29-May-2015 05:41 AM
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प्रोटोकॉल और लोकसेवकों को सम्मान देने के कुछ नियम अजीब और समयबर्बाद करने वाले हैं। परंपराओं के नाम पर ब्रिटिश काल की कुछ निहायत घटिया नीतियों को स्वतंत्र भारत में कई दशक बाद भी ब्रिटिश उपनिवेश के अवशेषों की तरह सम्हाल कर रखा गया है। हम यह भूल रहे हैं कि ब्रिटिश विदेशी शासक थे और भारत उनका गुलाम। लेकिन आज भारत लोकतांत्रिक देश है जहां जनता ही शासक है। इसलिए गॉर्ड ऑफ ऑनर जैसी तमाम परंपराएं बेमानी और समय बर्बाद करने वाली हैं।
इन्हें अपनी फिक्र है
सत्ता और सत्ता के आस-पास बैठे प्रभावशाली लोगों को दूसरों का दर्द कहां दिखता है। अभी विधायकों के या अफसरों के वेतन की बात होती, तो आनन-फानन में फैसला हो गया होता। लेकिन अतिथि विद्वानों का दर्द ये क्या समझें। इन विद्वानों ने दिन-रात पढ़ाई की, डिग्रियां हासिल कीं, अपने जीवन का बहुमूल्य समय अध्यापन और अध्यन को समर्पित कर दिया, लेकिन बदले में इन्हें क्या मिला? साल में कुछ कालखंड का पुरस्कार, जो कि अफसरों की दया पर निर्भर है। जिस राज में पढ़े-लिखों की यह दुर्दशा है वहां भला क्योंकर कोई पढऩा चाहेगा? अतिथि विद्वानों के प्रति मध्यप्रदेश की सत्ता का रवैया निहायत घटिया और गैरजिम्मेदाराना है।
दाम बढ़ाने का क्या औचित्य?
बिजली के दाम बढ़ाने का औचित्य समझ से परे है। न सेवा बेहतर है और न ही सेवा प्रदाता का रवैया संतोषजनक है। बिजली के मीटरों से आज तक सही रीडिंग नहीं आती। हर तीसरा उपभोक्ता रो रहा है कि उसके घर का बिल अधिक आता है, पर सरकार को दाम बढ़ाने से ही फुर्सत नहीं है। गांव में वही बेरंग हालात हैं। बिजली कभी-कभार आती है। उस पर सरकार का अहसान यह है कि उसने अटल ज्योति अभियान चालू कर दिया है। रात के अंधेरे में डूबे गांव इस अभियान की सच्चाई उजागर कर चुके हैं।
यहां मौत एक आंकड़ा है
दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान फांसी लगाने वाला किसान गजेंद्र शायद यह नहीं जानता कि इस देश में मौत एक आंकड़ा भर है, उससे ज्यादा कुछ नहीं। गजेंद्र की मौत के बाद छिड़ी बहसों में इन्हीं आंकड़ों का वमन किया गया। गजेंद्र शायद असावधानीवश भगवान को प्यारा हो गया लेकिन वह देश की राजधानी दिल्ली में शहीद हुआ था, इसलिए उसकी मौत राष्ट्रीय खबर बन गई। रात और दिन खलिहानों में, घर के अंधेरे कोने में, खेत में और पगडंडियों पर आत्महत्या कर रहे किसानों की सुध किसे है? जो जीते-जी मर चुके हैं या जिंदा रहकर भी मरे जैसे हैं, उनकी समस्याओं से किसको सरोकार है? सब अपनी राजनीति में मगन हैं। सचमुच अन्नादाता के लिए यह दौर दर्दनाक और खतरनाक है।
अब यह भी छूटेेंगे
लगता है जेल में बंद महान विभूतियोंÓ के अच्छे दिन आ गए हैं। सलमान खान के प्रति देश की न्यायपालिका ने जो उदारता दिखाई है, उससे कई लोगों की नाउम्मीदी उम्मीद में बदल चुकी है। वैसे भी राजनीति का असर कहीं न कहीं खासमखास लोगों पर पड़ता ही है। आसाराम बापू को आशा बंधना स्वाभाविक ही है, आखिर एक इंटेलिजेंट वकील सुब्रह्मण्यम स्वामी उनके बचाव में जो आ गए हैं।