05-Sep-2019 08:26 AM
1235285
तलाकÓ शब्द शादीशुदा जिन्दगी के ऊपर लगा एक ऐसा दाग होता है जिसे तलाक लेने वाला भूलना भी चाहे तो समाज उसे भूलने नहीं देता है। लोगों के तरह-तरह के सवाल आपके फैसले पर और आप पर जलते अंगारों की तरह पड़ते रहते हैं। अब क्या करोगी?Ó, शादी जैसी भी हो तोडऩी नहीं चाहिए थीÓ, लड़की हो, अकेले कैसे गुजारा करोगी?Ó जैसे तमाम सवाल तलाकशुदा को जीने नहीं देते।
हमारे समाज में शादी को एक टैबू की तरह प्रयोग में लाया जाता हैं। खासतौर पर जब बात लड़कियों की हो, तब विवाह अपेक्षाकृत जरूरी माना गया हैं। शादी को जरूरी इसलिए मानते हैं क्योंकि हर इंसान को एक साथी की जरूरत होती हैं। जो मानसिक तौर पर, भावात्मक रूप से, आर्थिक स्थिति में और कठिन परिस्थितियों में उसके साथ खड़ा रह सके। समाज शादी को इसलिए ज्यादा अहमियत देता है ताकि बेटियों को एक सम्मानजनक और ठोस जीवन जीने की सुविधा मिल सके। लेकिन जब यही शादी लड़कियों के लिए जी का जंजाल बन जाए तो इस शादी के बंधन से वो बाहर निकलना ही उचित समझती हैं। यह अफसोस की बात है कि शादी टूटने के पीछे लड़कियां दोषी हों या निर्दोष हों, समाज के लोग उसे साधारण नजरों से देखना बंद कर देते हैं। ऐसा लगता है जैसे वो इंसान नहीं एलियन हो गई हों। एक तरफ जहां लड़की अपनी टूटी हुई शादी का दंश झेल रही होती है, वहीं दूसरी तरफ लोगों के सवालों की बौछार उसके मनोबल को तोडऩे का काम करती हैं।
तलाक लेना एक मुश्किल फैसला हैं। चाहे वो मर्द हो या औरत। लेकिन शादी के बंधन में जिन्दगी जब घुटने लग जाए तो ये बेहतर हैं कि उसे तोड़कर बाहर आ जाया जाए। एक लड़की जब तलाक का फैसला लेती है तो वो उसके लिए बेहद चुनौतीभरा वक्त होता हैं। मां-बाप, रिश्तेदार, समाज सबको किनारे कर सिर्फ खुद के बारे में सोचना हिम्मत वाली बात होती हैं। इसलिए जब वो ये निर्णय लेती है, तो उसे पता होता है कि ये बेहद महत्वपूर्ण निर्णय है, जो उसके अच्छे भविष्य के लिए बेहतर साबित हो सकता है। पति से अलग हो जाना, जीवन का सबसे दुखद क्षण है और इसके बाद एक लड़की की जिन्दगी दुबारा पटरी पर नहीं आ सकती है, ऐसी सोच रखना गलत है। मेरी सहेली की सोच है कि अपनी शादी खत्म हो जाने के बाद उसके जीवन का कोई मतलब नहीं रह गया, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं। वो खुश है। अपने भविष्य को एक दिशा दे रही है। अपने सपनों और महत्वकांक्षाओं को पूरा करने में जुट गई है। वो एक नए सिरे से खुद को आगे बढ़ाना चाहती है। उसका मानना है कि जो औरतें नौकरीपेशा नहीं हैं, उन्हें भी तलाक के बाद या पति से अलग हो जाने पर जिन्दगी को बोझ नहीं समझना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए नई शुरुआत करने की। अकेली औरत को या तो लोग बुरी नजर से देखते हैं या फिर सहानुभूति की नजर से। लेकिन ये फालतू की सहानुभूति किसी को नहीं चाहिए होती है। जरूरी है कि उसके फैसले को सम्मान मिले। तलाकशुदा औरतें या पति से अलग हुई महिलाओं को लोगों की झूठी सहानुभूति नहीं, उनके फैसलें के प्रति सम्मान की भावना चाहिए ताकि उसकी आगे की जिन्दगी आसान हो सके।
अक्सर देखा जाता है कि शादी निभाने की जिम्मेदारी लड़कियों पर ही डाल दी जाती हैं। शादी अच्छी चल रही हो या बुरी, उससे ही अपनी शादी बचाने और आगे बढ़ाने की उम्मीद परिवार और समाज करता है। किशोरावस्था से ही लड़कियों को सिखाया जाता है कि पति का घर ही उनका असली घर है और उसे हर हाल में शादी निभानी है। यह उसका धर्म है। ऐसे में जब शादी टूटने की बात आती है तो लड़कियों को ही दोषी ठहराया जाता है। जबकि लोग ये भूल जाते हैं कि ताली एक हाथ से नहीं बजती है।
पितृसत्तात्मक समाज में औरतों को हमेशा से ही मर्दों के सहारे का आदि बना कर रखा गया है। पहले पिता, फिर भाई, फिर पति और फिर बेटे के रूप में उसे किसी न किसी पर आश्रित रहना ही सिखाया गया है। इनके बिना उसके जीवन को कठिन और संघर्षभरा बताया जाता रहा है। ऐसे में जब कोई लड़की अपने पति से अलग होती है, तो बचपन से उसके मन में बिठायी गयी बात उस पर हावी हो जाती है कि अब उसका सहारा छूट गया। यदि यह भाव ज्यादा हावी हो गया तो समस्या गंभीर हो जाती है। ऐसे में खुद को ये हौसला देना की वो शादी टूटने के बाद भी बिना किसी साथी के अकेले अपनी जिन्दगी जी सकती हैं, एक लड़की की मानसिक संबलता को दर्शाता है और यदि इसमें उसका परिवार, उसके दोस्त और नाते-रिश्तेदार भी सकारात्मक भूमिका निभाएं तो उसके लिए जिन्दगी बहुत आसान हो सकती है।
-ज्योत्सना अनूप यादव