21-Apr-2015 05:28 AM
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भारत के विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने मीडिया के एक वर्ग को प्रेस्टीट्यूट की संज्ञा दी है। कुछ बुद्धिजीवियों ने भी उनसे सहमति प्रकट की है। भारत में पत्रकारिता जगत के कुछ पत्रकारों को यह शब्द शायद गलत सुनाई पड़ा या इसका अर्थ उन्होंने प्रोस्टीट्यूट (वेश्या) निकाल लिया। वीके सिंह ने संभवत: पीत पत्रकारिता के लिए यह शब्द उपयोग किया होगा। लेकिन मीडिया हो या लोकतंत्र का अन्य कोई स्तंभ, टिका हुआ उन लोगों के ऊपर ही है जो पूर्ण समर्पण, निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपना काम करते हैं। कोई भी पेशा तभी बच सकता है जब उसमें ईमानदार लोगों का बाहुल्य हो। जहां तक बेईमान और मुफ्तखोर लोगों का प्रश्न है वे तो हर पेशे में मिल जाएंगे। पत्रकारिता ही क्यों नौकरशाही से लेकर तमाम पेशों में बेइमानों की कमी नहीं है, लेकिन देश जो चला रहे हैं वे ईमानदार ही हैं। ईमानदारी के कारण ही यह देश बचा हुआ है। वरना कब का टूट जाता। जनरल की यह चिंता बाजिब हो सकती है कि सुरक्षा से लेकर अन्य जगह कुछ दलाल किस्म के लोग मौजूद हैं, लेकिन असली चुनौती तो इन्हीं लोगों को अलग करते हुए अपने काम को अंजाम देने की है। यदि दलाल हैं तो उनसे बचने के रास्ते भी हैं। दलालों को रास्ते पर लाने के तरीके भी हैं। कोई भी सत्ता इन बुराइयों से मुक्त नहीं हो सकती। जिन देशों में प्रशासन अपेक्षाकृत ईमानदार और पारदर्शी है वहां पर भी ये बुराइयां आटे में नमक बराबर मौजूद हैं। वीके सिंह ने अपना क्रोध जिस भी रूप में प्रकट किया हो लेकिन उन्हें सिक्के का दूसरा पहलू अवश्य देखना चाहिए। यह मीडिया ही है जिसने वीके सिंह के दर्द को समझा और बांटा। लेकिन मीडिया सकारात्मक या नकारात्मक नहीं हो सकता। मीडिया तो वही सामने रखेगा जो उसे दिखेगा। सत्य को उसके वास्तविक स्वरूप में दिखाना ही मीडिया की सही जिम्मेदारी है। मीडिया के लिए कोई भी समाचार न तो सकारात्मक और न ही नकारात्मक है। हर समाचार को बिना पूर्वाग्रह के प्रस्तुत करना मीडिया की जिम्मेदारी है। यदि दुनिया का माहौल नकारात्मक और दिल दुखाने वाली खबरों से भरा पड़ा है तो इसमें मीडिया क्या कर सकता है। मीडिया खुद तो सकारात्मक खबरें पैदा नहीं कर सकता। अलबत्ता यदि किसी खबर में कुछ ऐसा है जो सकारात्मक है और समाज के लिए उपयोगी है तो उसे मीडिया अवश्य प्रस्तुत कर सकता है। मीडिया की जिम्मेदारी है कि वह अपने सरोकारों को सही आईने से देखे और उन सरोकारों को जनता तक सही नजरिए से प्रस्तुत करे। पॉजिटिव या नेगेटिव होने प्रेस्टीट्यूट होने या न होने में मीडिया का गौरव नहीं है। मीडिया वक्त के साथ चलेगा तभी वह सफल हो सकेगा। हर हाल में मीडिया को सत्य के साथ ही खड़ा होना पड़ेगा। ऐसा नहीं हुआ तो इतिहास मीडिया को माफ नहीं करेगा। जहां तक मीडिया के आलोचकों का प्रश्न है उन्हें मीडिया पर उंगली उठाने से पहले समाज के अन्य पहलुओं को भी देखना चाहिए। क्योंकि राजनीति की तरह मीडिया भी समाज का ही दर्पण है। जैसा समाज होगा वैसा ही मीडिया होगा।