आ अब लौट चलें
04-Jul-2019 08:05 AM 1237723
कुछ दिनों से एक गाना गर्मी की लू से उठे छोटे से चक्रवात की तरह दिमाग में घूम रहा है। मैं कह नहीं सकता कि यह ज्यादा मन का बवंडर है या फिर दिमाग म_ा हो गया है, पर इतना जरूर जानता हूं कि यह एक भूत की तरह मेरे पीछे पड़ गया है। जब मैं कच्ची उम्र का था, तो गर्मियों में मेरी दादी मुझे दोपहर में घर के सामने मैदान में जाने से मना करती थी। वह कहती थी कि दोपहर में बाहर जाने से भूत चिपट जाता है और वह बच्चों की तबियत ही नहीं खराब कर देता, बल्कि उन्हें पागल भी कर देता है। जरा-सी खिड़की खोल कर वे बाहर दिखाती थीं, जहां मैदान की तपती जमीन से एकाध बवंडर बल खाते हुए कागज, पत्ते और तिनकों को फर्श से उठा कर अर्श तक ले जाने की कोशिश कर रहे होते थे। दादी कहती, वो देखो भूत है। नाच रहा है। उसे बच्चों की तलाश है और जैसे ही तुम बाहर जाओगे, वह तुम पर चढ़ कर नाचने लगेगा। मैं और मेरे भाई भूत से चश्मदीद होने के बाद डर जाते थे और गर्मी भर घर में दुबके रहते थे। हम जिस छोटे शहर में रहते थे, वहां जेठ और आषाढ़ में अक्सर आंधी आती थी। जब धूल से आसमान भर जाता था, तो पीली आंधी आती थी। काले बादलों के बीच उठी आंधी को काली आंधी कहा जाता था। उस जमाने में आंधियां सिर्फ काली और पीली होती थीं। पीली को केसरिया आंधी कहने का चलन नहीं था। खैर, जो गाना रह रह कर मन में उबाल मार रहा है, वह राज कपूर की एक पुरानी फिल्म जिस देश में गंगा बहती हैÓ से है। फिल्म का सीन तो मुझे पूरी तरह से याद नहीं है, पर आ फिर लौट चलें नैन बिछाए बाहें पसारे तुझको पुकारे देस तेराÓ की पुकार एक गहरी बांझ घाटी से उठी गूंज की तरह मन मानस से बार-बार टकरा कर लौट रही है। आ अब लौट चलेंÓ की सरगम और उसमें बसे शब्द दिमाग में ठीक उसी तरह का बवंडर उठाए हुए हैं जैसा कि मेरी दादी मुझे जेठ की गर्मी में दिखाया करती थी। उस बवंडर में जिस तरह से कागज के टुकड़े और तिनके लिपटे रहते थे, उसी तरह इस गाने ने भी कई फर्श पर अनदेखे पड़े खयालात को झिंझोड़ कर उठ खड़े होने पर मजबूर कर दिया है। आ अब लौट चलें तुझको पुकारे देस तेराÓ की हूक घुमड़-घुमड़ कर दिल में उठ रही है। कुछ साल पहले मैं गांव गया था। अपना खेत-खलिहान, अपनी नहर, बड़े से आंगन वाला मकान और उसमें बना बैल घर, जिसके साथ में सटी हुई दो गायों की गौशाला को छोड़े हमारी कम से कम तीन पुश्तें गुजर चुकी हैं। पड़बाबा छोटे-मोटे जमींदार थे और उन्होंने बच्चों को शिक्षा के लिए शहर भेजा था। बच्चे ऐसा शहर गए कि लौट के ही न आए। गांव के घर की पगडंडी उनके इंतजार में ऐसी सूखी कि अब उसका मलबा ही घर के खंडहर तक जाने का पता देता है। पर जब एक बार असाइनमेंट के सिलसिले में उस इलाके में जाना हुआ, तो गांव जाने का मन हो गया था। गांव मैं पहुंच तो गया, पर किसके पास जाता? अपने आने की खबर जिले के पुलिस कप्तान के जरिए ग्राम प्रधान तक पहले ही पहुंचवा दी थी, सो कई लोग पंचायत घर में जमा हो गए थे। वे मेरे आने को कोई सरकारी दौरा समझ कर स्वागत के लिए तैयार थे। मैं अपने गांव को पहचान नहीं पाया था। ड्राइवर ने बताया कि हम पहुंच गए हैं। बचपन से लेकर इस उम्र तक की दूरी इतनी लंबी थी कि बीच के रास्ते के सभी स्मृतिचिह्न मिट गए थे। मैं गांव के लिए अजनबी था और गांव मुझसे अनजान था। ग्राम प्रधान ने सारा इलाका घुमाया। कहीं दूर याद में एक पोखरिया उभरी। प्रधान से पूछा उसके बारे में। उसने सिर खुजलाया और फिर मेरी जिज्ञासा शांत करने के लिए बुजुर्गो से पूछा। हां, कभी थी, उन्होंने बताया। जमाना हो गया उसे सूखे हुए। रेत का मैदान है अब वहां। और नहर? है, मगर गांव की दलबंदी ने उसे इतने घाव दे दिए हैं कि उसका पानी उतर चुका है। कुओं का भी। गांव की नालियां ही सिर्फ भरी हुई हैं, बाकी सब सून है। अपने गांव में घूमते हुए कई खयाल घुमडऩे लगे। मैंने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ पानी, स्वच्छता, स्वास्थ, शिक्षा आदि पर दर्जनों गोष्ठियां और प्रोजेक्ट किए हैं। बेहतरीन प्रेजेंटेशन देखे हैं और सारगर्भित विचारों पर चिंतन किया है। मैंने अपने से पूछा, मैं अपने से पराए हुए गांव से अंतरंग संबंध पुन: स्थापित क्यों नहीं कर लेता? मैंने और पड़ताल करनी शुरू कर दी। सब हालात सुन कर लगा गांव एक बड़ी चुनौती है। बहुत कुछ अपने पर लेना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में, अपनी जिम्मेदारी खुद ही निभानी पड़ेगी। शहर में तो मैं लगभग सब कुछ सरकार से लेकर हाउसिंग सोसाइटी के पदाधिकारियों पर डाल कर उन्हें कोस लेता हूं और फिर अपने हाथ झाड़ कर खड़ा हो जाता हंू। पर गांव में ऐसा नहीं कर पाऊंगा। पोखर में फिर से पानी लाना या स्कूल को नया रूप देना लंबा काम है, जिसमें हर रोज मेहनत करनी होगी। इसमें प्रेजेंटेशन और डिस्कशन से काम नहीं चलेगा, हाथ में फावड़ा और कुदाल लेकर जुटना पड़ेगा। मैं डर गया। अपने आप से बहाना किया और शहर भाग आया। वास्तव में चुनौतियों के डर से हम शहर में आकर छिप जाते हैं। रोटी का बहाना बनाते हैं और उस चूहे की तरह बन जाते हैं, जिसे रोटी तो दिखती है, पर पिंजरा नहीं दीखता, जिसमें रोटी रखी हुई है। रोटी पर जल्दी से झपट्टा मारने के चक्कर में हम पिंजरे में कैद हो जाते हैं। और फिर छटपटाते रहते हैं। मैं गांव के परिश्रम से भागा हुआ अभागा हूं। वहां की चुनौतियों के सामने पुरुषार्थ करने से मैं कन्नी काट आया हूं। सरलीकरण का शहरी बन गया हूं। धूप से बच कर कृत्रिम ठंडक में दुबक गया हूं। बाहें पसारे तुझको पुकारे देस तेराÓ की पुकार हूक जरूर मरती है, पर मैं फौरन ही उसका वॉल्यूम शून्य पर कर के अपने को ट्रैफिक की चिंघाड़ में डुबा देता हूं। मेरा गांव मेरे पुरुषार्थ के लिए तरसता रहेगा। मैं भूत हो गया हूं, इसीलिए मेरे गांव का कोई भविष्य नहीं है। मेरे मन के बवंडर में वास्तव में कोई घास नहीं है। -अश्विनी भटनागर
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