06-May-2015 05:32 AM
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मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में अरेरा हिल्स की हरियाली को उजाड़कर विधायकों के आवास को बनाने की बात उठी, तो आस-पास के रहवासी काफी उद्वेलित हो गए। यह उद्वेलन स्वाभाविक है। इससे प्रकट होता है कि पर्यावरण जैसे मुद्दों को लेकर जनता जागरूक है और गंभीर है। स्वयं विधायकों ने इस निर्माण को अनुचित बताया है और किसी अन्य जगह निर्माण करने की बात कही है। शहर के बीचों-बीच जब हरियाली पर सवाल खड़ा हुआ, तो हंगामा मच गया। लेकिन शहर के आस-पास के जंगल कितने सिमट गए हैं, कितनी तेजी से हरियाली मिट रही है, कंक्रीट के जंगल उग रहेे हैं, विकास के नाम पर पर्यावरण का विनाश हो रहा है, इन सबको लेकर भी जनता की जागरूकता वांछनीय है। केवल अरेरा हिल्स ही नहीं भोपाल के कई इलाके हैं जहां की हरियाली पर खतरा मंडरा रहा है। भोपाल का तालाब अवैध निर्माण के कारण दिनों-दिन सिमटता जा रहा है। आज भी ग्रीन बैल्ट की कई जमीनों पर अवैध कब्जे हैं। जिन्हें हटाने की हिम्मत किसी में नहीं है। साल दर साल इसी तरह अवैध कब्जों की जद मेंं हरियाली नष्ट होती चली जाती है। विधायकों के आवास का मुद्दा इसलिए उछल गया क्योंकि राजनीतिज्ञों से संबंधित कोई भी समाचार मीडिया में प्रमुखता से जगह पाता है। लेकिन पर्यावरण का मुद्दा अब गंभीर हो चला है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक हॉकिन्स ने कुछ समय पहले कहा था कि पृथ्वी वासियों को रहने के लिए नया ग्रह तलाशना होगा। हॉकिन्स का यह कथन पृथ्वी पर निवास की परिस्थितियों के संदर्भ में है। जिनमें प्रमुख रूप से पर्यावरण का विनाश शामिल है। भूकंप, ज्वालामुखी, बाढ़, सुनामी, तूफान जैसी आपदाओं का कारण प्रकृति हो सकती है लेकिन पर्यावरण के विनाश के चलते जो आपदाएं मानव ने आमंत्रित की हैं, उनकी जिम्मेदारी तो समूची मानव जाति को ही वहन करनी पड़ेगी। आज मालदीव डूबने की कगार पर है। पश्चिम बंगाल का बड़ा हिस्सा पानी के नीचे समा रहा है। दक्षिण के कई राज्यों की भूमि जलमग्र हो रही है। यही हाल दुनिया के लगभग 27 देशों का है। इसका कारण केवल पर्यावरण का विनाश ही है। ग्लोबल वार्मिंग एक सच्चाई है। पृथ्वी का तापमान मानव जनित गतिविधियों के कारण बढ़ा है। जंगल का रकबा सिमटने लगा है और सिमटता जा रहा है। भोपाल में कभी चारों तरफ हरियाली थी, आज कंक्रीट के जंगल हैं। हर शहर की यही कहानी है। बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या और संसाधनों पर दबाव के चलते पर्यावरण ध्वस्त हो रहा है। पर्यावरण का यह विनाश किस सीमा तक पहुंचेगा, कहना मुश्किल है। हॉकिन्स ने आगामी 1 हजार वर्ष के भीतर पृथ्वी से अन्यत्र ग्रह तलाशने का सुझाव दिया है। लेकिन प्रश्न यह है कि 1 हजार वर्ष तो दूर पृथ्वी मौजूदा हालात में कुछ सौ वर्ष ही जीवित रह जाए, यही बहुत बड़ी बात है। पृथ्वी की इस त्रासदी को सभी अपना सरोकार मानें। इस दृष्टि से भोपाल के जागरूक लोगों और उन विधायकों की सराहना की जा सकती है, जो हरियाली बचाने के लिए हर पल सजग है।
-राजेन्द्र आगाल