लाल आतंक
21-Feb-2019 06:32 AM 1237647
गढ़चिरौली में पिछले एक पखवाड़े में माओवादियों ने आठ आदिवासियों की गोली मारकर हत्या कर दी। माओवादियों को उन पर पुलिस का मुखबिर होने का संदेह था। यह बीते एक दशक में माओवादी हिंसा में आम नागरिकों की मौत का सबसे ज्यादा आंकड़ा है। साल 2018 में माओवादी हिंसा का उभार कुछ हद तक शांत पड़ गया था, जब महाराष्ट्र पुलिस ने अपने किसी जवान के शहीद हुए बिना 50 माओवादियों को मार डाला था। बीती 21 जनवरी को तीन ग्रामीणों—भामरागढ़ तहसील के कसनासुर गांव के मल्लू मडावी, कन्नू मडावी और लालसू कुदयेती—की गोली मारकर हत्या कर दी गई। माओवादियों का मानना था कि इन लोगों की मुखबिरी की वजह से ही पुलिस पिछले साल 23 अप्रैल को 40 माओवादियों को घात लगाकर मारने में कामयाब हुई थी। 21 जनवरी को माओवादियों ने दो अन्य पुलिस मुखबिरों की भी हत्या कर दी थी। 2 फरवरी को मरकेगांव में दो और 7 फरवरी को एक आदिवासी ग्रामीण की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह वही गांव है, जहां साल 2009 में तीन अलग-अलग घटनाओं में माओवादियों ने 48 पुलिसकर्मियों को मार डाला था। माओवादियों ने इन सबके पास एक पर्चा छोड़ा जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि ये सब पुलिस के मुखबिर हैं। एक शव को एक बैनर में लपेटकर रखा गया था जिसमें यह लिखा गया था कि मृतक को उसके कृत्य के लिए मृत्युदंड दिया गया है। इस पर्चे में केंद्र सरकार की ओर से गढ़चिरौली में बुनियादी ढांचा विकास के लिए हो रहे कार्यों का विरोध करने के लिए 31 जनवरी को हड़ताल करने का भी आह्वान किया गया। हालिया कुछ अन्य घटनाओं से भी संकेत मिले थे कि इलाके में माओवादियों की उपस्थिति बढ़ रही है। माओवादियों ने जनवरी में आठ ग्रामीणों का अपहरण कर लिया था और उन्हें पुलिस की मुखबिरी के लिए सजा देने की धमकी दी गई थी। इन ग्रामीणों की अब तक कोई खबर नहीं है। कसनासुर में माओवादियों ने 3 करोड़ रु. मूल्य के निर्माण वाहनों को जला डाला। पिछले साल अक्टूबर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने माओवादियों के नेता गणपति को हटाकर उसकी जगह बसवराजू को लाने का निर्णय लिया। तब से ये हत्याएं बढ़ी हैं। सुरक्षा अधिकारियों को लगता है कि बसवराजू की धमक को दिखाने के लिए ही ये हत्याएं की गई हैं। गढ़चिरौली के एसपी शैलेश बलकवडे ने बताया कि जिन ग्रामीणों की हत्या की गई है, वे पुलिस मुखबिर नहीं थे। उन्होंने कहा कि अगर कोई मुखबिर माओवादी हिंसा में मारा जाता है, तो पुलिस उससे अपने संबंधों को स्वीकार करती है, क्योंकि उनके परिवारों को मुआवजा देने की सरकारी योजना है। बलकवडे ने दावा किया कि साल 2018 में उन्हें बार-बार मिली विफलता और घातक पुलिस कार्रवाइयों से माओवादी बौखला गए हैं, इसलिए वे अंधाधुंध हत्याएं कर रहे हैं। मुंबई से करीब 100 किमी दूरी पर स्थित पालघर में पिछले महीने माओवादी लड़ाकों ने एक बैनर लगाकर घोषणा कर दी कि यह माओवादी इलाका है, जिसे भारत सरकार से मुक्त करा लिया गया है। महाराष्ट्र सरकार ने कथित माओवादी समर्थकों पर कार्रवाई के तौर पर 2 फरवरी को गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट के प्रोफेसर और मानवाधिकार कार्यकर्ता आनंद तेलतुम्बडे को गिरफ्तार कर लिया। उन पर एल्गार परिषद को चंदा देने का आरोप है जिसने कथित रूप से 1 जनवरी, 2018 को कोरेगांव-भीमा में हिंसा भड़काई थी। तेलतुम्बडे के रिश्तेदार और भारिप बहुजन महासंघ के नेता प्रकाश आंबेडकर ने सरकार पर बदले की राजनीति करने का आरोप लगाया है। वहीं, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने माओवादियों को जड़ से खत्म करने की बात कही है। पिछले एक दशक में गढ़चिरौली में करीब 700 माओवादी मारे गए हैं और 2015 के बाद करीब 180 ने समर्पण किया है। पुलिस के मुताबिक, ताजा मुठभेड़ में भामरगढ़ तालुका के माओवादियों के दो दलम (10-15 हथियारबंद माओवादियों का गुट) का सफाया हो गया है। 2015 में भी पुलिस ने इसी तरह सिरोंचा तालुके के दो दलम का सफाया कर दिया था। गढ़चिरौली शायद पिछले कुछ साल के एक रुझान को ही दर्शा रहा है कि माओवादी अब हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं और उनके इलाके तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं। 15 अप्रैल को केंद्रीय गृहमंत्रालय ने अति वाम उग्रवाद से भीषण रूप से ग्रस्त 126 जिलों की फेहरिस्त में से 44 जिलों को अलग कर दिया। 200 सक्रिय नक्सली गढ़चिरौली में करीब 200 सक्रिय माओवादी बताए जाते हैं। उसके अलावा भंडारा और चंद्रपुर अभी भी अति वामपंथ से ग्रस्त जिलों की फेहरिस्त में हैं। गढ़चिरौली में समस्या सबसे गंभीर है क्योंकि यह सबसे अविकसित जिलों में एक है। घने जंगलों और कम आबादी वाला यह जिला पड़ोस के राज्यों तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के जिलों को मिलाकर लाल गलियारे का हिस्सा है। खुली सीमा की वजह से माओवादी आसानी से तीनों राज्यों की पहाडिय़ों और घने जंगलों में आवाजाही करते रहे हैं, लेकिन लगता है, अब यह उतना आसान नहीं रहेगा। इन दो मुठभेड़ों ने सी-60 बल और उसके भेदियों के नेटवर्क की प्रतिष्ठा कायम कर दी है। महाराष्ट्र पुलिस के मुताबिक, इससे भी बड़ी चुनौती शहरी इलाकों में माओवादी विचारधारा के प्रसार पर रोक लगाना है। सेना की पूर्व अधिकारी और मुंबई स्थित एनजीओ फोरम फॉर इंटीग्रेटेड नेशनल सिक्योरिटी की अध्येता स्मिता गायकवाड़ कहती हैं कि शहरी माओवादी राज्य की सत्ता को चुनौती देने के लिए जातियों के बीच मतभेदों को अपना औजार बना रहे हैं। -बिन्दु माथुर
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