18-Jan-2020 07:57 AM
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हाल ही में आए कुछ राज्यों के चुनाव परिणाम इस बात का संकेत हैं कि आने वाले समय में कोई भी एक दल इतना सक्षम नहीं होगा कि वह अकेले अपने दम पर सरकार बना सके। लेकिन हैरानी की बात यह है कि बड़े दलों को छोटे दलों के पीछे चलने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
हरियाणा और महाराष्ट्र ने जो संकेत दिए थे झारखंड ने उस पर मुहर लगा दी। भारत जैसे सांस्कृतिक और भौगोलिक बहुलता वाले देश में क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी अहमियत एक बार और साबित कर दी है। हालांकि इससे पहले हुए राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में भी जनता ने स्थानीय मुद््दों पर ही अपनी सरकारें चुनी थीं। जनता लगातार यह संदेश दे रही है कि वह केंद्रीय और क्षेत्रीय मुद््दों को अलग कर देखना जानती है। इसके साथ ही कांग्रेस ने महाराष्ट्र से लेकर झारखंड में जिस तरह से क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश शुरू की है उसका भी राजनीतिक संदेश है। एक समय था जब भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा बनाया था। लेकिन अब कांग्रेस वाला अहंकार भाजपा में दिखना शुरू हो गया है। इस पर एक बार फिर तवज्जो इसलिए कि दोनों दल इतिहास से कोई सबक लेने के इच्छुक नहीं दिख रहे हैं। शायद इसलिए क्षेत्रीय क्षत्रपों की समय-समाप्ति का ऐलान भी बहुत जल्दी इतिहास बन गया। पिछले कई विधानसभा चुनावों में देखा गया कि देश की जनता केंद्रीय और स्थानीय मुद््दों में फर्क करती आ रही है। छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र तक में जनता ने संदेश दिया कि उसके लिए केंद्र का मुद््दा अलग है तो वह अपने राज्य में स्थानीय मुद््दों की ही बात करना चाहती है। पिछले साल के अंत और इस साल के शुरू में हुए विधानसभा चुनावों में खेती-किसानी और बेरोजगारी ही अहम मुद््दा रहा। मजबूत राजनीतिक फैसलों का उसकी जिंदगी पर असर नहीं पड़ा तो वह बहुत दूर से आए भाषण को क्यों सुने। जब उसे अपनी रोज की रोटी जुटाने में मुश्किल हो रही है तो वह इस बात पर खुश हो भी तो कैसे कि अब कश्मीर में जमीन-जायदाद खरीद सकता है।
आम जनता तो केंद्र और राज्य का फर्क करना जानती है लेकिन अफसोस कि भाजपा के रणनीतिकार यह फर्क करना नहीं सीख पा रहे हैं। कश्मीर और झारखंड की समस्या एक नहीं है। देश की औद्योगिक राजधानी महाराष्ट्र और एक खनिज संसाधनों से भरपूर लेकिन आर्थिक विकास में बहुत पिछड़े समाज की जरूरतें अलग हैं। झारखंड भूख से मौत के लिए कुख्यात हुआ, आरोप लगा कि संतोषी नाम की बच्ची भात-भात कहते हुए मर गई। यहां तो आधार कार्ड भी आरोपी हुआ कि इसका नंबर नहीं होने के कारण गरीब को उसके हिस्से का राशन नहीं मिला।
कांग्रेस के खिलाफ विपक्ष की एकता लंबे समय तक देखी गई। यह एकता राज्यों से होते हुए केंद्र तक बनी रही जिसका परिणाम हुआ कि 2014 के लोकसभा चुनावों में आधुनिक भारत के इतिहास में अहम पार्टी रही कांग्रेस को ऐतिहासिक हार मिली। लेकिन 2014 के चुनावों में खासकर उत्तर प्रदेश से मिले प्रचंड बहुमत के बाद भाजपा ने इस विपक्षी एकता की बेकद्री की, क्योंकि वह ऐतिहासिक रूप से अपने बूते पक्ष में थी। लेकिन दुखद है कि इसके बाद भाजपा ने अपने खिलाफ उठे हर सुर को भ्रष्टÓ बोलना शुरू कर दिया। खासकर आईबी और सीबीआई जैसी एजेंसियों के सीमित इस्तेमाल का बुरा असर दिखने लगा और अपना अस्तित्व बचाने के लिए विपक्ष ने गोलबंदी शुरू की। कानून बनाकर चुनावी फंडिंग पर सत्ता पक्ष का एकाधिकार जैसे हालात ने भी विपक्ष को एकजुट होने के लिए मजबूर कर दिया। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने जद (एकी) की जितनी मांगें मांगकर झुकना पसंद किया और कांग्रेस ने अकडऩा पसंद किया तो उसका नतीजा भी दिखा था। अब जबकि कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के पास चुनावी चंदों का भी सहारा नहीं बचा तो उनके पास एक-दूसरे को सहारा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। भारत जैसे देश में जब चुनावी प्रचार को बहुत महंगा बना दिया गया है तो चुनावी चंदा किसी भी पार्टी के वजूद के लिए अहम हो जाता है। अब विपक्ष के पास अपने-अपने अहंकार को छोडऩे के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। महाराष्ट्र से लेकर झारखंड में जिस तरह कांग्रेस ने झुक कर क्षेत्रीय क्षत्रपों के छाते के नीचे चलना मंजूर किया, उसे राजनीतिक इतिहास में एक सबक के तौर पर ही देखा जाएगा।
इन सारे बिंदुओं के साथ सबसे अहम है अर्थव्यवस्था यानी आम लोगों की रोजी-रोटी की बात। नोटबंदी और जीएसटी का असर लंबे समय बाद जनजीवन पर साफ-साफ दिखने लगा है। यह छह-सात महीने जैसे छोटे समय की बात होती तो जनता इसमें भी अच्छे दिन देख लेती। लेकिन जिस तरह से हालात लंबे समय से बिगड़ रहे हैं उसके बाद प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। जनता को अर्थव्यवस्था पर तसल्ली भी मिल जाती तो बात आगे बढ़ सकती थी। लेकिन यहां तो हम लहसुन, प्याज नहीं खातेÓ से लेकर कहां है मंदी, कहां है मंदीÓ जैसे संवाद गूंजने लगे। हरियाणा से लेकर महाराष्ट्र व झारखंड तक में सत्ता पक्ष ने उस कमजोर वर्ग को कोई उम्मीद नहीं दिखाई जिसके पास अब खोने के लिए कुछ नहीं बचा था।
वहीं महाराष्ट्र व झारखंड दोनों ही प्रदेशों की सरकार में कांग्रेस पार्टी जूनियर पार्टनर की भूमिका में है। इन दो प्रदेशों की सरकार में शामिल होकर कांग्रेस हरियाणा विधानसभा चुनाव में मिली हार व कर्नाटक में बड़ी बेअदबी से सत्ता से बेदखली के गम को भी भुलाने का प्रयास कर रही है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में तो कांग्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था, जिसमें वहां की जनता ने इनके गठबंधन को पूरी तरह से नकार दिया था। लेकिन चुनाव के बाद भाजपा शिवसेना गठबंधन में खटपट होने से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व कांग्रेस ने मिलकर शिवसेना नेता उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनवा दिया। वहां मुख्यमंत्री रहे अशोक चव्हाण को तो मंत्री बनाया गया है। मगर शरद पवार के विरोध के चलते पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण को मंत्री पद से महरूम रहना पड़ा।
महाराष्ट्र व झारखंड की जीत में कांग्रेस अपनी कर्नाटक की हार को छुपाने का असफल प्रयास कर रही है। कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा की सरकार बनने से रोकने के लिए कांग्रेस ने अपने धुर विरोधी जनता दल सेक्युलर से समझौता कर कुमार स्वामी को मुख्यमंत्री बनवा दिया था। कुमार स्वामी सरकार में कांग्रेस जूनियर पार्टनर के रूप में शामिल हुई थी। लेकिन एक साल के अंदर ही कुमार स्वामी सरकार गिर गई और भारतीय जनता पार्टी के बीएस येदियुरप्पा फिर से मुख्यमंत्री बन गए। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए गए कांग्रेस के 15 विधायकों के क्षेत्रों में सम्पन्न हुए उपचुनाव में भाजपा को 12 व कांग्रेस को दो सीट ही मिल पाई। एक सीट पर भाजपा का बागी चुनाव जीत गया। कर्नाटक जैसा बड़ा प्रदेश हाथ से फिसलने के उपरांत भी कांग्रेस पार्टी द्वारा खुशी मनाना लोगों की समझ से परे है।
2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के उस वक्त के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, सोनिया गांधी सहित सभी बड़े नेताओं ने केेंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एक बड़ा देशव्यापी अभियान चलाया था। विरोधी दलों के बहुत सारे नेताओं ने भी कांग्रेस के उस अभियान को अपना समर्थन दिया था। लेकिन लोकसभा चुनाव में देश की जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दूसरी बार भरोसा करते हुये भाजपा को 303 लोकसभा सीटों पर जिताकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दूसरी बार केंद्र में सरकार बनवाई। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस मात्र 52 सीटों पर ही सिमट कर रह गई। यहां तक कि कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी खुद अपनी पारंपरिक सीट अमेठी से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से चुनाव हार गए थे। लोकसभा चुनाव में केरल, पंजाब और तमिलनाडु ने जरूर कांग्रेस की लाज रख ली। कांग्रेस केरल में 15, पंजाब में 8 और तमिलनाडु में 8 सीटें जीतने में सफल रही। इसके अलावा तेलंगाना में तीन, पश्चिम बंगाल व छत्तीसगढ़ में दो-दो, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, मेघालय, अंडमान निकोबार दीप समूह, पांडिचेरी में कांग्रेस का एक-एक सांसद ही जीत पाया। जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, गुजरात, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा, चंडीगढ़ सहित 14 प्रदेशों में तो कांग्रेस का खाता भी नहीं खुल पाया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को देशभर में 19.49 प्रतिशत मत मिले थे जबकि लोकसभा में उनके सांसदों का प्रतिनिधित्व मात्र 9.58 प्रतिशत है। राज्यसभा में भी कांग्रेस के सदस्यों की संख्या घटकर मात्र 46 रह गई है।
2014 में कांग्रेस पार्टी की जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, झारखण्ड, असम, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम सहित कुल 16 प्रदेशों में सरकार थी। वहीं 2019 में कांग्रेस पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पांडिचेरी में अकेले अपने बल पर व महाराष्ट्र तथा झारखंड में क्षेत्रीय दलों के छोटे पार्टनर के रूप में सत्तारूढ़ है। महाराष्ट्र में तो जोड़-तोड़ कर कांग्रेस, शिवसेना व एनसीपी के साथ मिलकर सरकार में शामिल हो गई। लेकिन हरियाणा विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस लगातार दूसरी बार सरकार बनाने से रह गई। हरियाणा में 40 सीटें जीतकर भाजपा ने वहां दुष्यंत चौटाला व निर्दलियों के साथ मिलाकर सरकार बना ली।
कांग्रेस पार्टी को अपने संगठन को मजबूत बनाने की दिशा में काम करना चाहिए। पार्टी में जमीन से जुड़े लोगों को आगे लाना चाहिए। राज्यसभा के रास्ते वर्षों से सत्ता का सुख भोगने वाले बड़बोलों से पार्टी को पीछा छुड़ाना चाहिए। साफ छवि के नेताओं को नेतृत्व की अग्रिम पंक्ति में भागीदारी देनी चाहिए जिससे कांग्रेस जमीनी स्तर पर मजबूत होकर अपना पुराना जनाधार हासिल कर सके। यदि आने वाले समय में भी कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों के सहारे गठबंधन की राजनीति में ही उलझी रहेगी तो उसका रहा सहा जनाधार भी खिसक जाएगा। फिर कांग्रेस नेता राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना सपना बनकर ही रह जायेगा।
केंद्र और राज्य की राजनीति अलग-अलग
क्षेत्रीय क्षत्रपों की वापसी ने केंद्र और राज्य की राजनीति को अलग-अलग तरीके से लेने का संदेश दे दिया है। दिल्ली के चुनावी मैदान में तो इस संदेश का सकारात्मक असर दिखने भी लगा है। केंद्र सरकार के पास अभी पर्याप्त समय है कि वह जनता की उन जरूरतों पर संवाद करे जिसका संदेश उसने दिया है। हमने 2019 का जो चुनावी पाठ शुरू किया था, झारखंड ने क्षेत्रीयता का झंडा बुलंद कर उसका उपसंहार भी रच दिया है। सत्ता और जनता के बीच के रिश्ते को समझने का, कभी जनता के आगे जाने और सत्ता के पीछे होने का यह क्रम अगले साल भी चलता रहेगा।
कांग्रेस पार्टी जूनियर पार्टनर की भूमिका में
कांग्रेस पार्टी के सभी बड़े नेता इन दिनों खुशी से बम-बम हो रहे हैं। पहले महाराष्ट्र फिर झारखंड में भाजपा की हार से कांग्रेस कार्यकर्ता ऐसे खुशी मना रहे हैं मानो कांग्रेस पार्टी ने बरसों से खोया अपना जनाधार फिर से हासिल कर लिया हो। कांग्रेसजनों के चेहरे पर इन दिनों किसी जंग को जीतने वाली मुस्कान देखने को मिल रही है। हालांकि महाराष्ट्र व झारखंड दोनों ही प्रदेशों की सरकार में कांग्रेस पार्टी जूनियर पार्टनर की भूमिका में है। इन दो प्रदेशों की सरकार में शामिल होकर कांग्रेस हरियाणा विधानसभा चुनाव में मिली हार व कर्नाटक में बड़ी बेअदबी से सत्ता से बेदखली के गम को भी भुलाने का प्रयास कर रही है।
- दिल्ली से रेणु आगाल