22-Dec-2018 08:36 AM
1234820
मुंबई के एक समारोह में शिवसेना पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस दोनों ही मेहमान थे और मेजबान था विदर्भ का बंजारा समाज। दोनों ने ही इस कार्यक्रम में हंसते-खेलते बंजारा समाज का पारंपरिक वाद्य ढोल बजाया, तो लोगों ने इसे शिवसेना-बीजेपी के बीच टकराव के बादल छंटने और आगामी चुनाव में युति की मुनादी मान लिया। वहीं दूसरी तरफ एनसीपी प्रमुख शरद पवार, नारायण राणे से मिलने उनके कणकवली में स्थित ओम-गणेश बंगले पर पहुंचे, तो राणे और एनसीपी की नई पारी के श्रीगणेश के चर्चे शुरू हो गए।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, शिवसेना-बीजेपी भी एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं। हाल तक शिवसेना अपनी दम पर अकेले चुनाव लडऩे का दंभ भर रही थी, लेकिन जब से बीजेपी ने शिवसेना को पुचकारना, दुलारना शुरू किया है शिवसेना की गुर्राहट भी घटने लगी है। बीजेपी सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से और अपने मुखपत्र के जरिए तीखी टिप्पणी करने वाले उद्धव ठाकरे द्वारा मुख्यमंत्री के साथ कार्यक्रमों में आने जाने से यह लगने लगा है कि शिवसेना का मतपरिवर्तन हो रहा है और वह आगामी चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर लडऩे की भूमिका बनाने लगी है। उद्धव की हाल की अयोध्या यात्रा के बाद भी यही कयास लगाए जा रहे है कि आखिर हिंदुत्व के मुद्दे पर दोनों भगवा पार्टियां एक मंच पर आएंगी। शिवसेना को दुलारने के लिए बीजेपी ने नाणार परियोजना के लिए भूमि का अधिग्रहण रोक दिया है। इतना ही नहीं चार साल से खाली पड़ा विधानसभा उपाध्यक्ष का पद भी शिवसेना की झोली में डाल दिया है। उद्धव और सीएम के बीच बढ़ती नजदीकियों का एक नजारा उस समय भी देखने को मिला जब ढोल बजाने वाले कार्यक्रम में जाते वक्त सीएम ने अपने प्रोटोकॉल को तोड़ते हुए अपना लावा-लश्कर पीछे छोड़ उद्धव की बुलेट प्रूफ गाड़ी में उद्धव के साथ सफर किया।
शिवसेना बीजेपी के बीच 2014 के विधानसभा चुनावों के बाद कटुता अपने चरम पर पहुंच गई थी। विधानसभा के सदन को लेकर सड़क तक चाहे किसानों की कर्ज माफी का मुद्दा हो या फिर नाणार रिफाइनरी का मुद्दा हो, पेट्रोल डीजल की कीमतों का मुद्दा हो शिवसेना ने हर मौके पर बीजेपी सरकार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की आलोचना का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया। शिवसेना के मंत्रियों ने तो इस्तीफे जेब में लेकर घूमने का ऐलान तक कर दिया था।
मौजूदा रुझानों के मुताबिक महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ ही होने के प्रबल आसार हैं। ऐसे में शिवसेना को लग रहा है कि इस स्थिति में वह बीजेपी से ज्यादा बेहतर ढंग से सौदेबाजी कर पाएगी। क्योंकि बीजेपी के लिए महाराष्ट्र से ज्यादा देश की सत्ता जरूरी है। यही वजह है कि शिवसेना के तीखे तेवरों के बावजूद बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की सलाह पर राज्य के नेता हमेशा शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लडऩे की बात करते रहे हैं। इन नेताओं में सबसे आगे फडणवीस ही रहे हैं। पालघर में लोकसभा के उप चुनावों में बीजेपी को इस बात का अंदाजा आ गया है कि अगर शिवसेना से युति नहीं हुई, तो उसे विपक्ष के साथ-साथ शिवसेना से भी टकराना होगा, जो उसके लिए कहीं से भी फायदेमंद नहीं होगा। बीजेपी नेता व्यक्तिगत बातचीत में यह मानते हैं कि अकेले लडऩे से शिवसेना को फायदा नहीं होगा, लेकिन बीजेपी को ज्यादा नुकसान होगा। दूसरे आज भी ग्रामीण हिस्सों में बीजेपी का उतना आधार नहीं है, जितना कांग्रेस-एनसीपी या शिवसेना का है।
नारायण राणे इस समय राज्यसभा में सांसद हैं। बीजेपी की मदद से ही वह राज्यसभा का चुनाव जीते हैं। माना जा रहा था कि आगामी चुनाव में कोकण में अपना आधार मजबूत करने के लिए बीजेपी ने राणे को अपने साथ लेने के लिए यह दांव खेला है। लेकिन यदि शिवसेना-बीजेपी गठबंधन होता है, तो राणे के बिना ही होगा। शिवसेना इसी मुद्दे पर अड़ सकती है। वहीं दूसरी तरफ राणे भी कह चुके हैं कि अगर शिवसेना साथ होगी, तो वह बीजेपी के साथ नहीं होंगे। इसी के मद्देनजर राणे और पवार की मुलाकात को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्योंकि यह मुलाकात शिवसेना-बीजेपी के बीच बढ़ती नजदीकियों की पृष्ठभूमि में हुई है। बीजेपी के खिलाफ विपक्षी नेताओं को एकजुट करने में लगे शरद पवार खुद चलकर राणे से मिलने उनके कणकवली गए। राजनीतिक जानकार इसे सामान्य घटना नहीं मानते।
दोनों को है स्थिति का अंदाज
राजनीति के जानकार कहते हैं कि दोनों को ही अपनी स्थिति का अंदाजा है। बीजेपी को अंदाजा है कि अब 2014 वाली मोदी लहर नहीं है, इसलिए शिवसेना को साथ लिए बिना चुनावी अनुष्ठान में उसका उद्धार नहीं हो सकेगा। वहीं शिवसेना को इस बात का अंदाजा है कि भले ही मोदी लहर का असर खत्म हो गया है, लेकिन मोदी का जादू अब भी बरकरार है। दूसरे बीजेपी के खिलाफ विपक्षी मोर्चे की सक्रियता में शिवसेना को अपने लिए कोई जगह दिखाई नहीं दे रही। हालांकि शुरुआत में इस दिशा में थोड़ी सी कोशिश हुई थी, लेकिन शिवसेना के शामिल करने को लेकर विपक्षी मोर्चा ही बिखर सकता है, इस बात का अंदाजा आते ही इन कोशिशों को तिलांजलि दे दी गई। हालांकि कुछ नेताओं का कहना है कि दोनों के बीच पहले दिन से ही अंडरस्टैंडिंग है। विरोध तो बस दिखावा था।
-बिन्दु माथुर