गौमांस की राजनीति
20-Mar-2015 03:15 PM 1237789

 

भारत की गऊ माता एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार गौमांस पर प्रतिबंध को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है। रोचक यह है कि हिंदू जो कि गाय को माता मानते हैं, इसके मांस के लिए आपस में ही तर्क-वितर्क कर रहे हैं। आम तौर पर माना जाता है कि गौमांस का सेवन मुसलमान करते हैं, इसलिए गौमांस का जब भी प्रश्न उठता है, हिंदू बनाम मुस्लिम का सांप्रदायिक तनाव भी उसकी पृष्ठभूमि में दिखाई देने लगता है। भाजपा चूंकि दक्षिण पंथी हिंदूवादी पार्टी है लिहाजा जब-जब भाजपा राज्य या केंद्र में सत्ता में होती है गौमांस का मुद्दा अवश्य सामने आता है। इस बार यह मुद्दा महाराष्ट्र, हरियाणा में गौमांस पर प्रतिबंध के बाद सामने आया। प्राय: सभी भाजपा शासित राज्यों  में गौमांस पर प्रतिबंध है, केंद्र भी ऐसे कानून की तैयारी कर रहा है जिसमें गौमांस का निर्यात या व्यापार दंडनीय अपराध होगा। लेकिन कांग्रेस और अन्य पार्टियां गौमांस पर प्रतिबंध का विरोध करती आई हैं। भारत दुनिया के सबसे बड़े गौमांस निर्यातक देशों में से एक है। कांग्रेस के शासनकाल में पिंक क्रांति नामक शब्द काफी चर्चित हुआ, भाजपा ने कांग्रेस पर गौमांस निर्यात को प्रोत्साहित करने का आरोप भी लगाया था। कर्नाटक में सत्ता में आते ही कांग्रेस ने गौमांस पर प्रतिबंध समाप्त कर दिया था। अब फिर से संसद में यह मुद्दा गरमा रहा है। संसद के बाहर भी गौमांस के समर्थन और विरोध में प्रदर्शन, धरने इत्यादि चल रहे हैं। मद्रास में वकीलों ने गौमांस की दावत कोर्ट परिसर में ही उड़ाकर विरोध प्रकट किया, केरल में तो गौमांस उत्सव मनाया गया। देश के अन्य हिस्सों में भी इस तरह के प्रदर्शन देखने में आए। रोचक तथ्य यह है कि किसी मुस्लिम संगठन या समुदाय ने गौमांस का न तो समर्थन किया और न ही विरोध किया, वे इस लड़ाई में तटस्थ बने हुए हैं। इससे यह तो साफ जाहिर हो गया है कि मुसलमान न तो गौमांस को लेकर जिद कर रहे हैं और न ही इसे वे बड़ा मुद्दा मानते हैं। लेकिन गऊ को माता मानने वाले हिंदू ही गौमांस के प्रतिबंध पर दो फाड़ हो चुके हैं।
गौमांस पर प्रतिबंध के विरोधियों का कहना है कि पूर्वोत्तर सहित देश के तमाम हिस्सों में दलित समुदाय के बीच गौमांस खाने का प्रचलन है और इस पर रोक लगाना अनुचित है। महाराष्ट्र में भी लोग इसे खाते हैं। तृणमूल सांसद डेरेन ओ ब्रायन ने कहा है कि गौमांस पर प्रतिबंध से मछली, मटन और चिकन के दाम बढ़ जाएंगे, साथ ही इस पेशे से जुड़े लोगों का जीवन-यापन प्रभावित होगा। देखा जाए तो भारत ही वह देश है, जहां गौमांस ही नहीं बल्कि हर तरह के मांस पर प्रतिबंध लगना चाहिए क्योंकि भारत की भूमि इतनी सक्षम है कि वह अन्नाहार और शाकाहार से ही इसलिए दया केवल गौमाता के प्रति नहीं बल्कि सभी प्राणियों के प्रति दिखाई जानी चाहिए। लेकिन व्यावहारिक रूप से  लोगों की खानपान की आदतें बदलना लगभग असंभव है। जब तक यह धरती रहेगी, हर तरह का खान-पान प्रचलन में रहेगा। गरीब और निचले तबके के लोगों के लिए प्रोटीन का एक महत्वपूर्ण स्रोत मांस होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। मांस भक्षण अनादि काल से भारत में प्रचलन में था। बल्कि कई विद्वान तो यह भी कहते हैं कि गौमांस भी प्रारंभ से ही खाया जा रहा है। फिर भाजपा इस पर रोक क्यों चाहती है?
हिंदू एकमत नहीं हैं और मुसलमान गौमांस पर ज्यादा निर्भर नहीं हैं, उनकी यह पहली पसंद नहीं है। कई मुस्लिम धर्मगुरु और नेता कह चुके हैं कि हिंदू-मुस्लिम सद्भाव कायम करने के लिए मुसलमान लंबे समय से गौमांस से परहेज करते आए हैं। फिर ऐसी क्या मजबूरी है? दरअसल गौमांस पर सारे देश में रोक इसलिए भी संभव नहीं है, क्योंकि गौमांस मटन, चिकन, मछली की अपेक्षा सबसे सस्ता बिकता है। पूर्वोत्तर में तो सुअर और गाय का मांस प्रमुखता से खाया जाता है।
गौमांस गरीबों का प्रोटीन है। यह प्रतिबंध तभी व्यवहारिक होगा, जब गौमांस के व्यापार में लगे लोगों को वैकल्पिक रोजगार मिले और शाकाहार क्रांति को बढ़ावा दिया जाए। क्योंकि केवल गौमाता ही नहीं बल्कि इस पृथ्वी पर समस्त जीवधारियों का यह हक है कि वे अपना संपूर्ण जीवन जिएं। उनकी हत्या न हो और उन्हें अकाल मौत न मारा जाए। गौमांस पर प्रतिबंध की राजनीति चलती रहेगी लेकिन देशभर में पॉलिथीन की बिक्री और खुले में गंदगी फैकने के कारण प्रतिवर्ष जो लाखों गायें मौत के मुंह में समा जाती हैं, उसका उत्तरदायी कौन है?

  • आर.के. बिन्नानी
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