मुआवजा बना मुद्दा
05-Sep-2019 08:08 AM 1237527
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दिन जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, राजनीतिक पार्टियां वैसे-वैसे मुद्दों को हवा दे रही हैं। प्रदेश में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार है और आगामी चुनाव दोनों मिलकर लड़ेंगे। बावजूद इसके शिवसेना भाजपा को घेरने का कोई भी मौका नहीं चूकती है। इसी कड़ी में शिवसेना ने किसानों के मुआवजे को मुद्दा बनाया है। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने जून में जब महाराष्ट्र के किसानों को केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाइ) के तहत नाकाफी मुआवजे का मुद्दा छेड़ा था, तब उनकी पार्टी के नेता जानते थे कि यह सोचा-समझा कदम है। महीने भर बाद 18 जुलाई को ठाकरे ने मुंबई में 20,000 किसानों के कूच की अगुआई की और बीमा कंपनियों को ललकारा, मैं तुम्हें 15 दिन देता हूं। अगर मुआवजा नहीं दिया तो 16वें दिन कार्रवाई शुरू हो जाएगी। रकम की गैर-अदायगी या नाकाफी राहत की बढ़ती शिकायतों के चलते फसल बीमा योजना महाराष्ट्र में सरगर्म मुद्दा बन गई है। आक्रोश तभी से बहुत ज्यादा है जब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस ने जून में दिए इंटरव्यू में दावा किया था कि उन्होंने पिछले पांच साल में बीमा कंपनियों से 15,000 करोड़ रुपए का भुगतान करवाया है। पीएमएफबीवाइ के तहत किसान 2 फीसदी प्रीमियम अदा करते हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकारें 49-49 फीसदी प्रीमियम चुकाती हैं। किसानों को मुआवजा तब मिलता है जब कृषि महकमे के अफसरान फसलों को नुक्सान का मुआयना करने के बाद उन्हें हकदार ठहराते हैं। कोल्हापुर जिले के चंदगड़ के किसान सुरेश पाटील शिकायत करते हैं कि चार महीने पहले सूखे से फसल बर्बाद होने के बाद भी उन्हें कोई मुआवजा नहीं मिला है। वे कहते हैं, मैं बार-बार चेक करता हूं, पर मेरे खाते में कोई पैसा जमा ही नहीं हुआ। सांगली के किसान अशोक शिंदे और सतारा के दीपक पाटील की भी यही कहानी है। तीनों ठाकरे के प्रदर्शन में मौजूद थे। पूरे महाराष्ट्र में तकरीबन 1,000 शिकायतें दर्ज हुई हैं। इनमें से कई में महज 10-15 रुपए का मामूली मुआवजा मिलने की बात कही गई है। बुल्ढाणा जिले में शुरुआत में 3,800 किसान मुआवजे के हकदार घोषित किए गए थे। बाद में गलती सुधार ली गई। सरकार की पहल पर किसानों के कर्ज को आसान बनाने के लिए काम कर रहे वसंतराव नाइक शेती स्वावलंबन मिशन (वीएनएसएसएम) के चेयरमैन किशोर तिवारी कहते हैं कि फसल बीमा की अदायगी बेहद अहम जरूरत है क्योंकि इसके बगैर बैंक नए कर्ज देने से इनकार कर रहे हैं। तिवारी दावा करते हैं कि राज्य सरकार ने फसल ऋण के लिए 25,000 करोड़ रु. तय किए हैं, पर सरकारी बैंकों ने महज 25 फीसदी और सहकारी बैंकों ने 40 फीसदी ही बांटे हैं। किसान कार्यकर्ता विजय जवांधिया कहते हैं कि गड़बड़ी मूल्यांकन की व्यवस्था में है क्योंकि फसल के नुकसान का हिसाब तालुका स्तर पर लगाया जाता है और 100 गांवों के समूह में से पांच या छह गांवों से नमूने इक_ा किए जाते हैं। इससे ठीक-ठीक तस्वीर सामने नहीं आ पाती कि नुकसान किस हद तक हुआ है। वे कहते हैं, अगर गांव छोटे हैं तो आंकलन गांव या ग्राम पंचायत के स्तर पर होने चाहिए। जवांधिया सुझाव देते हैं कि बीमे की रकम सिंचित और गैर-सिंचित खेतों के लिए अलग-अलग होनी चाहिए। वे सियासतदानों पर चुनावी लाभ के लिए मुद्दे का फायदा उठाने का आरोप भी लगाते हैं और कहते हैं, किसानों के फायदे के उपाय करने के बजाए वे विधानसभा चुनाव के पहले इस मुद्दे को सियासी रंग दे रहे हैं। ठाकरे ने विधानसभा चुनाव से महज तीन महीने पहले अपना आंदोलन शुरू किया है। इस मुद्दे को उठाने के लिए उन्होंने मराठवाड़ा को चुना जो पहले शिवसेना का गढ़ हुआ करता था और जहां उसकी सहयोगी पार्टी भाजपा तेजी से अपने पैर फैला रही है। उन्होंने कहा, हम किसानों के साथ मजबूती से खड़े हैं, यह हमारा वादा है। वहीं जवांधिया कहते हैं कि ठाकरे अगर किसानों के मुद्दों को लेकर ईमानदार हैं तो उन्हें फसलों का आकलन करने वाले कृषि अफसरों की खबर लेनी चाहिए। -बिन्दु माथुर
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