18-Jun-2015 08:18 AM
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देश में मानसून लेट हो चुका है। केरल में पांच दिल लेट पहुंचा और बाकी हिस्सों में 10 दिन लेट होने की आशंका है उधर मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी दी है कि इस बार कुल जमा 88 प्रतिशत

बारिश होगी ऐसे में भयानक गर्मी से जूूझ रहे भारत में किसानों की चिंता मानसून की बेरुखी ने बढ़ा दी है। अल नीनो के आतंक का असर पहले से ही लोगों को भय में डाल रहा है। वर्ष 1997 में भी यह फेक्टर भारत में मानसून की चाल बिगाड़ गया। इस वर्ष खतरा कुछ ज्यादा महसूस हो रहा है क्योंकि देश भर में भयानक गर्मी पड़ी है 2000 से अधिक लोग मारे गए हैं। जिनमें 1500 तो केवल आंध्रप्रदेश में मारे गए हैं। भारी गर्मी के बाद मानसून अच्छा आने की संभावना रहती है, लेकिन कमजोर मानसून के पूर्वानुमान ने सारा गणित गड़बड़ा दिया है।
देश में 60 प्रतिशत कृषि अभी भी मानसून पर निर्भर है। वर्ष 2009 में मानसून ने भारतीय कृषि पर गहरा असर डाला था। जिसके चलते देश को सूखे का सामना करना पड़ा। वैसे सरकार ने मानसून को लेकर चिंता न करने की बात कही है लेकिन किसानों की बढ़ती आत्महत्या कुछ और ही कहानी कह रही है। पिछले 50 वर्षों में देश में औसतन 89 सेंटीमीटर बारिश हुई है। जो अनुमान के आसपास ही रहती है। इस बार बीच में अचानक उठे समुद्री तूफानी असोबा ने मानसून की नमी खींच ली जिससे तापमान अचानक बढ़ गया। मध्यप्रदेश में असाढ़ का महीना भी तपते हुए बीत रहा है। किसान इसे अच्छा संकेत नहीं मानते। असाढ़ में औसत से अधिक गर्मी पड़े तो किसान का चिंतित होना स्वाभाविक है हालांकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चिंता की बात खारिज कर दी है। जेटली का कहना है कि उत्तर पूर्व में मानसून कम आने का प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर नहीं पड़ेगा। लेकिन भीतर ही भीतर सरकार चिंतित है। शेयर मार्केट भी नीचे जा रहा है। मोदी सरकार 7 प्रतिशत की विकास लक्ष्य पाना चाहती है। मानसून विकास की रफ्तार को धीमा कर सकता है। उधर मानसून पर चिंतित किसानों को साहूकार से लिए गए कर्जों की चिंता होने लगी है। यदि अल नीनो का असर इस बार भी पढ़ा तो खरीफ की फसल चौपट हो जाएगी। बिजली महंगी होने के कारण सिंचाई सुविधाएं खेती की लगात बढ़ा रही है।
सरकार का कहना है कि साल भर में 55 दिन की बारिश पर्याप्त है। किसान घबराया हुआ है। हालांकि मौसम की भविष्यवाणी करने वाली निजी कंपनी स्काईमेट का कहना है कि मानसून सामान्य रहेगा। इस कंपनी ने बताया कि मानसून कमजोर नहीं रहेगा। अल नीनो वाले 60 प्रतिशत वर्ष सूखे होते हैं। इस लिहाज से सूखे वाले सभी वर्ष अल नीनो के प्रभाव वाले साल रहे हैं। लेकिन इस वर्ष को उन बाकी 40 प्रतिशत को शामिल किया जा सकता है। स्काईमेट ने फरवरी में अनुमान लगाया था कि दीर्घावधि की बारिश सौ से 104 प्रतिशत रहेगी। यह अनुमान गलत नहीं कहा जा सकता। प्राय: हर माह में बारिश हो रही है, लेकिन असमय की बारिश भी किसानों के लिए घाटे का सौदा सिद्ध होती है। बाढ़ और ओले से उनकी फसल चौपट हो जाती है। मुआवजा समय पर नहीं मिलने से किसानों में निराशा लगातार बढ़ रही है। इसीलिए सरकार भी मानसून पर नजर रखे हुए है।
कीमतें बढ़ी
मानसून की कमी की आहट के चलते कीमतें बढ़ी हैं। दलहन के दाम तेजी से ऊपर जा रहे है। यही हाल अन्य अनाजों का है। जमाखोरी भी बढ़ रही है। उद्योगजगत सहम गया है। निवेशकों को मालूम है कि समय पर मानसून नहीं आने से सिर्फ खेती को ही नुकसान नहीं पहुंचता, बल्कि यह ऑटो, इलेक्ट्रॉनिक्स, कृषि उपकरणों के अलावा साबुन-शैंपू जैसे रोजमर्रा की चीजें बनाने वाले उद्योगों की बिक्री भी घटा देता है।
रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के मुताबिक लगातार दो वर्षो तक मानसून का सामान्य से कम होना ग्रामीण मांग को बहुत हद तक धवस्त कर सकता है। ऑटो उद्योग - दोपहिया वाहनों की बिक्री पिछले सात महीनों से लगातार घट रही है। ऑटो उद्योग के संगठन सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्यूफैक्चरर्स (सियाम) का कहना है कि 30 फीसद दोपहिया वाहनों का बाजार ग्रामीण क्षेत्रों में है। तेजी से बढ़ रहा यह बाजार मानसून से बहुत प्रभावित होता है। पिछले वर्ष खराब खरीफ उत्पादन के बाद से ही बाइकों की बिक्री में कमी का दौर शुरू हुआ है, जो इस वर्ष मई तक जारी है।
-राजेश बोरकर