05-Jun-2015 08:51 AM
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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन, मंगोलिया, कोरिया की यात्रा करके लौट आए। 14-19 मई के बीच संपन्न इस यात्रा के दौरान चीन में प्रधानमंत्री की मौजूदगी को व्यापार और राजनीति की दृष्टि

से तो खूब जांचा परखा गया किंतु जलवायु परिवर्तन पर दोनों देशों के बीच जो महत्वपूर्ण वार्तालाप और समझौते हुए हैं, उन्हेंं नजरअंदाज कर दिया गया। जून माह में विश्व पर्यावरण दिवस है। ऐसी स्थिति में भारत और चीन के बीच वैश्विक पर्यावरण तथा जलवायु परिवर्तन को लेकर जो पहल की गई, उसे वर्तमान समय में बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
भारत तथा चीन में विश्व की पौने तीन अरब के करीब जनसंख्या निवास करती है। इसी कारण पर्यावरण जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के सरोकार सारी दुनिया को प्रभावित करते हैं। प्रधानमंत्री के चीन दौरे में जो पर्यावरण संबंधी बातचीत हुई उसमें भारत सरकार और चीन जनवादी गणराज्य की सरकार ने स्वीकार किया है कि जलवायु परिवर्तन और उसके विपरीत प्रभाव मानवता के लिए समान चिंता का विषय हैं और 21वीं सदी की विशाल वैश्विक चुनौतियों में से एक हैं, जिसका समाधान स्थायी विकास के संदर्भ में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से किया जाना चाहिए। दोनों पक्षों ने वर्ष 2009 में भारत सरकार और चीन जनवादी गणराज्य की सरकार के बीच जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने में सहयोग पर हुए समझौते तथा वर्ष 2010 में भारत सरकार और चीन जनवादी गणराज्य की सरकार के बीच हरित प्रौद्योगिकियों संबंधी समझौता ज्ञापन पर हुए हस्ताक्षर का स्मरण किया। उन्होंने इस संयुक्त वक्तव्य और समझौता ज्ञापन साथ ही साथ समझौते के कार्यान्वयन के जरिये जलवायु परिवर्तन पर आपसी भागीदारी और बढ़ावा देने और अपने समग्र सामरिक सहयोग में इस भागीदारी की भूमिका बढ़ाने का फैसला किया।
भारत और चीन ने इस बात पर जोर दिया कि संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन संबंधी संधि के प्रारुप (यूएनएफसीसीसी) और उसके क्योटो प्रोटोकॉल जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के सबसे उपयुक्त प्रारुप हैं। उन्होंने निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों को दोहराया, लेकिन उत्तरदायित्वों को अलग रखा और विकसित देशों से ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने तथा विकासशील देशों को वित्त, प्रौद्योगिकी एवं क्षमता निर्माण सहायता देने का आह्वान किया। वर्ष 2015 में यूएनएफसीसीसी के अंतर्गत समग्र, संतुलित, समान एवं प्रभावी समझौते के लिए बहुपक्षीय विचार विमर्श को आगे बढ़ाने की दिशा में दोनों पक्ष संयुक्त रुप से और अन्य पक्षों के साथ मिलकर काम करेंगे ताकि यूएनएफसीसीसी का सम्पूर्ण, कारगर एवं स्थायी कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके। दोनों पक्षों ने विकसित और विकासशील देशों के बीच भिन्न ऐतिहासिक दायित्वों, विकास की अवस्थाओं और राष्ट्रीय परिस्थितियों को दर्शाते हुए दोहराया कि वर्ष 2015 का समझौता पूर्णतया यूएनएफसीसीसी के सिद्धांतों, प्रावधानों और संरचना के अनुरुप, विशेषकर निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों के अनुरुप होगा, लेकिन उत्तरादायित्व और विशिष्ट क्षमताओं को
अलग रखी।
दोनों पक्षों ने पूर्व-2020 महत्वाकांक्षा को बढ़ावा देने और देशों के बीच आपसी विश्वास कायम करने के लिए बाली योजना के निष्कर्षों के समान महत्व और उनके तत्काल कार्यान्वयन पर जोर दिया है। दोनों पक्षों ने विकसित देशों से पूर्व-2020 उत्र्सजन कटौती लक्ष्य बढ़ाने और विकासशील देशों को 2020 तक प्रतिवर्ष 100 बिलियन अमरीकी डॉलर प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान करने का अनुरोध किया।
दो बड़े विकासशील देश होने के नाते चीन और भारत जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए योजनाओं, नीतियों और कटौती एवं अनुकूलन के उपायों के द्वारा घरेलू स्तर पर महत्वाकांक्षी कार्रवाइयां कर रहे हैं जबकि उनके समक्ष सामाजिक और आर्थिक विकास तथा गरीबी मिटाने जैसी बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं।....
भारत और चीन वर्ष 2015 के संदर्भ में अपनी अभीष्ट राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (आईएनडीसी) के लिए घरेलू तैयारियों में पूरी तरह संलग्न हैं और वे जितना जल्द से जल्द हो सकेगा, पेरिस सम्मेलन से पहले अपने आईएनडीसी से अवगत करा देंगे। दोनों पक्षों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन पर उनकी आपसी भागीदारी परस्पर लाभदायक है और जलवायु परिवर्तन से निपटने के वैश्विक प्रयासों में योगदान देती है। इस संदर्भ में दोनों पक्षों ने घरेलू जलवायु नीतियों और बहुपक्षीय वार्तालाप पर उच्च स्तरीय आपसी संवाद बढ़ाने तथा स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा, इलैक्ट्रॉनिक वाहनों सहित स्थायी परिवहन, अल्प-कार्बन शहरीकरण और अनुकूलन सहित स्थायी व्यवहारिक आपसी सहयोग को सशक्त बनाने का फैसला किया है।
मंगोलिया में भी प्रधानमंत्री ने अपने दौरे की शुरुआत ऐतिहासिक गंदन मठ से की। वहां पर प्रधानमंत्री ने महाबोधि का एक पौधा भेंट किया। यह पौधा भारत की जनता की मैत्री का प्रतीक होने के साथ-साथ पर्यावरण और प्रकृति के प्रति भारत की चेतना का प्रतीक भी बन गया है। भारत और मंगोलिया दोनों ऐतिहासिक साझेदार हैं। मंगोल की सीमा में भगवान बुद्ध की वाणी आज से ढाई हजार वर्ष पहले ही पहुंच गई थी। मंगोलिया में बुद्ध धर्म का प्रभाव है। भगवान बुद्ध ने प्रकृति के साथ मिलकर जीने और सभी प्राणियों को अभयदान देने का उपदेश दिया है, बुद्ध की अहिंसा प्रकृति के तालमेल का ही एक रूप है। भारत और मंगोलिया के बीच कई समझौते हुए। इनमें यूरेनियम के आदान-प्रदान की बात भी है। यूरेनियम का ईंधन के रूप में प्रयोग स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक सशक्त कदम साबित हो सकता है। यद्दपि परमाणु ऊर्जा कई खतरों से भरी हुई है किंतु इसका संपूर्ण सावधानी के साथ दोहन हो, तो पर्यावरण को बचाते हुए क्लीन एनर्जी प्राप्त की जा सकती है। परमाणु ऊर्जा की दिशा में भारत मंगोलिया के सहयोग से आगे बढ़ सकता है।
दक्षिण कोरिया के साथ भी पर्यावरण के दृष्टिकोण से कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। आर्थिक विकास, पर्यावरण एवं स्वच्छ ऊर्जा संरक्षण के बीच अभिन्न संपर्क को स्वीकार करते हुए भारत और कोरिया अपने मंत्रालयों तथा एजेंसियों के बीच आदान-प्रदान बढ़ाने पर सहमत हुए। कोरिया की हरित अर्थव्यवस्था प्रयास की सराहना करते हुए भारत ने शहरी जल तथा वायु गुणवत्ता में सुधार और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए नवाचारी नीतियों तथा तकनीक लागू करने में पारस्परिक लाभ साझेदारी के लिए कोरिया के साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की। दोनों नेताओं ने विज्ञान और टेक्नोलॉजी में जारी सहयोग की सराहना करते हुए कहा कि संयुक्त अनुसंधान और विकास परियोजनाएं नवीकरणीय ऊर्जा, मेटेरियल साइंस, रोबटिक एवं इंजीनियरिंग विज्ञान तथा स्वास्थ्य विज्ञान जैसे फोकस वाले क्षेत्रों में लागू की जा रही है। दोनों नेताओं ने स्वच्छ टेक्नोलॉजी रोबोटेक्स तथा ऑटोमेशन और इलेक्टॉनिक्स सिस्टम डिजाइन और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में आकादमी-उद्योग संपर्क कार्यक्रमों को विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग की काफी संभावनाएं हैं। दोनों पक्षों ने चन्द्रमा की खोज, सेटेलाइट नैविगेशन और अंतरिक्ष विज्ञान तथा एप्लिकेशन को जारी रखने के लिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र (इसरो) तथा कोरिया एरोस्पेस अनुसंधान संस्थान (केएआरआई) के बीच समझौते का स्वागत किया। गहन अंतरिक्ष कॉर्स ट्रैकिंग तथा कोरिया तथा भारत के गहन अंतरिक्ष मिशनों के लिए संचार समर्थन। चन्द्रमा की सतह का डाटा तथा चन्द्रायन-1 द्वारा एकत्रित रैडिएशन डाटा साझा करना। गगन-कास (केएएसएस) इंटरोपैराबिलिटी तथा गगन (जीपीएस सहायता युक्त जियोऑगोमेंटेड नैविगेशन प्रणाली) तथा केएएसएस (कोरिया ऑगोमेंटेशन सेटेलाइट सिस्टम) में अनुभवों को साझा करना। अंतरिक्ष विज्ञान तथा एप्लिकेशन, सेटेलाइट लांच तथा अन्य सहमत क्षेत्रों में तकनीकी सहयोग। उपरोक्त क्षेत्रों में सहयोग के तरीकों को मजबूत बनाने के लिए इसरो तथा केएआरआई के बीच नियमित कार्य स्तरीय संवाद करना।
कोरिया में प्रधानमंत्री ने एशियन लीडरशिप फोरम में कहा कि आर्थिक वृद्धि के साथ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम होना चाहिए। मैं इसलिए जीवन शैली और समृद्धि के मार्गों में बदलाव की बात करता हूं और मुझे विश्वास है कि यह हमारे भविष्य से समझौता किए बिना संभव है। एशिया को नये उत्पादों के लिए अपनी क्षमता और मितव्ययी निर्माण का इस्तेमाल वहनीय नवीकरणीय ऊर्जा के लिए करना चाहिए। प्रकृति के प्रति सम्मान हमारी साझा विरासत का अंग है।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटना हमारे स्वयं के सरोकारों के लिए आवश्यक है। इसलिए भारत ने अगले पांच वर्षों में 175 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन की क्षमता का लक्ष्य निर्धारित किया है। लेकिन कोयला और तेल लम्बे समय तक हमारी ऊर्जा के प्रमुख संसाधन बने रहेंगे। इसलिए उन्हें और अधिक स्वच्छ तथा पर्यावरण के लिए कम नुकसानदेह बनाने के लिए मिलकर काम करें। समेकित वृद्धि के प्रति हमारी नीति तब तक अधूरी है जब तक कि हम अपने क्षेत्र में कृषि में बदलाव के लिए अपने नवाचार और प्रौद्योगिकी को साझा नहीं करते। हम में से कइयों का समान पारिस्थितिक तंत्र और ग्रामीण अर्थव्यवस्था है और एक -दूसरे से सीखने का हमारा लम्बा इतिहास रहा है। वर्ष 2025 तक एशिया के अधिकतर निवासी शहरों में रह रहे होंगे। एशिया के शहरी क्षेत्रों की आबादी दुनिया के अन्य क्षेत्रों में मध्यम क्षेत्रफल के देशों से अधिक होगी। कुछ अनुमानों के अनुसार भारत में उस समय विश्व की 11 प्रतिशत शहरी जनसंख्या निवास कर रही होगी। इसलिए रहने योग्य और भविष्य के लिए दीर्घकालिक शहरों
का सृजन करना हम सबका सामूहिक लक्ष्य
होना चाहिए।
-अरविंद नारद