हृदय, सुंदर कांड राम का गर्दन, लंका कांड राम का मुखारविंद एवं उत्तर कांड राम का मस्तिष्क है। बाल कांड में सात, किष्किंधा कांड में दो एवं बाकी पांच कांडों में तीन श्लोक हैं। बालकांड के सातों श्लोकों में सातों कांडों की कथा छिपी हुई है। तुलसीदास ने विद्वत्ता के लिए नहीं अपने सुख के लिए रामचरित मानस की रचना की है। तुलसीदास ने गणेश, शक्ति, विष्णु, शंकर, सूर्य ये पांच देवों की वंदना की है। गुरु की वंदना के बाद सत्संग की वंदना तुलसीदास करते हैं। वाल्मीकि, नारद, अगस्त्य मुनि आदि सत्संग से ही सुधरे और प्रसिद्ध हुए। शठ भी सत्संग से सुधरता हैं। मणि की तरह सत्संग है। सांप के सिर में मणि रहती है फिर भी उस पर विष का प्रभाव नहीं पड़ता। ठीक इसी तरह सत्संग करनेवालों को कुसंग का प्रभाव नहीं पड़ता है। रामचरितमानस मणियों से भरा है, जो एक रामचरित मानस का पाठ करता है, वह जीवन भर उसी का हो जाता है। किसी भी काम में सफलता के लिए जरूरी है आत्मविश्वास। इसके बिना किसी भी काम में कामयाबी नहीं मिल सकती और हमें परेशानियों का सामना करना पड़ता है। श्रीरामचरित मानस का पांचवां अध्याय सुंदरकांड सफलता और शांति सबसे बड़ा उदाहरण है। वानरों के सामने एक असंभव सी दिखने वाली चुनौती थी। सौ योजन लंबा समुद्र लांघकर लंका पहुंचने की। जब वानरों के दल में समुद्र लांघने के बात आई तो सबसे पहले जामवंत ने असमर्थता जाहिर की। फिर अंगद ने कहा मैं जा तो सकता हूं, लेकिन समुद्र पार करके फिर लौट पाऊंगा इसमें संदेह है। अंगद ने खुद की क्षमता और प्रतिभा पर ही संदेह जताया। ये आत्म विश्वास की कमी का संकेत है। जामवंत ने हनुमान को इसके लिए प्रेरित किया। हनुमान को अपनी शक्तियों की याद आ गईं और उन्होंने अपने शरीर को पहाड़ जैसा बड़ा बना लिया। आत्म विश्वास से भरकर वे बोले कि अभी एक ही छलांग में समुद्र लांघकर, लंका उजाड़ देता हूं और रावण सहित सारे राक्षसों को मारकर सीता को ले आता हूं। अपनी शक्ति पर इतना विश्वास था हनुमान को। जामवंत ने कहा नहीं, आप सिर्फ सीता माता का पता लगाकर लौट आइए। हमारा यही काम है। फिर प्रभु राम खुद रावण का संहार करेंगे। हनुमान समुद्र लांघने के लिए निकल गए। सुरसा और सिंहिका नाम की राक्षसियों ने रास्ता रोका भी, लेकिन उनका आत्म विश्वास कम नहीं हुआ। हम जब भी किसी काम पर निकलते हैं तो अक्सर मन विचारों से भरा होता है। आशंकाएं, कुशंकाएं और भय भी पीछे-पीछे चलते हैं। हम अधिकतर मौकों पर अपनी सफलता को लेकर आश्वस्त नहीं होते। जैसे ही परिस्थिति बदलती है हमारा विचार बदल जाता है। ये काम में असफलता की निशानी है। अगर हम इन स्थितियों से गुजरते हैं तो साफ है कि हमारे मन में आत्मविश्वास की कमी है। सफलता के लिए सबसे जरूरी है आत्म विश्वास। जब तक हम खुद पर ही भरोसा नहीं करेंगे, हमारे प्रयास कभी सौ फीसदी नहीं होंगे। -ओम
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