20-Apr-2015 06:02 AM
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सुभाषचंद्र बोस और शहीद भगत सिंह के परिवारों की जासूसी कांग्रेस द्वारा कराए जाने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। जर्मनी यात्रा के दौरान सुभाष चंद्र बोस के पौत्र सूर्य कुमार बोस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर नेताजी से संबंधित फाइलों का रहस्य उजागर करने का आग्रह किया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस के मित्रों की सूची में हिटलर का नाम होने के कारण ब्रिटिश हुकूमत ने सुभाष चंद्र बोस को अलग नजरिए से देखा था और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए एक बहुत बड़ा खतरा भी माना था। यह सच है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नेताजी जापान, जर्मनी आदि देशों के सहयोग से सशस्त्र क्रांति द्वारा भारत को आजाद कराना चाहते थे। उनका मानना था कि खैरात में मिली आजादी ज्यादा टिकाऊ नहीं होगी। ब्रिटिश हुकूमत के सामने गिड़गिड़ाने से बेहतर है उसकी मुखालफत करना। नेताजी ने जमकर ब्रिटिश हुकूमत की मुखालफत की और एक बड़ी भारी फौज भी तैयार कर ली। आजाद हिंद फौज से पंडित जवाहर लाल नेहरू ही नहीं महात्मा गांधी भी सहमत नहीं थे। इसी कारण नेहरू और सुभाष चंद्र बोस के रास्ते अलग हो गए और अब कहा जा रहा है कि नेहरू ने खुद सुभाष चंद्र बोस के परिवार की जासूसी कराई थी। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा है कि यह आरोप गलत हैं क्योंकि उस समय शालमरी आश्रम के किसी बाबा को लेकर पड़ताल कराई गई थी जिनके बारे में शक जताया जा रहा था कि वे कहीं सुभाषचंद्र बोस तो नहीं हैं। दिग्विजय सिंह ने तो यह भी कह दिया है कि बोस से जुड़े सारे दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।
बोस से जुड़ी लगभग 63 फाइलें गोपनीय कही जा रही हैं। भाजपा विपक्ष में रहते हुए सदैव बोस से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करने की मांग उठाती आई है, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह स्वयं यह मांग कर रहे हैं, नेताजी के पौत्र सूर्य कुमार बोस भी यही मांग कर चुके हैं। कई विपक्षी दलों ने पहले ही यह मांंग की हुई है, तो अब उन फाइलों को सार्वजनिक करने में क्या अड़ंगा है? जब पक्ष-विपक्ष इस पर एकमत है, तो सरकार इस रहस्य से पर्दा क्यों नहीं हटाना चाहती? जब तक कांग्रेस सत्ता में थी, उस पर यह आरोप लगते रहे कि उसने नेताजी से संबंधित फाइलें जानबूझकर दबाकर रखी हैं। लेकिन अब न तो कांग्रेस सत्ता में है और न ही कांग्रेस ने इन फाइलों को गोपनीय रखने का आग्रह किया है। फिर किस बात की देरी है। दरअसल असली मुद्दा यह नहीं है। संभवत: इस विषय पर भारत सरकार और ब्रिटिश सरकार के बीच कोई समझौता अवश्य हुआ होगा, जिसे भारत सरकार तोडऩा नहीं चाहती। हो सकता है इस समझौते में कोई समय सीमा रखी गई हो। लेकिन यह सब अनुमान है। वास्तविकता क्या है? किसी को नहीं पता। इतना तय है कि चाहे कांग्रेस हो या अन्य, अभी तक कोई भी इन फाइलों को जाहिर करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है। लेकिन जवाहर लाल नेहरू का नाम सामने आने से कांगे्रस के लिए भी यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया है। कांगे्रस का एक वर्ग यह मानता है कि इन फाइलों का सच अब सामने आना ही चाहिए।
नेताजी की मौत पर लिखी किताब इंडियाज बिगेस्ट कवर अपÓ के लेखक अनुज धर द्वारा जारी एक पत्र के मुताबिक, स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू स्वयं नेताजी की जासूसी की निगरानी कर रहे थे और निर्देश दे रहे थे। यह पत्र उन्होंने हाल में सार्वजनिक किए गए दो फाइलों से हासिल किया है। इस पत्र के मुताबिक, 25 नवंबर 1957 को नेहरू ने तत्कालीन विदेश सचिव सुबिमल दत्त को पत्र लिखकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भतीजे अमिया बोस के जापान दौरे के बारे में जानकारी मांगी थी। पत्र में नेहरू ने लिखा, मैं टोक्यो स्थित रेनकोजी मंदिर के अपने दौरे की कुछ तस्वीरें भेज रहा हूं। इस यात्रा के बाद मुझे जानकारी मिली है कि शरत चंद्र बोस (नेताजी के भाई) के बेटे अमिया बोस भी टोक्यो गए थे। इसलिए मैं आपको निर्देश देता हूं कि आप टोक्यो में नियुक्त राजदूत को पत्र लिखकर यह जानकारी हासिल करें कि अमिया वहां क्या करने गए थे। क्या उन्होंने दूतावास से संपर्क किया था या रेनकोजी मंदिर गए थे। इस पत्र का जवाब देते हुए जापान में तत्कालीन भारतीय राजदूत सी.एस. झा ने कहा था कि अमिया बोस की जापान में कोई संदिग्ध गतिविधि की सूचना नहीं है।
वहीं, ब्रिटिश लेखागार से प्राप्त एक दस्तावेज से साबित होता है कि भारतीय खुफिया ब्यूरो ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआई-5 से सूचनाएं साझा करता था। इसमें से नेताजी के करीबी एसी नांबियार द्वारा 1947 में लिखा पत्र भी शामिल है, जिसे उन्होंने स्वीट्जरलैंड से कोलकाता अमिया बोस को लिखा था। लेकिन आईबी ने पत्र घर पहुंचने से पहले ही उसकी प्रति एमआई-5 को मुहैया करा दी थी। नोट से यह भी साबित होता है कि आईबी के उपनिदेशक एसबी शेट्टी एमआई-5 के सुरक्षा अधिकारी केएम बॉउरन के संपर्क में थे। उधर शहीद-ए-आजम भगत सिंह के परिवार ने भी आरोप लगाया है कि सरकार ने वर्षों तक उनके परिवार की भी निगरानी की। भगत सिंह के भतीजे 57 वर्षीय अभय सिंह संधू ने शनिवार को कहा कि उनके परिवार की आजादी के बाद भी निगरानी की गई। इसी के साथ उन्होंने सरकार से इस संबंध में मौजूद दस्तावेजों को भी सार्वजनिक करने की मांग की।