तुलसी नारी विरोधी नहीं
18-Nov-2019 07:49 AM 1238780
कुछ लोग संत तुलसीदास की एक चौपाई को आधार बना कर उन्हें नारी विरोधी ठहराने में लग जाते हैं, परंतु प्रश्न यह उठते हैं कि क्या एक नारिब्रतरत सब झारी। ते मन बच क्रम पतिहितकारी।’ के माध्यम से पुरुष के विशेषाधिकारों को न मान कर दोनों को समान रूप से एक ही व्रत पालने का आदेश देने वाले संत तुलसीदास नारी विरोधी हो सकते हैं? सीता का परम आदर्शवादी महिला के रूप में एवं उनकी नैतिकता का चित्रण, उर्मिला के विरह और त्याग का चित्रण, यहां तक कि लंकापति रावण की पत्नी मंदोदरी और महिला असुर त्रिजटा का सकारात्मक चित्रण करने वाले संत तुलसीदास नारी विरोधी हो सकते हैं? वास्तव में रामचरितमानस में तुलसीदास की जिस चौपाई को आधार बना कर जो लोग उन्हें नारी विरोधी ठहराने की कुचेष्टा करते हैं, वे अपूर्ण-अधूरे ज्ञानी हैं। आइए पहले आपको तुलसीदास की वह चौपाई बताते हैं, जिसे लेकर अक्सर तुलसीदास को घेरा जाता है। यह चौपाई है : ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी-ये सब ताडऩ के अधिकारी’। तुलसीदास की यह चौपाई 445 वर्षों से अधिक पुरानी है। तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना का आरंभ विक्रम संवत् 1631 (ईसवी सन् 1574) में किया था और 2 वर्ष 7 माह 26 दिनों के बाद विक्रम संवत 1633 (ईस्वी सन् 1576) में यह रचना पूर्ण हुई थी। यह वह कालखंड था, जब भारत में हिन्दी पूर्णत: विकसित नहीं हुई थी। यह वह काल था, जब उत्तर भारत में संस्कृत, अवधी, मागधी, अर्धमागधी जैसी भाषाएं प्रचलित थीं। रामचरितमानस ग्रंथ की चौपाई ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी-ये सब ताडऩ के अधिकारी’ में जिस ताडऩ’ शब्द के कारण तुलसीदास को महिला और शूद्र विरोधी ठहराया जाता है, वह ताडऩ शब्द वास्तव में अवधी भाषा का है। वर्तमान विकसित हिन्दी में ताडऩ के अर्थ को प्रताडऩा, यातना के साथ जोड़ा जाता है, परंतु तुलसीदास की चोपाई में जिस ताडऩ’ शब्द का उल्लेख है, उसका अवधी भाषा में अर्थ होता है पहचानना’ या परखना’। इस प्रकार तुलसीदासजी इस चौपाई में नारी या शूद्र विरोध नहीं कर रहे, अपितु उन्हें परखने का संदेश दे रहे हैं। ढोल, गंवार, शूद्र, पशु नारी-ये सब ताडऩ के अधिकारी’। रामचरितमानस ने इस चौपाई को रामायण के उस प्रसंग के समय लिखी है, जब भगवान श्रीराम की याचना के बावजूद सागर उन्हें लंका जाने का मार्ग नहीं देता। जब श्रीराम क्रोधित हो गए और अपने तुणीर से बाण निकाला, तो समुद्र देव श्रीराम के चरणों में आए और श्रीराम से क्षमा मांगते हुए अनुनय करते हुए कहने लगे, हे प्रभु, आपने अच्छा किया जो मुझे शिक्षा दी। तुलसीदास ने इस चौपाई में उल्लेखित चार शब्दों में सागर को गंवार की संज्ञा दी, जो विशेष ध्यान रखने यानी शिक्षा देने के योग्य होते है। इसी प्रकार ढोल को यदि परखे बिना बजाया जाए, तो वह बेसुरा बजेगा। शूद्र के व्यवहार को परख कर ही उसके साथ जीवन यापन संभव हो सकता है। पशु को ताडऩे का अर्थ प्रताडऩा नहीं हो सकता, क्योंकि यदि पशु को प्रताडि़त किया जाए, तो वह मानव के वश में नहीं रह सकता। ताडऩ का अर्थ है परखना। जैसे हाथी-घोड़े-गाय आदि को परख कर ही उन्हें अपने वश में रखा जा सकता है। रही बात नारी की, तो नारी भी इसलिए ताडऩ की अधिकारी है, क्योंकि किसी भी नारी को जब तक परखा न जाए, उसे समझा न जाए, तब तक उसके साथ जीवन यापन करना संभव नहीं है। ब्राह्मण परिवार में जन्मे तुलसीदास के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जन्म के बाद प्रथम शब्द राम का उच्चारण किया था। इसी कारण इनका नाम रामबोले पड़ गया। बचपन से ही तुलसीदास का मन पूजा-पाठ में अधिक था। इनकी अल्पायु में किसी को तनिक भी अभास नहीं हो सकता था कि वे एक दिन भगवान राम के सबसे बड़े आधुनिक भक्त कहलाएंगे। यद्यपि जिस प्रकार हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है, ठीक ऐसा ही तुलसीदास के साथ भी हुआ। रामबोले को संत तुलसीदास बनाने का श्रेय उनकी पत्नी रत्नावली को दिया जा सकता है। तुलसीदास का विवाह दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ था। तुलसीदास पत्नी रत्नावली से अत्यधिक प्रेम करते थे, परंतु रत्नावली ने तुलसीदास को प्रेम और मोह के बीच का अंतर समझाया। हुआ यूं कि नई-नई दुल्हन बन कर आई रत्नावली मायके गई हुई थी। रत्नावली के बिना तुलसीदास को घर में न नींद आ रही थी, न चैन। इसी कारण तुलसीदास देर रात अपने घर से निकल पड़े और रत्नावली से मिलने अपने ससुराल पहुंच गए। तुलसीदास चुपचाप रत्नावली के कमरे में दाखिल हुए, तब रत्नावली ने बहुत ही तीखा कटाक्ष किया, लाज न आई आपको, दौरे आएहु नाथ। अस्थि चर्ममय देह यह, ता सौं ऐसी प्रीति ता। नेकू जो होती राम से, तो काहे भव-भीत बीता।’ अर्थात् रत्नावली ने तुलसीदास से कहा, इतनी रात गए चुपचाप मेरे मायके आने में आपको लाज नहीं आई। हड्डी-चमड़ी की इस देह की बजाए राम से इतनी प्रीति करते, तो भव पार उतर जाते।’ रत्नावली के इन शब्दों ने तुलसीदास के जीवन की दिशा ही बदल डाली और वे राम भक्ति में ऐसे डूबे कि उनके अनन्य भक्त बन गए। इस तरह पत्नी के एक ताने ने साधारण रामबोले को महान संत बनने की ओर अग्रसर किया। - ओम
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