भीड़ के पीछे सुबकता एक बूढ़ा
18-Jul-2019 09:30 AM 1237675
एक नेता जी ने दूसरे नेता जी से माफी क्या मांग ली, लगता है अब देश के कोने-कोने से माफीनामों की बरसात होने लगेगी। यह क्या गजब हुआ? इस देश में तो आत्मावलोकन का चलन नहीं। लीजिए, यह चलन भी शुरू हो गया। अब न जाने कितने महापुरुष अपना-अपना माफीनामा लेकर आगे बढ़ते नजर आएंगे। अब हमारे जैसे तुच्छ, हकीर और फकीर आदमी इन माफीनामों को पढ़ेंगे और अपनी किस्मत के और भी बिगड़ जाने पर आठ-आठ आंसू रोते नजर आएंगे। लेकिन आत्मावलोकन का जमाना है न, इसलिए हमें आंसू बहाते देख हमारे अंदर से ही कोई अट्टहास करता है, तेरी किस्मत संवरी ही कब थी इन सत्तर बरसों में ए बौड़म, जो अब तू उसके बिगड़ जाने का बहाना बना, आंसुओं की गिनती करने लगा। गिनती ही करनी है तो इस बात की कर कि आज तेरा कौन से नंबर का सपना टूटा। इज्जत और शराफत से अपने लिए रोटी, कपड़ा और मकान जुटाने के सपने को तो तूने जाने कितने वर्ष पहले दफन कर दिया था। हां, जिन्होंने अपनी इज्जत और शराफत के नाम माफीनामा लिख दिया, वह कल फटीचर साइकल पर चलते थे, आज आयातित गाड़ी चलाते हैं। कल जनसेवा के प्रति समर्पण का दम भरते थे, आज इसके नाम माफीनामे का खत लिख कर दिया तो राजनीति के उडऩ खटोले पर देश-विदेश घूम रहे हैं और प्रशंसकों से मेरा भारत महानÓ के नारे लगवा रहे हैं। नारों की इस भीड़ के पीछे एक बूढ़ा सुबक कर रोया, लेकिन किसी को दिखाई नहीं दिया। यह वही बूढ़ा था न, जिसका एकमात्र सपूत रोजगार दफ्तर की बंद खिड़की के बाहर काम पाने के लिए वर्षों अपनी एडिय़ां रगड़ता रहा, फिर कपूत बन कर हेरोइन या सफेद पाऊडर के किसी अंधेरे में डूब कर दम तोड़ गया। वह सुबकता हुआ बूढ़ा अपनी इस त्रासदी के लिए भी माफीनामा चाहता है। लेकिन एक-दूसरे से माफियों का आदान-प्रदान करने वाले बड़े लोगों को अपने विजयघोष के कोलाहल में सुबकते बूढ़ों को माफीनामा प्रेषित करने की फुर्सत कहां? अरे, हम ऐसे माफीनामे लिखने चलें तो किस-किस के नाम लिखते रहेंगे? इससे बेहतर नहीं कि आपस में ही इसकी शीरनी बांट लें, और नेपथ्य से उभरती इन सुबकती आवाजों से बेनियाज हो मुंह ढक के सो जाएं। अगर इनकी पहचान कर माफीनामों की सौगात बांटने चलें, तो कर चुके हम राजनीति। यह सौगात तो स्कूलों-कॉलेजों से ही शुरू हो जाती है, जिन्हें कभी शिक्षा मंदिर कहा जाता था। वे आज बिना भाड़े की दुकान हो गए हैं, क्योंकि आज का नौजवान फीस यहां चुकाता है, और असल भाड़ा अध्यापक जी के ट्यूशन सेंटर में देता है, जहां सफलता के शार्टकट से लेकर नकल और पर्चा जांचने वाले की कीमत के बीजमंत्र तक बिकते हैं। आपने वह कीमत नहीं चुकाई और विद्यालयों के शिक्षा मंदिर होने के बीते युग जैसे सपने पर भरोसा किया, तभी तो आज नेपथ्य में मुंह छिपा कर रोने की नौबत आई है। मगर अपनी कंजी आंखें मिचमिचा कर शर्तिया वीजा लगवा देने का भरोसा देने वाला हमारा पड़ोसी ट्रेवल एजेंट कहता है— आपने आइलिट पास नहीं की, परीक्षा में छह बैंड नहीं लिए, तो क्या परेशानी? हम किसी गायन यात्रा पर विदेश की ओर प्रस्थान करते महान गायक का साजिंदा बनवा कर आपको विदेश भिजवा देंगे। किसी अंतरराष्ट्रीय पहलवान को पकड़ लेंगे। वह जब अपना प्रायोजित दंगल लडऩे के लिए विदेश जाएगा, तो आप उसका लंगोटा उठाने वाले सहकारी के रूप में पैक हो सकते हैं। विदेश पहुंच गए, तो गायक या पहलवान की अर्थपूजा कर प्रवासी अजनबी भीड़ में गुम हो जाइए। क्या हुआ, जो आपको अब वहां गुमनाम दोयम दर्जे के नागरिक की जिंदगी जीनी पड़ेगी। इस देश में भी तो आप गुमनाम थे और तिस पर तीसरे दर्जे के नागरिक अलग से। कम से कम वहां जाकर आपका दर्जा तो बढ़ कर दोयम हो गया। होता है यही तमाशा दिन-रात मेरे आगे।Ó कोई किसी से माफी नहीं मांगता। न वे प्रवासी दुल्हिनें, जो अपनी फीस लेकर अस्थायी पति विदेश ले जाकर छुट्टा छोड़ देती हैं और इसे भारत मां के कंधों पर लदे हुए बेकारों के बोझ को कम करने की राष्ट्र भक्ति के लिए माफीनामा नहीं, प्रशस्ति पत्र चाहती है। जी हां, ऐसी कामयाब कबूतरबाजी को ही तो प्रशस्ति पत्र मिलता है। वह नाकामयाब हो जाए तो अंधेरी कोठरी में सडऩा। वहां से तो सुबकते हुए माफीनामे भी आपको छुटकारा नहीं दिला सकते। लेकिन नहीं, हर जगह ही यह माफीनामा बेअसर नहीं हो गया। आपके शहर में कोई उप-चुनाव नहीं हो रहा, तो इंतजार कीजिए, आने वाले आम चुनावों का। तब बरसात के मौसम में निकल आने वाली बीर बहूटियों की तरह अपने सत्ता के प्रकोष्ठों से निकल कर नेतागण आपकी गलियों में आएंगे। उनके हाथ में दो कागज रहेंगे। पहला तो एक माफीनामा कि मैं शासन करते हुए अपने वंशजों के चेहरे याद रखते हुए तुम सबके चेहरे भूल गया, इसलिए माफी। लेकिन दूसरे कागज में तुम्हारे लिए सपनों, वायदों और घोषणाओं की बारात सजी होगी। तुम इस माफीनामे को स्वीकार करके अपने लिए सजे सपनों की बारात के आगे-आगे नाचना, क्योंकि यही तुम्हारी आदत है। - सुरेश सेठ
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