नेचुरल टाइगर सफारी है केरवा का जंगल
17-Nov-2015 09:33 AM 1237843

भोपाल के कलियासोत और केरवा के आसपास बाघ टी-1 को लेकर कोहराम मचा हुआ है। इस बाघ को पकडऩे के लिए वन विभाग ने अभियान चला रखा है। उधर वन विभाग की इस कार्यवाही का विरोध भी होने लगा है। वन्यप्राणी विशेषज्ञ और सामाजिक संस्थाओं द्वारा कहा जा रहा है कि बाघ अपने क्षेत्र में घूम रहा है। अत: इस क्षेत्र से लोगों को बेदखल किया जाए। न कि बाघ को यहां से बाहर निकाला जाए। यही नहीं केरवा के जंगल को  नेचुरल टाइगर सफारी के लिए मुफीद मानते हुए इसे वन विहार नेशनल पार्क पार्ट-टू बनाने की मांग फिर से उठने लगी है। वन्यप्राणी प्रेमी और विशेषज्ञ दोनों ही इस पक्ष में हैं। वे कहते हैं कि बांधवगढ़ एवं पेंच टाइगर रिजर्व के बफर जोन में सफारी पर करोड़ों खर्च करने के बजाय केरवा पर ध्यान दिया जाए, तो राजधानी में अच्छा जंगल बचाया जा सकता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि केरवा बाघ का नेचुरल हेवीटेट (प्राकृतिक आवास) है। इसलिए यहां टाइगर सफारी बेहतर तरीके से विकसित हो सकती है। राजधानी में सफारी बनने से यहां विदेशी पर्यटन बढ़ेगा, व्यापार में भी वृद्घि होगी। वहीं, राज्य के टाइगर रिजर्व में पर्यटकों का दबाव कम करने में मदद मिलेगी। वे कहते हैं कि लाख कोशिशों के बाद भी इस क्षेत्र के बाघ को नहीं हटाया जा सकता है। एक हटेगा, तो दूसरा बाघ कुछ महीनों में ही यहां पहुंच जाएगा। इसे लेकर वन अधिकारी भी तनाव में हैं। क्षेत्र के पुराने लोग बताते हैं कि बाघ यहां सदियों से रहा है। शायद इसीलिए वर्ष 2010 में वन विहार पार्ट-2 का प्रस्ताव लाया गया। वन विभाग ने मेंडोरा-केरवा के जंगल को इंटरनेशनल-जू के रूप में विकसित करने की कोशिश की। ईको टूरिज्म विकास बोर्ड ने सिंगापुर-जू से विशेषज्ञों को बुलाकर जंगल दिखाया। उन्होंने केरवा नदी के पश्चिमी भाग को चिडिय़ाघर के रूप में विकसित करने की सलाह दी थी। उन्होंने 200 हेक्टेयर का जू विकसित करने पर प्रति हेक्टेयर 1.50 करोड़ रुपए खर्च बताया था। जिसे पीपीपी मोड पर तैयार करने पर भी चर्चा हुई, लेकिन बाद में प्रस्ताव दबा दिया। ऐसे ही केरवा को कंजर्वेशल रिजर्व इकाई घोषित करने का प्रस्ताव वर्ष 2012 में तत्कालीन सीसीएफ भोपाल वृत्त ने शासन को भेजा था। उन्होंने बाघ-बाघिन के बढ़ते मूवमेंट को लेकर यह प्रस्ताव तैयार किया था। इस प्रस्ताव को भी ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। सोसायटी फॉर ग्रीन एन्वार्मेंट के सचिव एमएल तिवारी और अर्थ सामाजिक संस्था के आदित्य दुबे ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मांग की है कि केरवा को वन विहार पार्ट-2 या संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए। उन्होंने बताया कि क्षेत्र में 10 बाघ घूम रहे हैं। ऐसे में यह जंगल बेहतर सफारी साबित हो सकता है। उन्होंने उम्मीद जताई है कि श्री चौहान खुद पर्यावरण प्रेमी है। इसलिए लोगों की भावना की कद्र करते हुए इस दिशा में निर्णय लेंगे। इसे लेकर दोनों संस्थाएं जल्द ही हस्ताक्षर अभियान भी शुरू कर रही हैं।

रातापानी को टाइगर रिजर्व बनाने की पहल
राजधानी से सटे रातापानी अभयारण्य को टाइगर रिजर्व बनाने के मामले में केंद्र सरकार के आग्रह के बाद भी राज्य सरकार फिलहाल रजामंद नहीं है। वजह रातापानी की सरहद में आ रहे रसूखदारों के इलाके,यहां के गांव,व्यवसायिक गतिविधियां और कीमती जमीनें मानी जा रही हैं। यही वजह है कि तीन साल पुरानी पहल अभी भी ठिठकी हुई है। वन विभाग ने इसे विचाराधीन विषय करार दिया है। रातापानी के जंगलों को टाइगर रिजर्व बनाने में अड़चनें सरकार से सीधी जुड़ी हुई हैं,क्योंकि यहां कई नेताओं का प्रभाव क्षेत्र है। इसे टाइगर रिजर्व घोषित करने का मतलब होगा,यहां के लगभग बत्तीस गांवों का विस्थापन । इस इलाके में बड़ी आबादी दशकों से बसी हुई है,इसके अलावा यहां कई व्यवसायिक गतिविधियां,खदानें,खेती आदि चल रही हैं। यह सभी तबके टाइगर रिजर्व के पक्ष में नहीं हैं,क्योंकि ऐसा होने से कई गतिविधियां प्रतिबंधित हो जाएंगी। भोपाल के रसूखदारों की जमीनें भी इसी इलाके में हैं। रातापानी में बाघों की संख्या में वृध्दि व भोपाल में दस्तक से दबाव में आया वन विभाग सरकार का रुख देखकर चुप है। एनटीसीए इसे अधिसूचित करने का दबाव बना रहा है। माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री इस मामले में केंद्रीय वन मंत्री से बात करेंगे। प्रस्तावित रातापानी टाइगर रिजर्व को लेकर एपीसीसीएफ(वाइल्ड लाइफ)शाहबाज अहमद का कहना है कि गांवों के विस्थापन में कई मुश्किलें आएंगी क्षेत्र को अधिसूचित करने पर फिलहाल कोई निर्णय नहीं हुआ है,यह मामला विचाराधीन है। वहीं पीसीसीएफ नरेंद्र कुमार भी विस्थापन संबंधी परेशानी बताते हुए कह रहे हैं कि विभाग वहां बाघों के संरक्षण के लिए बेहतर काम कर रहा है। 823.84 वर्ग किमी क्षेत्र वाला रातापानी अभयारण्य। काफी समय से बाघों का बसेरा रहा है। यहां तेंदुए,चीतल,हिरन व कई अन्य जंगली जानवर काफी संख्या में हैं। आठ से दस बाघों की मौजूदगी का दावा किया जा रहा है। वर्ष 2014 में हाईकोर्ट में एक याचिका के जवाब में सरकार ने कहा था कि रातापानी को टाईगर रिजर्व बनाने कई गांवों का विस्थापन करना होगा।
-ज्योत्सना अनूप यादव

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