02-Jan-2016 08:26 AM
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जलवायु परिवर्तन को लेकर हुआ पैरिस समझौता कोई बहुत उम्मीद भले न जगाता हो, पर इसके तहत ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे और इसके समाधान को लेकर बनी विश्वव्यापी सहमति खुद में एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। अभी तक तो कई

वैश्विक सम्मेलनों के बावजूद यही तय नहीं हो पा रहा था कि इस तरह का कोई संकट वाकई दुनिया के सामने है भी या नहीं।विकसित देश अपनी दलीलें देते थे तो विकासशील देश अपनी। इन दोनों से अलग ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री और तेल उद्योग से जुड़े थिंक टैंक यह साबित करने में लगे रहते थे कि ग्लोबल वॉर्मिंग एक कागजी बाघ है। अपने-अपने आंकड़ों के जरिए हर कोई बताना चाहता था कि भरसक तो ऐसा कोई संकट है ही नहीं, और अगर हो भी तो इसके लिए वह नहीं, कोई दूसरा जिम्मेदार है। पैरिस में यह बात साफ हो गई कि आगे की बहस कार्बन उत्सर्जन की मात्रा और उसे रोकने पर ही केंद्रित रहेगी। भारत की अगुआई में विकासशील देशों की यह बात मानी गई कि विकसित देश सिर्फ नसीहत देकर निकल नहीं सकते, अगर उन्हें पृथ्वी की चिंता है तो इसे बचाने का बोझ भी उन्हें बाकी मुल्कों से ज्यादा उठाना होगा।
पेरिस में जलवायु संकट से निपटने को लेकर एक मंजिल और उस तक पहुंचने का सड़क मार्ग ही तय किया गया है। लेकिन फिलहाल जो तस्वीर दिख रही है, उसमें उस मंजिल तक पहुंचना लगभग नामुमकिन है। खासतौर पर भारत के लिए। हालांकि इस सम्मेलन के हासिल यानी पेरिस समझौतेÓ से फिलहाल पूरा विश्व प्रफुल्लित दिख रहा है। हो भी क्यों नहीं, आखिर एक ऐतिहासिक समझौते को कलमबद्ध जो किया गया है। ऐतिहासिक इस मायने में कि ऐसा बार-बार नहीं होता है और न ही होगा कि किसी एक मसविदे पर विश्व के 196 देश एक साथ खड़े दिखें। जाहिर है, जिस मसले पर अब तक अलग-अलग देशों के बीच अपनी जरूरतों के मद्देनजर तीखे टकराव रहे हों, एक-दूसरे को आईना दिखाने की होड़ रही हो, ऐसी हालत में इस बार की यह उपलब्धि अपने आप में ऐतिहासिक है। और इसलिए इस पर मनाए जा रहे जश्न को वाजिब कहा जा सकता है। इस सहमति से यह समझा जा सकता है कि इन तमाम देशों को अब संकट की भयावहता का अहसास है और शायद ये सभी आने वाले जटिल हालात का अनुमान भी लगा पा रहे हैं। यों, यह संकट अगर ऐसे ही बढ़ता गया तो बाकी पारिस्थितिकी तंत्र में भयावह उठा-पटक तो तय है, अपने आसपास भी प्रदूषण के कारण अगले पांच साल में विश्व में विनाश की आहट सहज ही सुनाई देगी और फिर उसका कहर बरपना भी महज वक्त की बात होगी। देश इस बात पर खुश है कि जिस सतत जीवनशैली और जलवायु इंसाफÓ का जिक्र मसविदे में चाहिए था, वह तो उसकी प्रस्तावना में ही है। लेकिन क्या इतना काफी है? एक लंबे अरसे में तय हुई जीवनशैली के आलोक में जलवायु के मामले में एक न्यायोचित और संतुलित व्यवस्था के लिए जोखिम उठाने को देश कितना तैयार है, यह देखने की बात होगी। सही है कि इस मसविदे में विकसित और विकासशील के फर्क का ध्यान रखा गया है और इस संकट से निपटने के लिए वित्तीय मदद का भी इंतजाम किया गया है। लेकिन विकसित देशों का अब तक का रिकार्ड देखते हुए यह समझना मुश्किल नहीं है कि इस व्यवस्था को व्यवहार में जमीन पर उतारना कितनी बड़ी चुनौती होगी। कहने को मसविदे में विकासशील देशों की मदद की खातिर इस मकसद को हासिल करने के लिए हर साल सौ अरब डॉलर की सहायता का संकल्प लिया गया है। लेकिन इस संकल्प को कितना अमल में लाया जा सकेगा, इस अभियान की सफलता इसी पर निर्भर करेगी, क्योंकि विकासशील देशों को बिना इसके कुछ हासिल नहीं होने वाला। जाहिर है, लक्ष्य आसान नहीं।
समझौते से बचेगी दुनिया?
सवाल है कि पेरिस समझौतेÓ का मकसद हासिल करना वैसी हालत में कैसे मुमकिन होगा कि एक ओर अमेरिका अपने यहां पेट्रोलियम और कोयले की खपत पर रोक लगाने की मांग या शर्त स्वीकार नहीं करे और दूसरी ओर भारत जैसे देशों में भी इनके इस्तेमाल पर लगाम लगाने के बजाय इसमें और बढ़ोतरी ही होती जाए! अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि जब भारत और चीन के साथ खड़े विकासशील और गरीब देशों ने कार्बन उत्सर्जन और जलवायु संकट के मसले पर ऐतिहासिक जिम्मेदारी की बात उठाई तो अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने बीच में ही बातचीत के बहिष्कार तक की धमकी दे डाली। हालत यह पैदा हो गई कि कार्बन के र्इंधन का इस्तेमाल कम करने के आग्रह के कारण भारत को एक अवरोधक देशÓ के तमगे से नवाज
दिया गया।
-विशाल गर्ग