अभिव्यक्ति के उन्मुक्त पैरोकार
21-Jan-2015 05:22 AM 1237783

फ्रांस में एक व्यंग्य कार्टून पत्रिका के दफ्तर पर हमला करके 12 लोगों को मारने के बाद भी हत्यारों का जुनून नहीं थमा और उन्होंने देश के कई हिस्सों में निहत्थों को मौत की नींद सुला दिया। इससे यह तो सिद्ध हो चुका है कि सुरक्षा चाहे कितनी मजबूत क्यों न हो आतंकवादी कहीं भी लाशों का अंबार लगाने में सक्षम हैं। पत्रिका पर हमला कई सवाल खड़े कर रहा है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े हुए हैं। वर्ष 2006 के बाद कई ऐसे प्रकरण देखने में आए जब मुस्लिमों के पैगम्बर मोहम्मद का चित्रण करने की कोशिश पश्चिम के फिल्म निर्माताओं, कार्टूृनिस्टों आदि के एक वर्ग ने की। यह लोग खुलेपन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हवाला देते हुए करोड़ों मुसलमानों के दिलों की धड़कन पैगम्बर मोहम्मद को कुछ इस तरह से चित्रित कर रहे थे, जिसमें व्यंग्य तो था ही लेकिन उतनी ही शरारत भी थी। व्यंग्य को तो शायद कुछ हद तक बर्दाश्त किया जा सकता था, पर शरारतपूर्ण चित्रण को लेकर मुस्लिम जगत में प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। हालांकि इसके विरोध में जो हिंसक कार्यवाही की गई, उसे किसी भी स्थिति मेेंं औचित्यपूर्ण और सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर जो अतिवादी लेखन, चिंतन या रेखांकन किया जा रहा है उस पर विचार-विमर्श होना चाहिए। क्या वह चित्रण सराहनीय कहा जा सकता है जिससे एक बड़े समुदाय को धक्का लगे। इस तरह के कार्टून बनाने वाले या कटाक्ष करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि दुनिया के 90 प्रतिशत लोग अभी भी औसत बुद्धि ही हैं, जो धर्मभीरू होने के साथ-साथ मानसिक रूप से संकीर्ण हैं। इसीलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इन औसत बुद्धि और कुछ हद तक संकीर्ण लोगों की भावनाओं को आहत करना उचित नहीं कहा जा सकता। समाज धीरे-धीरे बदलता है। कभी उसी पश्चिम में गैलीलियो जैसे वैज्ञानिक को अपना मत कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ घूमती है, वापस लेना पड़ा था। सुकरात को जहर का प्याला पिलाया गया था। वर्षों तक पश्चिम ने अपने आपको बदला है तब जाकर वह इतना आधुनिक और उदार बन पाया है। बाकी दुनिया भी बदल रही है, लेकिन उसे समय दीजिए। तब तक इस बदलती दुनिया की भावनाओं की कद्र करना सीखिए। व्यंग्य चित्र बनाने में कोई मनाही नहीं है लेकिन धार्मिक भावनाओं को भी समझना होगा। व्यंग्य के पितामह हरिशंकर परसाई ने लिखा है कि व्यक्ति दोहरी नैतिकता में जीता है। जब वह कहता है कि महिलाएं बाहर निकलें तो उसका आशय होता है कि दूसरे के घर की महिलाएं बाहर निकलें, मेरे घर की नहीं। पाखंड इसी को कहते हैं। आमिर खान हज कर आए और शैतान को पत्थर भी मार आए। अब लोगों को पाखंड से बचने की सलाह दे रहे हैं। पीके में जो व्यंग्य है उससे भला किसे इनकार है? भारत तो वह देश है जहां ऋषि चार्वाक से लेकर कबीर तक उन सभी ज्ञानियों की जनता ने पूजा की है, जो धर्म के पाखंड के खिलाफ लड़ते रहे हैं। यहां राजा राममोहन राय से लेकर महात्मा गांधी और विलियम बैंटिंग से लेकर बाबा अंबेडकर तक तमाम समाज सुधारकों को सर आंखों पर रखा गया।

-राजेन्द्र आगाल

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