वनाधिकार जरूरी
18-Nov-2019 07:33 AM 1237847
केंद्र सरकार का नया वन धन कार्यक्रम आ चुका है। यह गैर-लकड़ी के वन उत्पादन का उपयोग करके जनजातियों के लिए आजीविका के साधन मुहैया कराने की पहल है। मतलब देश के वन धन हैं, कुदरत के कुबेर हैं। इसलिए सरकार कहती है वन से धन कमाना है। याद होगा, जंगलों को कमाई के स्त्रोत बता कर गोरों ने जंगलात विभाग बनाया था। आज जनमत से चुनी गई सरकार भी बता रही है कि जंगलों के बूते गरीब कैसे अमीर बनें। अमीर बनने के उपाय-जुगाड़ और नुस्खे सरकार के उन नौकरशाहों के पास हैं जो जनजातीय कार्य मंत्रालय से लेकर ट्राईफेड (द ट्राइबल को-ऑपरेटिव मार्केटिंग डेवलपमेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया) जैसी संस्थाओं में बैठकर बताते हैं कि आदिवासी भारत में कितना लावण्य है, कितनी मोहकता है, बांस-घास और टहनियों से बने भवनों की भव्यता है और खलिहानों में विराजती श्रेष्ठता है। आदिवासी भारत के विभिन्न उत्पादों और कलाकृतियों को संजोती कॉफी टेबल बुक सत्ता के गढ़ों से लेकर प्रशासन के बुर्जों पर सजाई जा रही हैं। वन धन योजना के तहत जंगलों में सीमित मात्रा में मिलने वाले खाद्य पदार्थों के संग्रह करने और उन उत्पादों को बेहतर ढंग से इस्तेमाल किए जाने का गुर आदिवासियों को सिखाया जाएगा। यानी आदिवासियों का लघु वनोपजों से संबंधित लोकज्ञान अधूरा और अवैज्ञानिक है, ऐसा नौकरशाही मानती है। नौकरशाही कहती है कि जंगलों से सीमित मात्रा में मिलने वाले उत्पाद कुछ खास समय के दौरान ही मिलते हैं। ऐसे में विपरीत मौसम में आदिवासी समुदाय को अपनी आजीविका चलाने और जीवनयापन करने में बेहद दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसलिए वन धन विकास केंद्रों के जरिए एकत्र किए गए लघु वनोपजों जमा कर उनको प्रस्संकृत करके सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि प्रतिकूल मौसम या परिस्थितियों के हिसाब से उन वस्तुओं का उचित उपयोग किया जा सके। तो क्या आज तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव-तकनीकी विभाग ने इसी दर्शन और विचार पर किसी तरह का कोई काम नहीं किया? क्या सरकार ने कभी इस सच को जानने की कोशिश की? सरकार अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहती है कि जंगल आधारित उत्पादों से आदिवासी समूहों को काम उपलब्ध कराना जरूरी है, जिससे वे वर्ष भर काम में व्यस्त रहें। साथ ही, जनजातीय समूह की महिलाओं को भी आर्थिक तौर पर सक्षम बनाना है, जिससे वे परिवार को सुरक्षा प्रदान कर सकें। माना जा रहा है कि जंगल देश के पांच करोड़ से अधिक जनजातीय लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है और जिन जिलों में जनजातीय लोग निवास करते हैं, उन जिलों में जंगल मौजूद होते हैं। इसलिए ट्राईफेड गैर लकड़ी वन्य उत्पादों के एवज में आदिवासी समाज को उचित मूल्य उपलब्ध कराएगा। लेकिन सवाल है कि क्या आदिवासी अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून लागू होने के बावजूद जंगलों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं? साल 2006 में सरकार ने मान लिया था कि जंगल आदिवासियों के हैं। यानी जंगलों पर पहला अधिकार वहां के मूल बाशिंदों का है। तभी तो वनोपजों के संग्रह करने और उससे जुड़ी आजीविका के मसले पर अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून आज से तेरह साल पहले अस्तित्व में आया। तब संसद ने समवेत स्वर में माना था कि जंगलों के संरक्षण के नाम पर इन आदिवासियों पर बड़े जुल्म किए गए हैं। चूंकि सरकार हर हाल में वन्य समाज का विकास और लोगों की समृद्धि चाहती है, इसलिए समय गंवाए बिना उन पुश्तैनी जुल्मियों के कुकृत्यों को माफ कर इस कानून से जंगल में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों और अन्य परंपरागत वन निवासियों के वन्य-संसाधनों पर उनके मौलिक अधिकारों की पुष्टि की गई। साथ में जंगल-जंगली जानवर और जैव विविधता संरक्षण को लेकर विभिन्न समाज और समुदायों के दायित्वों की दिशा और दायित्व तय करने की पहल की गई। हालांकि यह सब करते हुए 13 साल बीत गए, पर जंगल पर अधिकार का सपना अधूरा रह गया। जिन्हें कुछ नहीं मिला, उन्हें व्यवस्था जंगल के कानून जैसी निर्मम लगने लगी। आदिवासियों को मुफ्तजीवी बनाया जा रहा नौकरशाही यह मानने की भूल कर रही है कि आदिवासी भारत की पूरी आबादी अपने गांव में बैठी है और वनोपज संग्रह की उनकी प्रवृति बरकरार है। आदिवासियों ने वनोपजों के बूते जिंदगी नहीं चला पाने का निष्कर्ष बहुत पहले निकाल लिया और आज आदिवासी जंगलों में भटकाव और पत्थरों पर माथा टिकाने के बजाय देश के औद्योगिक नगरों में अपेक्षाकृत सहज श्रम कर सम्मानित जिंदगी जी रहे हैं। सरकार ने खुद आदिवासियों को वनाश्रित जीवन दर्शन से दूर कर पैकेज परोसकर मुफ्तजीवी बनाया है। इस योजना का सबसे कमजोर पक्ष यही है कि वन धन आदिवासियों के हितों का और उनके संगठन के ब्रांड के मंसूबे नहीं रखता। यह सुहानी-सी बात है कि वन संपदा समृद्ध जनजातीय जिलों में वन धन विकास केंद्र जनजातीय समुदाय के जरिए संचालित होंगे। एक केंद्र दस जनजातीय स्वयं सहायता समूह का गठन करेगा। प्रत्येक समूह में तीस जनजातीय संग्रहकर्ता होंगे। एक केंद्र के जरिए 300 लाभार्थी इस योजना में शामिल होंगे। हकीकत यह है कि देश के कुछ हिस्सों को छोड़कर स्वयं सहायता समूह आज अमूमन सफल नहीं है। बैंक, एनजीओ, से लेकर नाबार्ड और कपार्ट तक इस असफलता के न सिर्फ भुक्तभोगी हैं, बल्कि स्वयं-सहायता समूहों की कारगुजारियों के राजदार भी हैं। - धर्मेन्द्र सिंह कथूरिया
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