20-Jan-2015 06:08 AM
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बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी पर जनता दरबार में एक युवक ने जूता फेंकने की कोशिश की। हालांकि जूता मांझी तक नहीं पहुंच पाया। पुलिस और सुरक्षाकर्मियों ने युवक को हिरासत में ले लिया। जूता फेंकने वाला युवक छपरा का बताया जाता है। नेताओं पर जूता उछालने का प्रचलन पिछले एक दशक में कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। दिसंबर 2008 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश पर एक इराकी पत्रकार मुन्तजर अल जैदी ने जूता उछाला था। बाद में अल जैदी पर भी पेरिस में उस वक्त जूता फेंका गया जब वे युद्ध में हताहत हो रहे इराकियों का मुद्दा उठा रहे थे।
जैदी पर यह जूता निर्वासन में रहने वाले एक इराकी पत्रकार ने ही उछाला था। बुश पर जूता उछालने का वीडियोगेम भी बन गया। उसके बाद तो राजनेताओं पर जूतों की बाढ़ सी आ गई। हर देश के किसी न किसी राजनयिक पर जूते उछलने लगे। सूडान के तत्कालीन राष्ट्रपति ओमर अल बशीर पर एक सभा के दौरान एक व्यक्ति ने जूता फेंक कर मारा। अरब संस्कृति में जूता फेंककर मारना सबसे बढ़ी बेइज्जती समझी जाती है लेकिन भारत की संस्कृति में भी जूता बेइज्जती और असंतोष का प्रतीक बनता जा रहा है। बिहार में जीतनराम मांझी का शासनकाल हिचकोले ले रहा है। मांझी अपने काम से ज्यादा बयानों के लिए चर्चा में रहे हैं। जनता दरबार में भी वे केवल खानापूर्ति के लिए आते हैं, जनता की समस्याएं तो उन्होंने कभी सुनी ही नहीं। इसी कारण असंतोष की पराकाष्ठा होने पर उस युवक ने जूता उछालकर विरोध जताने की कोशिश की। प्राय: हर जगह असंतोष है।
यह भी सच है कि राजनेता चाचा चौधरी के साबू तो हैं नहीं जो चुटकी बजाते हर समस्या का समाधान कर देंगे, लेकिन लोग वोट देने के बाद यह मानने लगते हैं कि जिसको वोट दिया गया है वह देहिक, दैविक और भौतिक दुखों से मुक्ति दिला देगा। ज्यादातर राजनेता पूरी कोशिश करते हैं कि जनता ने जिस मकसद से उन्हें वोट दिया है वह मकसद पूरा हो जाए, लेकिन जो संसाधन हैं उनमें सभी को संतुष्ट नहीं किया जा सकता। कई बार कुछ दूसरे कारणों से भी जूते उछाले जाते हैं, जैसे सिख दंगों के आरोपी जगदीश टाइटलर को कथित रूप से जब कांग्रेस से टिकट देने की बात उठी, तो चिदंबरम पर एक सिख पत्रकार ने जूता उछालकर विरोध प्रकट किया। चिदंबरम ने उस पत्रकार को माफ कर दिया। लेकिन विरोध प्रकटन का यह तरीका अब इतना आम हो गया है कि जूते उछालने की घटनाओं पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा पर फरवरी 2014 में राजाराम नामक एक किसान ने जूता उछाला था। हुड्डा को तो पानीपत में एक रोड शो के दौरान कमल मुखीजा नामक एक बेरोजगार युवक ने धप्पड़ भी मार दिया था। लालकृष्ण आडवाणी, प्रकाश सिंह बादल, कांग्रेस नेता नवीन जिंदल, राहुल गांधी जैसे तमाम नेताओं पर जूते उछाले गए हैं। इनमें से कुछ घटनाएं तो स्पष्ट रूप से विरोधियों से ही प्रेरित लगती हैं जैसे राहुल गांधी पर जब एक व्यक्ति जूता फेंक रहा था तो उन्होंने उसे मंच से ही देख लिया और कहा कि उसे फेंकने दो। आडवाणी पर भी कटनी में जिस व्यक्ति ने चप्पल उछाली थी उसे किसी विरोधी दल ने उकसाया था। कांग्रेस नेता सुरेश पचौरी का कहना है कि जूता फेंकना विकृत मानसिकता का परिचायक है। मेरठ में एक संगठन ने तो लोगों से अपील की है कि वे राजनेताओं को जूते सेे नहीं बल्कि वोट से मारें। इस संगठन का कहना है कि जब भी कोई व्यक्ति किसी के ऊपर जूता फेंकता है तो इससे उसका गुस्सा प्रकट होता है लेकिन यह कोई उपाय नहीं है। लेकिन जूता फेंकना एक प्रचलन बनता जा रहा है। उत्तरप्रदेश में तो कुछ गांवों में लोग राजनेताओं के पुतले बनाकर उन पर जूता फेंकने की कोशिश करते हैं।
कई राजनयिकोंं पर फिंके जूते
फरवरी 2009 में ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ पर एक युवक ने तानाशाह होने का आरोप लगाते हुए जूता फेंका। ईरान के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के तानाशाह परवेज मुशर्रफ पर भी जूता फेंका जा चुका है। जार्जिया के राष्ट्रपति मिखाइल साकाशविली और तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप तईप एरडोगन पर भी जूते फेंके जा चुके हैं। फ्रांस में तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलय सरकोजी पर प्लास्टिक की बोतल फेंक दी गई थी। जूतों की बरसात जारी है लेकिन अब यह घटनाएं लोगों की मानसिकता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रही है।