कॉलेजियम पर सरकार की दो टूक का अर्थ क्या है?
22-May-2015 05:54 AM 1237708

 

देश की संसद में अनुच्छेद 124 में बदलाव करते हुए यह व्यवस्था बना दी है कि मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीश एन.जे.ए.सी. द्वारा अनुशंसित होकर नियुक्त किए जाएंगे। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को साफ बता दिया है कि कॉलेजियम प्रणाली मृत हो चुकी है और उसे हमेशा के लिए दफना दिया गया है। सरकार की इस दो टूक राय का क्या अर्थ हो सकता है? क्या यह निष्पक्ष न्यायापालिका को दफन करने की शुरूआत है या फिर न्यायालयों में होने वाली नियुक्तियों को ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए यह नई व्यवस्था लागू हुई है। कॉलेजियम को लेकर बहस तो लंबे समय से चल रही है। नेशनल ज्यूडिशियल अपाइंटमेंट्स कमीशन (एन.जे.ए.सी.) को कुछ लोग सही मानते हैं तो वहीं रामजेठमलानी जैसे विद्वान वकीलों ने कॉलेजियम प्रणाली खत्म करने का कड़ा विरोध किया है। सरकार ने कहा है कि अब यह प्रणाली लौट नहीं सकती। यदि कानून की नजरों में एन.जे.ए.सी. नकारा साबित होता है तो संसद जजो की नियुक्ति से संबंधी नया कानून बनाएगी। इसका अर्थ यह है कि सरकार अब पीछे नहीं हटेगी। अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने न्याया मूर्ति जे. एस. शेखर की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय बेंच को स्पष्ट बता दिया है कि पुरानी प्रणाली को पुनर्जीवित करने के लिए पीछे लौटने का सवाल ही पैदा नहीं होता। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 124 मूल रूप से संविधान से गायब हो चुका है। उन्होंने कहा कि यदि यह बेंच इस संशोधन को अमान्य करते हुए एन.जे.ए.सी. को गैर संवेधानिक ठहराती है तब भी इस अनुच्छेद की वापसी नहीं हो सकती। ज्ञात रहे कि सरकार ने अनुच्छेद 124 में परिवर्तन करते हुए एन.जे.ए.सी. का मार्ग प्रसस्त किया था। वर्ष 1990 में भी एक समय ऐसा आया जब सुप्रीम कोर्ट सहित तमाम न्यायालयों में जजों की नियुक्ति पर सवाल उठाए गए। निष्पक्षता का प्रश्न सामने आने पर ये व्यवस्था की गई कि एक कॉलेजियम जिसमें मुख्य न्यायाधीश की प्रमुखता रहेगी जजों की नियुक्ति करेगा। लेकिन समय के साथ इस कॉलेजियम पर भी सवाल उठने लगे।  वरिष्ठ अधिवक्ता के पारसरन का कहना है कि अब कॉलेजियम की वापसी नहीं हो सकती। रोहतगी का कहना है कि इस मामले में 9 सदस्यीय बेंच को निर्णय लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि एन.जे.ए.सी. को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता ने भी कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए है। इसलिए यह जरूरी है कि जजों की नियुक्ति संबंधी प्रणाली को बदला जाए।
कॉलेेजियम प्रणाली रहे या एन.जे.ए.सी. रहे। इस मामले में बहस जारी है। मई माह की शुरुआत में पांच सदस्यीय संवेधानिक बेंच ने एन.जे.ए.सी. को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी कि कॉलेजियम प्रणाली अच्छा काम कर रही थी और इसमें सुधार किया जा सकता था। लेकिन 22 वर्ष पुरानी इस प्रणाली को खत्म करने के लिए सरकार ने कमर कस ली है। इसलिए अब नई वैकल्पिक व्यवस्था ही लागू रहेगी। दरअसल कॉलेजियम प्रणाली पर विवाद पहले भी होता है। मद्रास हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति एन. कन्नदासन की नियुक्ति के समय सरकार और राष्ट्रपति ने भी विरोध जताया था, लेकिन कॉलेजियम ने इस सुझाव को ठुकराते हुए अपनी पसंद के जज की नियुक्ति कर दी। रोहतगी ने संवेधानिक बेंच के समक्ष सरकार का पक्ष रखते हुए यह उदाहरण दिया। न्यायाधीश दिनकरन के मामले में भी इसी तरह का टकराव हुआ था।
संविधान विशेषज्ञों का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के कॉलेजियम द्वारा न्यायाधीशों के चयन का प्रावधान संविधान में नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 124 (2) के अनुसार राष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय के और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श करने के बाद, जिनसे वह परामर्श करना उचित समझे, उच्चतम न्यायालयों के सभी न्यायालयों की नियुक्ति करेगा लेकिन मुख्य न्यायमूर्ति के अलावा किसी न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, भारत में मुख्य न्यायमूर्ति से सर्दव परामर्श किया जाएगा। सरकार के लिए मुख्य न्यायाधीश और अन्य न्यायाधीशों से परामर्श करने का प्रावधान था। यह महत्वपूर्ण है कि नियुक्ति परामर्श सेÓ नहीं अपितु परामर्श करने के पश्चातÓ की जाने की बात कही गई थी (अनुच्छेद 124)। स्पष्टतया आशय यह था कि परामर्श करने के बाद सरकार यथोचित निर्णय स्वयं ले सकती थी। व्यवहार में होता यह था कि मुख्य न्यायाधीश से नामों के सुझाव मिलने के बाद, मंत्रिमंडल सुझावों पर विचार करता था और राष्ट्रपति को आवश्यक सलाह देता था कि किन व्यक्तियों को नियुक्त किया जाए। राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करता था।
एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1982 एस.सी. 149 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 124 में जिस परामर्श का उल्लेख किया गया है वह प्रभावी परामर्श होना चाहिए और विचारों के आदान-प्रदान पर आधारित होना चाहिए हालाँकि परामर्शÓ का अर्थ सहमतिÓ नहीं है। न्यायमूर्ति भगवती का स्थिति में सुधार के लिए सुझाव था कि मुख्य न्यायमूर्ति के नाम का सुझाव देने के लिए एक पैनल बनाया जाए। किंतु, 16 अक्टूबर, 1993 को उच्चतम न्यायालय द्वारा एडवोकेट्स-ऑन-रिकार्ड एसोसिएशन तथा अन्य बनाम भारत संघ, ए.आई.आर. 1994  एस.सी. 268 में दिए गए निर्णय से एस.पी.गुप्ता वाले निर्णय को उलट दिया गया। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने वस्तुत: न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति की सारी शक्ति अपने ही हाथों में ले ली। मुख्य न्यायाधीश दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों को चयन प्रक्रिया में शामिल कर सकता था। परामर्शÓ का अर्थ सहमतिÓ माना गया। इस निर्णय के आधार पर 1994 में न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया में मूलभूत परिवर्तन किए गए जिसका व्यवहारत: परिणाम यह हुआ कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामलों में निर्णायक मत मुख्य न्यायाधीश का हो गया।

  • दिल्ली से रेणु आगाल

 

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