18-Feb-2015 01:27 PM
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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सीरीफोर्ट ऑडिटोरियम में अपने भाषण मेें कहा था कि धार्मिक रूप से नहीं बंटा तो भारत प्रगति करेगा। बाद में

अमेरिका जाने पर उन्होंने चिंता प्रकट की और कहा कि भारत एक सुंदर देश है लेकिन हाल के वर्षों में वहां सभी धर्म के लोगों पर हमले बढ़े हैं और असहिष्णुता बढ़ी है, गांधीजी जिंदा होते तो आहत होते।
ओबामा के एक पखवाड़े के भीतर भारत को सांप्रदायिक सद्भाव के लिए दी गई इन दो सीखों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुंह का जायका बिगाड़ दिया है। उधर अमेरिका के प्रमुख समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स ने भी भारत में बढ़ती असहिष्णुता पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुप्पी को खतरनाक बताया है और चर्च पर हमले, घर वापसी जैसी घटनाओं को आग से खेलना करार दिया है। अखबार ने मोदी से सवाल पूछा है कि वे अपनी खामोशी कब तोड़ेंगे?
अखबार के एडिटोरियल में कुछ चर्चों पर हुए हमलों का जिक्र भी किया गया है। इनमें पूर्वी दिल्ली के सेबेस्टियन चर्च और सेंट अल्फोंसा का खासतौर पर उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि दोनों ही चर्चों में आगजनी और तोडफ़ोड़ की गई, लेकिन दान पेटियों को छुआ तक नहीं गया। कैथोलिक बिशप्स की कॉन्फे्रंस में इन हमलों पर चिंता जताई गई और कहा गया कि भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को नुकसान नहीं होना चाहिए और ईसाई समुदाय के लिए ऐसी व्यवस्थाएं की जानी चाहिए, ताकि वह खुद को सुरक्षित महसूस कर सके। एडिटोरियल में बड़े पैमाने पर हो रहे धर्मांतरणÓ कार्यक्रमों पर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि आगरा में दिसंबर में करीब 200 मुसलमानों का धर्मांतरण कराया गया। इसके बाद पश्चिम बंगाल में 100 ईसाई लोगों की हिंदू धर्म में घर वापसी कराई गई। इसमें ये भी कहा गया है कि वीएचपी और आरएसएस जैसे संगठनों ने खुलकर इन कार्यक्रमों का समर्थन किया। वीएचपी नेता प्रवीण तोगडिय़ा पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि वैसे तो भारत में करीब 80 फीसदी हिंदू हैं, लेकिन तोगडिय़ा चाहते हैं कि भारत शत-प्रतिशत हिंदू राष्ट्र बने। इसका मतलब यह है कि जो अल्पसंख्यक हैं, उनके धर्म का कोई मतलब नहीं है। संपादकीय के मुताबिक, वीएचपी अयोध्या में तीन हजार मुसलमानों का धर्मांतरणÓ कराने जा रही है। इसमें बाबरी मस्जिद ध्वंस का जिक्र भी किया गया है, जिसके बाद भड़के दंगों में करीब दो हजार लोगों की मौत हो गई थी। वीएचपी अच्छे तरीके से जानती है कि वह आग से खेल रही है। अखबार ने एक बार फिर मोदी का जिक्र करते हुए कहा है कि उन्होंने विकास का वादा किया है और ओबामा ने पिछली भारत यात्रा के दौरान भारत में धार्मिक असहिष्णुता का जिक्र किया था। मोदी को अब इन ज्वलंत मुद्दों पर अपनी खामोशी और चुप्पी तोडऩी चाहिए।
सवाल यह है कि अचानक ओबामा और अमेरिका के अखबार भारत को बौद्धिक क्यों दे रहे हैं? ऐसी क्या मुसीबत आन पड़ी है कि अमेरिका जिसका खुद का रिकार्ड अश्वेतों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचारों के मामले में भयानक है, जो नस्लीय नफरत को रोकने में नाकाम रहा है, जिसने हिरोशिमा और नागासाकी पर बम इसलिए गिराए थे क्योंकि वहां ईसाई बहुलता न होकर बौद्ध और शिंतो की बहुतायत थी- भारत को अचानक सद्भाव का उपदेश क्यों दे रहा है? क्या यह नरेंद्र मोदी की विदेश नीति की घोर असफलता है? या फिर अमेरिका में आसन्न चुनावों का असर है? कुछ वर्ष पूर्व अमेरिका में ही इनोसेंस ऑफ मुस्लिम नामक फिल्म बनाई गई थी, जिसके निर्माता को वहां बचा लिया गया, इसी अमेरिका में एक पादरी ने पवित्र कुरान को जलाने की घोषणा तक कर डाली थी। लेकिन उस पादरी को गिरफ्तार करने की बजाए उससे केवल याचना की गई कि वह अपना निर्णय बदल ले। ऐसे अमेरिका को अपना रिकार्ड सुधारने की आवश्यकता है। भारत को अनावश्यक उपदेश देकर बराक ओबामा और अमेरिका सारे किए कराए पर पानी फेर रहे हैं। बहरहाल ओबामा के इस कथन का भारत में पुरजोर विरोध हुआ है। विश्व हिंदू परिषद ने तो बराक ओबामा को चर्च का पिट्ठू तक करार दिया है। भारत ने भी ओबामा के बयान को खारिज किया है और कहा है कि यहां लंबे समय से लोग सद्भाव के साथ रह रहे हैं।
-इंद्र कुमार