18-Mar-2015 11:34 AM
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काल (समय) चक्र के विभाग अनुसार पूरे एक दिन-रात में चार संधिकाल होते हैं। जिनको हम प्रात: काल, मध्यान्ह काल, सांयकाल और मध्यरात्रि काल कहते हैं. जब हमारा

एक वर्ष हो जाता है, तब देव-असुरों का एक दिन-रात होता है। जिसे कि ज्योतिष शास्त्र में दिव्यकालीन अहोरात्र कहा गया है। ये दिन-रात छ:-छ: माह के होते हैं। इन्हीं को हम उत्तरायण और दक्षिणायन के नाम से जानते हैं। यहां अयनÓ का अर्थ है—मार्ग। (उतरायण=उत्तरी ध्रुव से संबंधित मार्ग, जो कि देवों का दिन और दक्षिणायन=दक्षिणी धु्रव से संबंधित मार्ग, जिसे देवों की रात्रि कहा जाता है) जिस प्रकार मकर और कर्क वृत से अयन(मार्ग) परिवर्तन होता है, उसी प्रकार मेष और तुला राशियों से उत्तर गोल तथा दक्षिण गोल का परिवर्तन होता है। एक वर्ष में दो अयन परिवर्तन की संधि और दो गोल परिवर्तन की संधियां होती हैं। कुल मिलाकर एक वर्ष में चार संधियां होती हैं। इनको ही नवरात्री के पर्व के रूप में मनाया जाता है।
1. प्रात:काल (गोल संधि) चैत्री नवरात्र
2. मध्यान्ह काल (अयन संधि)आषाढ़ी नवरात्र
3. सांयकाल (गोल संधि) आश्विन नवरात्र
4. मध्यरात्रि (अयन संधि) पौषी नवरात्र
उपरोक्त इन चार नवरात्रियों में गोल संधि की नवरात्रियां चैत्र और आश्विन मास की हैं, जो कि दिव्य अहोरात्र के प्रात: काल और सांयकाल की संधि में आती हैं—इन्हे ही विशेष रूप से मनाया जाता है। हालांकि बहुत से लोग हैं, जिनके द्वारा अयन संधिगत (आषाढ़ और पौष) मास की नवारत्रियां भी मनाई जाती हैं, लेकिन विशेषतय: यह समय तान्त्रिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है—गृहस्थों के लिए गोल संधिगत नवरात्रियों का कोई विशेष महत्व नहीं है। जिन चान्द्रमासों में नवरात्रि पर्व का विधान है, उनके क्रमश: चित्रा, पूर्वाषाढ़ा, अश्विनी और पुष्य नक्षत्रों पर आधारित हैं। वैदिक ज्योतिष में नाक्षत्रीय गुणधर्म के प्रतीक प्रत्येक नक्षत्र का एक देवता कल्पित किया हुआ है। इस कल्पना के गर्भ में विशेष महत्व समाया हुआ है, जो कि विचार करने योग्य है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र कालचक्रकी संधियों की अभिव्यक्ति करने में समर्थ है। प्राचीन युगदृष्टा ऋषि-मुनियों नें विभिन्न तौर-तरीकों से अभिनव रूपकों में प्रकृति के सूक्ष्म तत्वों को समझाने के तथा उनसे समाज को लाभान्वित करने के अपनी ओर से विशेष प्रयास किए हैं। संधिकाल में सौरमंडल के समस्त ग्रह पिण्डों की रश्मियों का प्रत्यावर्तन तथा संक्रमण पृथ्वी के समस्त प्राणियों को प्रभावित करता है। अत: संधिकाल में दिव्यशक्ति की आराधना, संध्या उपासना आदि करने का ये विधान बनाया गया है।
अयन, गोल तथा ऋतुओं के परिवर्तन मानव मस्तिष्क को आंदोलित करते हैं। मानव मस्तिष्क, जो कि अनन्त शक्ति स्त्रोतों का अक्षय भंडार है। उसमें जहां संसार के निर्माण करने की स्थिति है, वहीं संहार करने की शक्ति भी केन्द्रित है। यही कारण है कि त्रिगुणात्मक महाकाली, महासरस्वती और महादुर्गा हमारी आराध्य रही हैं। यह पर्व रात्रि प्रधान इसलिए है कि शास्त्रों में रात्रि रूपा यतोदेवी दिवा रूपो महेश्वर: अर्थात दिन को शिव (पुरूष) रूप में तथा रात्रि को शक्ति (प्रकृति) रूपा माना गया है। एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं, फिर भी शिव(पुरूष)का अस्तित्व उसकी शक्ति(प्रकृति) पर ही आधारित है। इस विषय में शास्त्र वाक्य है कि रात्रि रूपा यतोदेवी, दिवा रूपो महेश्वर: अर्थात दिन को शिव(पुरूष) रूप में तथा रात्रि को (शक्ति) प्रकृति रूपा माना गया है। एक ही तत्व के दो स्वरूप हैं फिर भी शिव (पुरूष) का अस्तित्व उसकी शक्ति प्रकृति) पर ही आधारित है। यदि आप शक्ति (देवी) के उपासक हैं और उनके निमित किसी भी प्रकार का मंत्र जाप,पाठ इत्यादि करते हैं तो सदैव रात्रिकाल का ही चुनाव करें। दिनवेला में आत्मसंयंम पूर्वक व्रत-उपवास रखें और रात्रिवेला में कुछ समय किसी भी मंत्र, स्तुति अथवा ग्रन्थ का, उसके अर्थ को हृदयंगम करते हुए पारायण कीजिए,उसमें प्रोक्त गुणों को अपनी आत्मा में उतारिए तत्पश्चात भूमी शयन कीजिए तो फिर देखिए आपकी आत्मिक शक्ति सर्वात्मना विकसित होती है या नहीं? कभी कभी तो ये देखकर विस्मित हो जाना पडता है कि पिंड ब्राह्मंड के संबंध संकेतों के पारखी हमारे ऋषि-मुनियों नें प्रकृतिप्रद नैसर्गिक सुअवसरों को परख कर हमें विशेष रूप से संस्कारित बनाने के कैसे कैसे प्रयास किए हैं, जिन्हें कि हम लोग यूं ही गवां देते हैं। देखा जाए तो उसे सुअवसर किसी धर्म, सम्प्रदाय विशेष से संबंधित न होकर समस्त मानवमात्र के लिए कल्याणप्रद हैं।
-पं.डी.के.शर्मा