...तेल की कीमतों का खेल
21-Jan-2015 05:53 AM 1237718

वित्तमंत्री अरुण जेटली के चेहरे पर मुस्कान है। उन्हें बजट बनाना है और बजट के लिए धन की कोई कमी नहीं है क्योंकि ऑइल कंपनियों का घाटा अब मुनाफे मेें तब्दील हो चुका है और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जिस तरह तेल की कीमतें पाताल में जा रही हैं उसे देखते हुए भारत की अर्थव्यवस्था को फौरी तौर पर 40 अरब डॉलर का फायदा होने का अनुमान है।

सरकार ने तेल पर एक्साइज ड्यूटी बढ़ाकर बजट घाटे को कम करने के लिए महत्वपूर्ण उपाय किए हैं। जाहिर है अब सरकार तेल की घटती कीमतोंं का लाभ उपभोक्ता तक पहुंचाने के मूड में नहीं है। लेकिन यक्ष प्रश्न अभी भी यथावत है कि कीमतें कब नियंत्रण में आएंगी। सरकार और सरकार के पैरोकार बदस्तूर यह दावा कर रहे हैं कि थोक महंगाई में गिरावट देखने को मिली है लेकिन इस गिरावट ने आम आदमी की जेब को कोई राहत नहीं दी है। उसकी त्रासदी वैसी ही है। खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर सब्जियों के दाम आसमान पर हैं। सरकार की करारोपण नीति केे कारण इलेक्ट्रॉनिक और ऑटोमोबाइल्स में बेतहाशा तेजी आ गई है। हौजरी सेक्टर में भी दाम बढ़े हैं। केवल रीयल स्टेट में मंदी है क्योंकि लोगोंं की जेबों में पैसा नहीं है। भूख और स्वास्थ्य, गरीबी और कुपोषण तो यथावत है ही। ऐसे में एक तेल ही ऐसा है जो भारत की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला सकता है। भारत की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि तमाम प्राकृतिक संसाधनों में मजबूत होने के बावजूद तेल भारत में बहुतायत से नहीं मिलता है और लगभग 95 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करना पड़ता है। प्राकृतिक गैस का भी यही हाल है लेकिन रिलायंस एनर्जी को जो प्राकृतिक गैस का भंडार मिला है वह भारत की घरेलू आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम है। अमेरिका जैसे देशों ने खाड़ी में मिल रहे सस्ते तेल पर निर्भरता घटा ली है। अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करना चाहता है और अब वह पैसा देकर तेल खरीदने से बच रहा है। घरेलू उत्पादन पर ज्यादा निर्भर है। वहां धरती में बालू तथा मिट्टी के  बीच पड़े तेल को निकाला जा रहा है जिसे शेल ऑयल कहते हैं। यह तकनीक थोड़ी महंगी है लेकिन विश्व के कई देश इसे अपना रहे हैं और विश्व के कुल तेल उत्पादन में लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा शेल आयल का बन गया है। साथ-साथ यूरोप, चीन और जापान में अर्थव्यवस्था की गति धीमी बनी हुई है। शेल आयल की सप्लाई अधिक तथा मंदी के कारण डिमांड कम होने से तेल के दाम गिर रहे हैं। तेल 100 डॉलर से गिरकर 60 डॉलर तक पहुंच गया है। तेल के दाम गिरने से रूस को भारी नुकसान हुआ है। उस देश द्वारा अर्जित विदेशी मुद्रा का आधा हिस्सा तेल से आता है। तेल के दाम गिरने के कारण रूस की मुद्रा रूबल का अवमूल्यन हो रहा है। एक डॉलर में 50 रूबल मिलते थे जो आज 75 रूबल मिल रहे हैं। अवमूल्यन से विदेशी निवेशकों को तगड़ा झटका लगा है। वे रूस में बिकवाली करके अपनी पूंजी को वापस घर ले जा रहे हैं। रूस की इस भगदड़ का प्रभाव तमाम दूसरे देशों पर पड़ा है। विदेशी निवेशक भारत आदि देशों से भी अपनी पूंजी निकाल रहे हैं। इसलिए अकारण ही हमारा सेंसेक्स और रुपया टूट रहा है। तेल के दाम की इस गिरावट को लाने में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विश्व के लगभग 40 प्रतिशत तेल का उत्पादन तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक के सदस्यों द्वारा किया जा रहा है। इनमें सऊदी अरब अग्रणी है।

तेल केदाम गिरने से शेल आयल का उत्पादन लाभकारी नहीं रहेगा। शेल आयल कंपनियों को घाटा लगेगा और इन उद्योगों की हवा निकल जाएगी। बाद में सऊदी अरब तेल के दाम को फिर बढ़ाना चाहेगा।
दूसरा कारण सऊदी अरब और ईरान के बीच अरब दुनिया के नेतृत्व की होड़ है। ईरान की अर्थव्यवस्था भी तेल के निर्यात पर निर्भर है। सऊदी अरब के आंकलन में तेल के दाम की गिरावट को ईरान सहन नहीं कर पाएगा और अर्थव्यवस्था के टूटने से उस देश का कद कम हो जाएगा। ईरान को रूस का समर्थन प्राप्त है। रूस के लिए भी तेल के गिरते दाम चुनौती हैं। इन देशों के वर्तमान नेतृत्व के हटने के बाद सऊदी अरब पुन: तेल के दाम में वृद्धि लाने का प्रयास करेगा। इस परिप्रेक्ष्य में भारत को तय करना होगा कि वह किसके साथ खड़ा है। सऊदी अरब के साथ खड़ा रहने पर तत्काल सस्ता तेल मिलेगा, परंतु दीर्घ काल में दाम ऊपर चढ़ेंगे। ईरान तथा रूस के साथ खड़े होने पर भी हमें तत्काल सस्ता तेल मिलेगा, क्योंकि इस युद्ध में तेल के दाम गिरेंगे। साथ-साथ दीर्घकाल में भी तेल के दाम न्यून रहेंगे। ओपेक में सऊदी अरब व कुवैत का पलड़ा ईरान व वेनेजुएला के मुकाबले कहीं अधिक भारी होता है, जबकि ईरान व वेनेजुएला तेल के अपेक्षाकृत बड़े उत्पादक देश हैं और वेनेजुएला में तो तेल के सबसे ज्यादा भंडार हैं। वहां के राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बावजूद तेल के उत्पादन में कटौती नहीं की गई। ईरान और वेनेजुएला चाहते थे कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम 80 डॉलर प्रति बैरल तुरंत हो जाएं, जबकि लक्ष्य 110-120 डॉलर प्रति बैरल ले जाने का था। ये दोनों ही देश अपेक्षाकृत गरीब हैं और काफी हद तक उनकी अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है। साथ ही, ये देश राजनीतिक रूप से अस्थिर माने जाते हैं। उनकी ज्यादातर सामाजिक कल्याण नीतियां तेल के पैसे से ही चलती हैं। ऐसे में पूंजी के अभाव में वहां राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। दूसरी तरफ, सऊदी अरब और कुवैत डीप पॉकेट्सÓ यानी भारी धन भंडार वाले देश हैं, इनके पास नकदी का प्रवाह अधिक है और ये चार-पांच महीने घाटे को बर्दाश्त कर सकते हैं। लेकिन क्यों?  दरअसल, अमेरिका काफी हद तक ऊर्जा के मामले में स्वतंत्र हो चुका है, आयातित तेल पर उसकी निर्भरता सिर्फ 50 फीसदी रह गई है। यह इसलिए कि हाल के समय में अमेरिका में शेेल तेल और सेल गैस क्रांति हुई। हजारों लोग इस क्रांति में शामिल हैं, जो छोटे किसान या लघु उद्योगपति हैं।

उत्पादन में कटौती नहीं

पूर्व में जब तेल के दाम में गिरावट आती थी तो ओपेक द्वारा उत्पादन में कटौती की जाती थी। इससे तेल की सप्लाई कम हो जाती थी और तेल के दाम स्थिर हो जाते थे। इस बार सऊदी अरब ने उत्पादन में कटौती से इंकार कर दिया है और तेल के दाम को टूटने दिया है, क्योंकि अमेरिका में बढ़ते शेल आयल के उत्पादन को सऊदी अरब झटका देना चाहता है।

तेल के दाम बढ़ेंगे
हालांकि तेल के मामले में अमेरिकी प्रशासन का हस्तक्षेप इतना आसान नहीं है। लेकिन तेल के दाम 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहे तो ओबामा प्रशासन इसे गिरने से रोकने का प्रयास करेगा, क्योंकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में जो वसंत आया है,  वह काफी हद तक सस्ते तेल, यानी सेल की देन है। तेल के खेल में हमेशा ही 90 फीसदी राजनीति रही है। साल 1920 से लेकर आज तक जितने युद्ध हुए हैं, चाहे वह दूसरा विश्व युद्ध हो या पहला खाड़ी युद्ध या फिर दूसरा खाड़ी युद्ध, या फिर आज के समय की यूक्रेन समस्या या ईरान संकट की बात हो, सब जगह असल कारण तेल रहा। यह साफ हो चुका है कि तेल की कीमत मांग-आपूर्ति से तय नहीं होती, बल्कि उसके पीछे कूटनीति,  राजनीति, संघर्ष व खुफियागिरी होती है। इसके अलावा, सैन्य तिकड़मबाजी भी देखने को मिलती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि दुनिया के तेल-क्षेत्र में वह सबकुछ होता है, जो रक्षा क्षेत्र में होता है। वहीं सऊदी अरब और ईरान के बीच टकराव भी है। कच्चे तेल के दाम गिरने से ईरान कमजोर पड़ता जाएगा, जो कहीं न कहीं सऊदी अरब और अमेरिका के लिए अच्छी स्थिति होगी। कमजोर ईरान पश्चिम के सामने घुटने टेक देगा और आणविक संधि पर हस्ताक्षर कर परमाणु हथियार बनाने का अपना हठ त्याग देगा। इससे यह जाहिर होता है कि तेल को लेकर भले ही अमेरिका और सऊदी अरब में टकराव की स्थिति हो, लेकिन ईरान को लेकर ये दोनों देश एक साथ खड़े हैं। ओपेक के बाहर रूस के लिए भी तेल की कीमत समस्याएं बढ़ाती हैं। इस देश की अर्थव्यवस्था भी तेल व गैस पर निर्भर है।

  • विकास दुबे
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